24 साल में 6 सीट से 48 के ऐतिहासिक रिकॉर्ड तक... 'लालों के लैंड' हरियाणा में BJP के उभार की कहानी

बीजेपी ने खांटी हरियाणवी दिग्गजों के बीच अपनी विचारधारा की राजनीति के लिए जगह कैसे बनाई? ये एक दिलचस्प सवाल है. हरियाणा में बीजेपी कभी INLD और HJP की जूनियर पार्टनर रही, लेकिन 1987 में बीजेपी के पहले चुनाव लड़ने से लेकर 2024 के दंगल के बीच यहां का सियासी परिदृश्य काफी बदल चुका है और अब बीजेपी फॉलोअर नहीं लीडर की भूमिका में है.

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हरियाणा की राजनीति में 'लालों' का दबदबा रहा है. फोटो- आजतक हरियाणा की राजनीति में 'लालों' का दबदबा रहा है. फोटो- आजतक

पन्ना लाल

  • नई दिल्ली,
  • 09 अक्टूबर 2024,
  • अपडेटेड 12:38 PM IST

'लाल' हरियाणा की राजनीति का मशहूर ब्रांड रहा है. बंसी लाल, देवी लाल, भजन लाल ये वैसे नाम और किरदार हैं जिनका राज्य की राजनीति में दबदबा रहा है. जब हरियाणा के इन 'लालों' की सियासत का जलवा होता था तो बीजेपी इनकी जूनियर सहयोगी रहा करती थी. हरियाणा की किसान, पहलवान और जवान की राजनीति में अपना पांव जमाने के लिए आतुर. 

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एक समय ऐसा भी था जब बीजेपी को गठबंधन सहयोगी के तौर पर रखने वाली इंडियन नेशनल लोकदल (आईएनएलडी) 'बिग ब्रदर' की भूमिका में रहती थी. तब बीजेपी वर्कर अक्सर आईएनएलडी के नेता ओम प्रकाश चौटाला पर बुरा बर्ताव करने के आरोप लगाया करते थे. आईएनएलडी कभी समाजवादी रहे देवी लाल की पार्टी थी. इसे उन्होंने अपने आखिरी दिनों में बनाया था. ओम प्रकाश चौटाला देवी लाल के पुत्र थे. 

चौटाला ने खट्टर को दिखाया था बाहर का रास्ता

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार तब ओम प्रकाश चौटाला सीएम थे. वे सरकार के सर्वेसर्वा थे. मुख्यमंत्री के तौर पर एक बार ओम प्रकाश चौटाला ने हरियाणा के संगठन मंत्री और पूर्व सीएम मनोहर लाल खट्टर को बाहर का रास्ता दिया था. ये घटना दिल्ली स्थित हरियाणा भवन के सीएम सुइट में हुई थी. तब खट्टर उनसे गठबंधन पर कुछ चर्चा करने के लिए गए थे. 

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चौटाला और खट्टर की सियासी अदावत हाल तक जारी रही. अभी हाल ही में चौटाला ने खट्टर पर तीखा हमला करते हुए कहा था कि खट्टर तो हरियाणा में आवारा जानवरों को कहा जाता है.

पिता देवी लाल की राजनीतिक विरासत को आगे ले जाने वाले ओम प्रकाश ने अपने नाम से 'लाल' हटाकर अपने गांव का नाम चौटाला  टाइटल में लगाया और स्थानीय पहचान को तरजीह दी. ओम प्रकाश चौटाला ने राज्य की राजनीति में रिकॉर्ड कायम किया और चार बार सीएम बनें.

जब तक बंसी सरकार नहीं गिरेगी दाढ़ी नहीं कटवाऊंगा

एक और किस्सा है. 1999 में हरियाणा में ‌BJP और हरियाणा विकास पार्टी के गठबंधन की सरकार थी. बीजेपी कमजोर स्थिति में थी. CM थे  बंसीलाल. एक दिन BJP के वही संगठन मंत्री मनोहर लाल खट्टर मुख्यमंत्री बंसीलाल से मिलने गए. तब हरियाणा में लालों की चलती थी. बीजेपी छोटे भाई के रोल में संतुष्ट थी.मुलाकात के लिए प्रतीक्षा कर रहे खट्टर को CM का संदेशा आया- BJP के संगठन मंत्री हमारी पार्टी के संगठन मंत्री से मिल लें. मुझ मिलने की जरूरत नहीं है. 

कहते हैं कि खट्टर को ये बात चुभ गई. उन्होंने प्रण लिया कि जब तक बंसीलाल की सरकार नहीं गिरेगी, तब तक वे अपनी दाढ़ी नहीं कटाएंगे. बीजेपी ने 22 जून को इस सरकार से समर्थन वापस ले लिया. बंसीलाल सत्ता का गणित और तिकड़म जानते थे उन्होंने कांग्रेस की मदद से सरकार बचा ली. लेकिन कांग्रेस के साथ उनकी ये दोस्ती टिकाऊ साबित नहीं हुई. अगले महीने कांग्रेस ने भी समर्थन वापस ले लिया. इस बार बंसीलाल अनलकी साबित हुए 24 जुलाई को उनकी सरकार गिर गई. मनोहर लाल खट्टर का संकल्प पूरा हुआ. 

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ये कहानियां ये बताने के लिए है कि हरियाणा की सियासत में जड़ें जमाने के लिए बीजेपी को कड़ी प्रतिस्पर्द्धा करनी थी. 

बीजेपी ने अपनी विचारधारा के लिए कैसे बनाई जगह

तो आखिर बीजेपी ने इन खांटी हरियाणवी दिग्गजों के बीच अपनी विचारधारा की राजनीति के लिए जगह कैसे बनाई?

2014 से पहले हरियाणा के राजनीतिक परिदृश्य पर कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय और इंडियन नेशनल लोकदल जैसी क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा था. कांग्रेस लंबे समय तक सत्ता में रही, लेकिन भ्रष्टाचार, किसान असंतोष और कुशासन जैसे मुद्दों के कारण मतदाताओं में असंतोष बढ़ता जा रहा था. आईएनएलडी के अलावा बंसी लाल की अगुवाई में हरियाणा विकास पार्टी का भी यहां बोलबाला रहा. 

बीजेपी ने हरियाणा में अपने दम पर पहली बार 2014 में सरकार बनाई. ये वो मौका था जब केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बन चुकी थी. 2014 के विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी के नाम का सिक्का खूब चला और जाटों के कद्दावर नेता और कांग्रेसी मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा की 10 साल के शासन के बाद हरियाणा से विदाई हो गई. बीजेपी ने 2014 में 47 सीटें लाकर सियासी पंडितों का चौका दिया. ये सियासत का फुल सर्कल था, 15 साल पहले जिस खट्टर ने बंसी सरकार को गिराने की कसम खाई थी वही खट्टर अब हरियाणा को हांकने जा रहे थे. 

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2000 से 2009 तक तगड़े झटके

लेकिन इससे पहले के सालों का सफर बीजेपी के लिए और भी चुनौतियों से भरा था. ज्यादा नहीं एक चौथाई सदी पीछे चलते हैं. साल 2000 में बीजेपी हरियाणा के 90 में से 29 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. लेकिन केंद्र में बीजेपी की सरकार होने के बावजूद और दिल्ली से बॉर्डर सटे होने के बावजूद भाजपा यहां 6 सीटें ही जीत पाई. पार्टी को 8.94 फीसदी वोट हासिल हुए. हालांकि 1999 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी 5 सीटें जीत चुकी थीं. इस चुनाव में पार्टी को 10.32 प्रतिशत वोट मिले थे. 

2004 में केंद्र से बीजेपी की विदाई हो चुकी थी. लोकसभा चुनाव में पार्टी को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा. पार्टी 10 सीटों पर चुनाव लड़ी लेकिन मात्र 1 सीट पर जीत हासिल कर पाई. वोट शेयर रहा 11.90 प्रतिशत.

2005 में हरियाणा में फिर से विधान सभा चुनाव हुए. इस चुनाव में पूरे 90 सीटों पर चुनाव लड़ी. बीजेपी को जोरदार शिकस्त का सामना करना पड़ा. मात्र 2 सीटें ही पार्टी के खाते में आई. सारे दिग्गज चुनाव हार गए.  हालांकि पार्टी का वोट शेयर बढ़कर 10.36 फीसदी हो गया. 

2009 आम चुनाव में बीजेपी हरियाणा से पूरी तरह सफाया हो गया. पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई. 2009 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की स्थिति और भी बुरी हो गई. पार्टी 90 सीटों पर चुनाव लड़ी लेकिन प्रदर्शन लगभग वैसा ही रहा. पार्टी 4 सीटों पर जीत हासिल कर सकी. लेकिन वोट शेयर घटकर 9.04 फीसदी हो गया. 

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फिर एक-एक पग बढ़ाकर आगे बढ़ी बीजेपी 

हरियाणा में बीजेपी के लिए गुडलक सफर 2014 में ही शुरू हुआ. 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी 8 सीटों पर चुनाव लड़ी और शानदार स्ट्राइक लगाते हुए 7 सीटों पर जीत दर्ज की. 2014 के विधानसभा चुनाव में हरियाणा में बीजेपी की सुनामी देखी गई और पार्टी ने 47 सीटें जीतीं. 2009 के मुकाबले बीजेपी की सीटें 43 बढ़ गई और आंकड़ा 4 से बढ़कर 47 पर पहुंच गया. पार्टी का वोट शेयर 33.2 हो गया. 

2019 लोकसभा चुनाव में हरियाणा में बीजेपी का स्ट्राइक रेट 100 परसेंट रहा. बीजेपी ने राज्य की सभी 10 सीटों पर जीत हासिल की. पार्टी को 58.02 फीसदी वोट हासिल हुए. लेकिन 2019 विधानसभा चुनाव में पार्टी को एंटी इनकमबेंसी फैक्टर का सामना करना पड़ा. बीजेपी इस चुनाव में 40 सीटें जीत पाई. हालांकि मतों का प्रतिशत बढ़कर 36.49 प्रतिशत हो गया. 

हालांकि मनोहर लाल खट्टर ने एक बार फिर से जेजेपी के दुष्यंत चौटाला का साथ लेकर सरकार बनाई. इस चुनाव में चौटाला ने 10 सीटें जीतीं थीं. यहां यह भी बताना जरूरी है जो बीजेपी देवी लाल की पार्टी के साथ कभी जूनियर सहयोगी रहा करती थी अब वो सीनियर की भूमिका में आ गई थी. और उन्हें देवी लाल के खानदान से जुड़े दुष्यंत चौटाला बीजेपी के सहयोगी बनकर सरकार में शामिल हो गए. 

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2024 का हरियाणा विधानसभा चुनाव इतिहास रचने वाला साबित हुआ. बीजेपी ने इस चुनाव में अपना 'बेस्टएवर' परफॉर्मेंस दिया और 48 सीटें जीतीं. इस चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर 39.94 प्रतिशत रहा. ये स्थिति तब रही जब मात्र 3 महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी को यहां जोरदार झटका लगा था और पार्टी 10 में से 5 लोकसभा सीटें ही जीत सकी थी. साथ ही वोट प्रतिशत भी 2019 के 58.02 प्रतिशत के मुकाबले घटकर 47.61 प्रतिशत हो गया था. 

लेकिन विधानसभा चुनाव के नतीजों ने 3 महीने पुराने गम को भूला दिया. बीजेपी ने 2000 से लेकर 2024 तक के सफर यानी 24 सालों की यात्रा को 6 से 48 सीटों के साथ तय किया.

स्थापना के साथ ही हरियाणा में कामयाबी का स्वाद

1980 में बीजेपी की स्थापना के बाद ही 1982 में बीजेपी ने हरियाणा विधानसभा का चुनाव लड़ा था. इस चुनाव में बीजेपी को 6 सीटें मिली थी. अगला चुनाव बीजेपी 1987 में लड़ी. इसमें बीजेपी को अच्छी कामयाबी मिली थी. पार्टी 20 सीटों पर चुनाव लड़ी और इसके 16 विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे थे. ये बीजेपी का तगड़ा शो था. लोकदल और कांग्रेस के प्रभाव के बावजूद बीजेपी का 16 सीटें जीतना बड़ी बात थी. पार्टी का वोट प्रतिशत 10.08 प्रतिशत था. इसी चुनाव में बीजेपी की दिग्गज नेत्री रहीं सुषमा स्वराज अंबाला कैंट से विधायक चुनी गई थीं. सुषमा हरियाणा कैंट से बीजेपी की शुरुआती विधायकों में रही हैं.  

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लेकिन 1991 का विधानसभा चुनाव बीजेपी के लिए बेहद हताशाजनक रहा. बीजेपी 89 सीटों पर लड़ी लेकिन मात्र 2 सीटें ही जीत पाई. ये मंडल-कमंडल और गठबंधन सरकारों का दौर था. 

1996 विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने फोक्स्ड एप्रोच अपनाया और उन्हीं सीटों पर चुनाव लड़ी जहां पार्टी मजबूत थी. पार्टी ने 25 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे. इनमें से 11 सीटों पर बीजेपी के उम्मीदवारों ने जीत हासिल की. बीजेपी का वोट शेयर 8.9 प्रतिशत रहा. 
 

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