CJP का प्रदर्शन कवर करते हुए मुझे सबसे पहले किसानों के आंदोलन की याद आई. उस आंदोलन के शुरुआती दिनों में किसानों की मांगें केंद्र से थीं, लेकिन धीरे-धीरे कुछ अराजक तत्वों की मौजूदगी ने पूरे आंदोलन की छवि पर सवाल खड़े कर दिए थे. इस प्रदर्शन में भी मुझे कुछ वैसा ही पैटर्न देखने को मिला. बड़ी संख्या में मौजूद प्रदर्शनकारियों के बीच कुछ ऐसे लोग भी थे जो माहौल को तनावपूर्ण बनाने की कोशिश कर रहे थे. उनकी गतिविधियों की वजह से आंदोलन ने अलग ही रूप ले लिया.
20 जुलाई को करीब 30,000 लोग सड़कों पर थे. इसी दौरान कुछ उपद्रवी तत्वों ने पथराव किया, जिसके बाद पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े. इसके बाद हालात और बिगड़े, इस झड़प में कई छात्र और कई पुलिसकर्मी भी घायल हुए.
लाठीचार्ज के बाद बदली तस्वीर
21 जुलाई को जब मैं जंतर-मंतर पहुंचा तो दोपहर करीब दो बजे तक हल्की बारिश के बीच धरना स्थल पर लगभग 300–400 लोग ही मौजूद थे, लेकिन शाम करीब पांच बजे तक तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी थी. देखते ही देखते 10,000 से अधिक लोगों की भीड़ जमा हो गई. ये सिलसिला 25 जुलाई तक जारी रहा.
इन दिनों प्रदर्शन में मौजूद छात्रों के साथ-साथ कुछ ऐसे लोग भी दिखाई दिए जो बार-बार मीडिया और पुलिस को निशाना बना रहे थे. ऐसा लग रहा था मानो उनका मकसद प्रदर्शन की मूल मांगों से ज्यादा माहौल को भड़काना हो.
नकाबपोश लोगों ने पुलिस पर किया हमला
25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर टॉलस्टॉय मार्ग पर कवरेज के दौरान मैंने अपनी आंखों से कुछ ऐसे नकाबपोश लोगों को देखा जो छात्रों की आड़ लेकर दिल्ली पुलिस पर हमला करने की कोशिश कर रहे थे. वो लगातार छात्रों को उकसा रहे थे, ताकि टकराव बढ़े और स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाए. इन घटनाओं के कई वीडियो मैंने अपने कैमरे में रिकॉर्ड भी किए.
इस आंदोलन के दौरान एक और चीज पहली बार देखने को मिली. प्रदर्शन स्थल पर मौजूद लोगों के लिए जोमैटो और स्विगी के जरिए लगातार खाना मंगाया जा रहा था. बड़े पैमाने पर बिरयानी, बर्गर, पिज़्ज़ा, कोल्ड ड्रिंक जैसी चीजें पहुंच रही थीं.
खाने की वजह से जंतर-मंतर पहुंचे कई लोग
इसके अलावा मोबाइल चार्ज करने के लिए पावर बैंक भी बांटे जा रहे थे, लेकिन इसी के साथ एक और तस्वीर भी सामने आई. बड़ी मात्रा में यही खाना सड़कों के किनारे कूड़े में पड़ा मिला. मुफ्त भोजन मिलने की चर्चा के कारण भी कई लोग जंतर-मंतर पहुंच रहे थे, जिनका आंदोलन से कोई संबंध नहीं था.
हालांकि, इस भीड़ के बीच ऐसे लोग भी मिले जो प्रदर्शन का हिस्सा नहीं थे, लेकिन छात्रों के समर्थन में वहां पहुंचे थे. उनसे बातचीत में उन्होंने कहा कि छात्रों की मांगें जायज हैं और किसी भी सरकार की जवाबदेही तय होनी चाहिए, क्योंकि ये लाखों युवाओं के भविष्य का सवाल है.
उनका ये भी कहना था कि ऐसे आंदोलनों से भविष्य के शिक्षा मंत्रियों पर भी जवाबदेही का दबाव बनेगा और वे अपने फैसलों को लेकर अधिक सतर्क रहेंगे.
सुशांत मेहरा