दिल्ली से दूर क्यों हो गए अरविंद केजरीवाल? आखिर कहां व्यस्त रहते हैं AAP के मुखिया

आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल पंजाब के लगातार दौरे करने लगे हैं. गुजरात उनका अगला पसंदीदा ठिकाना लगता है. क्या यह दिल्ली की हार का असर है या पर्दे के पीछे कुछ और ही खेल चल रहा है?

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गुजरात के अरावली में एक रैली के दौरान केजरीवाल (File Photo: PTI) गुजरात के अरावली में एक रैली के दौरान केजरीवाल (File Photo: PTI)

अमित भारद्वाज / असीम बस्सी / ब्रिजेश दोशी

  • नई दिल्ली,
  • 07 अगस्त 2025,
  • अपडेटेड 4:14 PM IST

दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की आखिरी अहम मौजूदगी उपराष्ट्रपति आवास पर थी. आम आदमी पार्टी के मुखिया की तत्कालीन उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ से मुलाकात ने सुर्खियां और अटकलें दोनों को हवा दी थी. हालांकि, कुछ दिनों बाद धनखड़ ने भारत के उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया. केजरीवाल ने दिल्ली में सोरेन परिवार से मुलाकात भी की थी, जब झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संरक्षक शिबू सोरेन सर गंगा राम अस्पताल में भर्ती थे, लेकिन सोमवार को उनका निधन हो गया.

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दिल्ली से 'गैरमौजूद' केजरीवाल

केजरीवाल राष्ट्रीय राजधानी की रोज़मर्रा की राजनीति से दूर हैं. यहां तक कि विरोध प्रदर्शन करने या बीजेपी के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार पर हमला करने के दौरान भी वह सार्वजनिक मंचों पर नहीं दिखे हैं. उनकी 'गैरमौजूदगी' पर सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि AAP दिल्ली के निचले आर्थिक तबके और मज़दूर वर्ग के वोट बैंक के गुस्से को भड़काने की कोशिश कर रही.

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गौरतलब है कि केजरीवाल ने बीजेपी की 'चार इंजन वाली सरकार' से निपटने के लिए सोशल मीडिया को अपना एकमात्र और शक्तिशाली हथियार बना लिया है. सीलिंग ड्राइव से लेकर सड़क किनारे बने बाज़ारों पर बुलडोज़र चलाने तक, निजी स्कूलों की फीस वृद्धि से लेकर राष्ट्रीय राजधानी की कानून-व्यवस्था तक, हर मुद्दा वह सिर्फ सोशल मीडिया के जरिए ही उठा रहे हैं. 

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दिल्ली में हेमंत सोरेन से केजरीवाल की मुलाकात (File Photo: PTI)

हैरानी की बात है कि यह दिल्ली के लिए AAP की रणनीति का हिस्सा है. हम इस पर आखिर में बात करेंगे. लेकिन AAP प्रमुख को दिल्ली के बाहर क्या बिजी रखता है?

दिल्ली की हार के तुरंत बाद AAP मुश्किलों में घिर गई. केजरीवाल ने राजनीतिक मामलों की समिति (PAC) की बैठक बुलाने में ज़्यादा समय नहीं गंवाया. साल 2027 के आखिर तक का रोडमैप तैयार किया गया, ज़िम्मेदारिया सौंपी गईं और फेरबदल किए गए. पंजाब, गोवा और गुजरात में 2027 के चुनावों पर नज़र गड़ाए AAP का मानना है कि अब संगठन को मज़बूत करने का समय आ गया है. इसके अलावा, AAP प्रमुख ख़ुद पंजाब का किला गंवाने का जोखिम नहीं उठा सकते.

प्रोजेक्ट पंजाब 2027 पर फोकस

जब से AAP के फैसले लेने की सर्वोच्च संस्था पीएसी ने 2027 के रोडमैप पर अपनी मुहर लगाई है, तब से पार्टी के बॉस केजरीवाल लगातार पंजाब के दौरे कर रहे हैं.

बीती 31 जुलाई का उनका हालिया दौरा हुआ, जिसमें केजरीवाल ने पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के साथ सुनाम में कई परियोजनाओं की शुरुआत की थी. दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री ने पंजाब में करीब एक दर्जन सार्वजनिक कार्यक्रम में हिस्सा लिया. इन दौरों में मुख्यमंत्री मान के साथ चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत, परियोजनाओं और सुविधाओं का उद्घाटन और सभाओं को संबोधित करना शामिल रहा.

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मई-जून में ही AAP सुप्रीमो करीब चार बार पंजाब का दौरा कर चुके हैं. केजरीवाल अब पंजाब के दौरे तेज़ कर रहे हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि पार्टी 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए अपनी स्थिति मज़बूत करती रहे.

संगठन को मजबूती देने की तैयारी

AAP की पीएसी ने केजरीवाल के करीबी मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन को पंजाब के लिए भी अहम ज़िम्मेदारियां सौंपी हैं. सिसोदिया जहां सीमावर्ती राज्य में लगभग डेरा डाले हुए हैं, वहीं जैन और AAP के अन्य टॉप लीडर और रणनीतिकार लगातार वहां का दौरा कर रहे हैं.

साल 2022 के चुनाव में AAP ने न सिर्फ कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया, बल्कि अकालियों को भी चुनावी लिहाज से महत्वहीन बना दिया. पार्टी ने पंजाब में 92 सीटों के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी.

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लेकिन 2024 के लोकसभा चुनावों ने सत्तारूढ़ पार्टी के लिए खतरे की घंटी बजा दी है. कांग्रेस ने पंजाब की 13 लोकसभा सीटों में से 7 पर जीत हासिल की और AAP सिर्फ तीन सीटें ही जीत पाई. इस बीच, विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही शिरोमणि अकाली दल भी खुद को फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रहा है.

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आम आदमी पार्टी का दिल्ली थिंक टैंक दो मोर्चों पर काम कर रहा है. सरकारी नीतियों का क्रियान्वयन और संगठन को मज़बूत करना. उनका इरादा 2027 की चुनावी जंग के लिए पूरी तरह तैयार होने तक सरकार और संगठन दोनों को मजबूत करना है.

पंजाब नें जमाया डेरा

भगवंत मान सरकार के 'युद्ध नशियां विरुद्ध' अभियान की शुरुआत के साथ ही केजरीवाल की मौजदूगी में तेज़ी आई थी. नशा और नशा मुक्ति अभियान का मकसद AAP के प्रमुख चुनावी वादे को पूरा करना है. उन्हें उम्मीद है कि यह अभियान शहरी इलाकों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक अपना प्रभाव छोड़ेगा. AAP प्रमुख और मुख्यमंत्री मान ने मई में 'नशा मुक्ति यात्रा' शुरू की थी. एक अगस्त को केजरीवाल और मान ने स्कूलों के लिए 'नशा विरोधी' पाठ्यक्रम का अनावरण किया.

लुधियाना में एक रैली के दौरान केजरीवाल (File Photo: PTI)

इस बीच, सिसोदिया को पंजाब में AAP के 'एजुकेशन मॉडल' को तेज़ी से लागू करने का काम सौंपा गया है. इसके अलावा, उन लोगों से भी निपटना होगा जो 'नाराज़' हैं या जिन्हें नेतृत्व से किसी तरह की शिकायत है. सत्येंद्र जैन से पंजाब यूनिट को हेल्थ मॉडल में मदद मिलने की उम्मीद थी.

बता दें कि केजरीवाल ने लुधियाना पश्चिम उपचुनाव के दौरान बड़े पैमाने पर प्रचार किया था, क्योंकि दिल्ली में करारी हार के बाद AAP अपनी पहली जीत की तलाश में थी.

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केजरीवाल के पंजाब के नियमित दौरे विपक्षी दलों के लिए एक अहम हथियार बन गए हैं. उनका आरोप है कि पंजाब में 'दिल्ली दरबार' चल रहा है, जो पंजाब के मुख्यमंत्री मान और उनकी कैबिनेट के अधिकार और स्वतंत्रता को कमज़ोर कर रहा है. हालांकि, AAP के शीर्ष नेता इन आरोपों से बेपरवाह हैं और हर बड़े आयोजन में केजरीवाल ही सेंटर में रहते हैं.

गुजरात की जीत भुनाने की कोशिश

विसावदर विधानसभा उपचुनाव में कड़ी मेहनत से मिली जीत ने गुजरात में आम आदमी पार्टी के लिए खेल बदल दिया. जून में हुए दो विधानसभा उपचुनावों से पहले, अहमदाबाद के सत्ताधारी हलकों में चर्चा थी कि यह आम आदमी पार्टी के लिए निर्णायक पल होगा. अगर वह विसावदर सीट हार जाती है, तो उसकी स्टेट यूनिक का पतन तेज़ हो जाएगा. अगर आम आदमी पार्टी के गोपाल इटालिया तमाम मुश्किलों के बावजूद इस सीट से जीत जाते हैं, तो आम आदमी पार्टी इस तटीय राज्य में बीजेपी के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में स्थापित हो जाएगी.

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AAP संयोजक केजरीवाल की नज़र अब गुजरात की जीत को भुनाने पर है. वे लगातार गुजरात का दौरा कर रहे हैं और आप कार्यकर्ता इन दौरों के केंद्र में हैं. उनके भाषणों में बीजेपी से लड़ने के वैचारिक कारण गिनाए जाते हैं. केजरीवाल सत्तारूढ़ बीजेपी और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के नेताओं के बीच सांठगांठ के आरोप लगाने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते. बीजेपी और कांग्रेस, दोनों पर निशाना साधकर, उन्हें उम्मीद है कि AAP राज्य में कांग्रेस की जगह ले सकेगी और बीजेपी को उसके गढ़ में अस्थिर कर सकेगी.

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अहमदाबाद में एक कार्यक्रम के दौरान केजरीवाल (File Photo: PTI)

सदस्यता अभियान और रैलियां

जून में हुए उपचुनावों में, वह लगातार पांच दिनों तक विसावदर में रहे और अपने उम्मीदवार गोपाल इटालिया के लिए प्रचार किया. आप प्रमुख ने इटालिया के नामांकन के लिए भी अपनी मौजूदगी सुनिश्चित की थी. केजरीवाल के लिए यह कोई आम बात नहीं थी.

पिछले तीन महीनों में उन्होंने कम से कम चार बार गुजरात का दौरा किया है. विसावदर उपचुनाव में जीत के बाद अरविंद केजरीवाल ने एक ही महीने में दो बार गुजरात का दौरा किया. जुलाई में, उन्होंने संगठन को मज़बूत करने के लिए पार्टी का सदस्यता अभियान शुरू किया और कार्यकर्ता सम्मेलन को भी संबोधित किया.

जुलाई के अंत में केजरीवाल दो दिवसीय गुजरात दौरे पर थे, जहां उन्होंने साबरकांठा में पशुपालकों के आंदोलन का समर्थन किया और जेल में बंद अपने विधायक चतर वसावा के समर्थन में एक रैली निकाली.

केजरीवाल मतदाताओं को यह समझाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं कि गुजरात में असली मुख्य विपक्ष AAP ही है. आप आगामी 15 नगर निगमों के स्थानीय निकाय चुनावों में अपनी छाप छोड़ने की उम्मीद करेगी.

आम आदमी पार्टी के INDIA ब्लॉक से बाहर निकलने के बाद, केजरीवाल अब कांग्रेस पर भी तीखे हमले करने के लिए आजाद हैं, साथ ही साथ राज्य की बीजेपी सरकार पर भी निशाना साध सकते हैं.

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संगठन विस्तार सबसे बड़ी प्राथमिकता

गोवा उन शुरुआती राज्यों में से एक था जिसने AAP का उम्मीद से बढ़कर स्वागत किया. केजरीवाल की पार्टी करीब 6-7 प्रतिशत वोट शेयर पर अपनी पकड़ बनाए हुए है और बीजेपी शासित राज्य से उसके दो विधायक हैं. अमित पालेकर, जिन्हें केजरीवाल के समकक्ष माना जाता है, के स्टेट यूनिट की कमान संभालने के साथ, आप अपने वोट शेयर में बढ़ोतरी और कम से कम मुख्य विपक्ष के रूप में कांग्रेस की जगह लेने की उम्मीद करेगी.

सूत्रों के अनुसार, केजरीवाल अब उन राज्यों पर फोकस कर रहे हैं जहां संगठनात्मक विस्तार की संभावनाए हैं. गोवा इस लिस्ट में सबसे आगे है. इसी वजह से दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी को राज्य का प्रभारी नियुक्त किया गया है.

गौरतलब है कि केजरीवाल जब भी दिल्ली में होते हैं, उनके कार्यक्रम में संगठनात्मक कार्यों से जुड़ी ज़्यादा बैठकें शामिल होती हैं. पंजाब और गुजरात के नेता अक्सर उनके आवास पर आते रहते हैं. जबकि दिल्ली यूनिट का कामकाज सौरभ भारद्वाज और आतिशी पर छोड़ दिया गया है.

सूत्रों ने यह भी पुष्टि की है कि हाल के महीनों में आप विधायकों, राज्य इकाई के नेताओं और संगठनात्मक शाखाओं के पदाधिकारियों की आप प्रमुख के साथ ज़्यादा बैठकें हुई हैं. आप की स्टूडेंट विंग ASAP का गठन, अपनी स्थापना के एक दशक बाद इसी पुनर्गठन को दिखाता है.

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