दहेज प्रथा भारतीय समाज की एक पुरानी और गंभीर सामाजिक बुराई है, जिसने समय के साथ भयावह रूप ले लिया है. जब दहेज की मांग पूरी न होने पर किसी विवाहित महिला की हत्या कर दी जाती है या उसे आत्महत्या के लिए मजबूर किया जाता है, तो उसे दहेज हत्या (Dowry Death) कहा जाता है. यह अपराध न केवल मानवता के विरुद्ध है, बल्कि महिलाओं के अधिकारों और गरिमा पर भी सीधा आघात करता है.
दहेज हत्या को रोकने के लिए भारत में कड़े कानूनी प्रावधान किए गए हैं. भारतीय दंड संहिता की धारा 304-बी दहेज हत्या से संबंधित है, जिसके अंतर्गत यदि विवाह के सात वर्षों के भीतर महिला की असामान्य परिस्थितियों में मृत्यु होती है और उसके साथ दहेज के लिए क्रूरता की गई हो, तो आरोपी को कम से कम सात वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है. इसके अतिरिक्त धारा 498-ए के तहत दहेज के लिए उत्पीड़न को दंडनीय अपराध माना गया है. दहेज निषेध अधिनियम, 1961 भी इस कुप्रथा को रोकने के लिए बनाया गया है.
भारत में दहेज हत्या की घटनाएं आज भी चिंता का विषय बनी हुई हैं. शिक्षित और आधुनिक कहलाने वाले समाज में भी कई महिलाएं दहेज की लालच का शिकार बनती हैं. विवाह जैसे पवित्र बंधन को लालच और हिंसा का माध्यम बना दिया गया है. अक्सर देखा जाता है कि विवाह के बाद ससुराल पक्ष की ओर से लगातार दहेज की मांग की जाती है, जिसके कारण महिला को शारीरिक और मानसिक यातनाएं सहनी पड़ती हैं.
हालांकि कानून मौजूद हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन और समाज की सोच में बदलाव अत्यंत आवश्यक है. जब तक लोग दहेज को सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ते रहेंगे, तब तक यह समस्या बनी रहेगी.