महाराष्ट्र के ठाणे की एक अदालत ने दहेज प्रताड़ना और आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में पति और उसके माता-पिता को बरी कर दिया. अदालत ने कहा कि वैवाहिक जीवन में होने वाले सामान्य विवाद या घरेलू मतभेद को क्रूरता नहीं माना जा सकता. अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पंकज ए. पाटकी ने गुरुवार को फैसला सुनाते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों द्वारा की गई कथित प्रताड़ना के ठोस उदाहरण और महिला की आत्महत्या के बीच सीधा संबंध साबित करने में विफल रहा.
मामला 21 वर्षीय नर्स निशा की मौत से जुड़ा है. निशा की शादी दिसंबर 2016 में अनिल रंगनाथ गायकवाड़ से हुई थी. शादी के बाद वह ठाणे में पति और सास-ससुर के साथ रहती थी. 14 मई 2018 को निशा ने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी. इसके बाद वर्तक नगर पुलिस ने पति अनिल गायकवाड़, सास सोजर गायकवाड़ और ससुर रंगनाथ गायकवाड़ के खिलाफ आईपीसी की धारा 498-ए (क्रूरता) और 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत मामला दर्ज किया था.
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निशा के परिजनों ने आरोप लगाया था कि उसे घरेलू कामकाज को लेकर मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान किया जाता था. साथ ही उस पर सोने की चेन लाने का दबाव बनाया जाता था और कपड़ों को लेकर भी पाबंदियां लगाई जाती थीं. परिवार का आरोप था कि ससुराल वाले निशा को ड्रेस की बजाय केवल साड़ी पहनने के लिए कहते थे. हालांकि अदालत ने गवाहों के बयानों में विरोधाभास और ठोस साक्ष्यों की कमी का हवाला देते हुए कहा कि वैवाहिक जीवन में सामान्य खटपट, घरेलू तनाव या छोटे-मोटे झगड़े तब तक क्रूरता नहीं माने जा सकते, जब तक वे कानून में निर्धारित मानकों को पूरा न करें.
अदालत ने यह भी कहा कि दंपति सास-ससुर से अलग मंजिल पर रहते थे और पति निशा की नौकरी में सहयोग करता था. वह उसे ड्यूटी पर छोड़ने और लाने का काम भी करता था. बचाव पक्ष ने दलील दी कि निशा इसलिए परेशान थी क्योंकि वाहन उपलब्ध नहीं होने के कारण वह नासिक में एक रिश्तेदार की शादी में शामिल नहीं हो सकी. अदालत ने कहा कि इस तरह की घटनाएं किसी भी परिवार में सामान्य रूप से हो सकती हैं. केवल ऐसे कारणों के आधार पर यह साबित नहीं किया जा सकता कि आरोपियों ने आत्महत्या के लिए उकसाया. इन सभी पहलुओं को देखते हुए अदालत ने पति, सास और ससुर तीनों को बरी कर दिया.
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