दिल्ली की हवा पर 22 साल की स्टडी का बड़ा खुलासा: बारिश से सिर्फ 5 दिन की राहत, फिर लौट आता है जानलेवा प्रदूषण

दिल्ली में 2003 से 2024 के बीच बारिश की 612 घटनाओं पर हुए अध्ययन में पाया गया कि 310 मामलों में प्रदूषण के कण पांच दिन के अंदर बारिश से पहले वाले स्तर पर लौट आए. करीब 45 फीसदी घटनाओं में 30 दिन बाद भी स्तर पहले जैसा नहीं हुआ. बारिश की मात्रा का कणों के लौटने की रफ्तार से कोई खास संबंध नहीं दिखा.

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दिल्ली में बारिश के बाद हवा से प्रदूषण के कण कम जरूर होते हैं, लेकिन यह राहत लंबे समय तक नहीं टिकती (File Photo: PTI) दिल्ली में बारिश के बाद हवा से प्रदूषण के कण कम जरूर होते हैं, लेकिन यह राहत लंबे समय तक नहीं टिकती (File Photo: PTI)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 30 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 7:42 PM IST

दिल्ली की हवा में मौजूद प्रदूषण के कण बारिश के बाद कुछ समय के लिए कम हो जाते हैं, लेकिन पांच दिन के भीतर ही वे लौट आते हैं. 22 साल चले एक अध्ययन में 2003 से 2024 के बीच बारिश की 612 घटनाओं को परखा गया और आधे से ज्यादा मामलों में प्रदूषण बारिश से पहले वाले स्तर पर लौट आया. वैज्ञानिकों का कहना है कि इसलिए उत्सर्जन घटाने के लगातार उपाय जरूरी हैं.

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इनमें से 310 मामलों में, यानी 50 फीसदी से ज्यादा बार, कण पांच दिन के अंदर बारिश से पहले जैसे स्तर पर पहुंच गए. शोधकर्ताओं के मुताबिक इसकी बड़ी वजह लगातार जारी उत्सर्जन है. वाहन, इंडस्ट्री, निर्माण कार्य और दूसरे स्रोत हवा में प्रदूषक छोड़ते रहते हैं, जबकि वायुमंडल में केमिकल रिएक्शन से नए कण भी बन सकते हैं.

अध्ययन के संबंधित लेखक डॉ. सतीन्द्रन ने कहा कि बारिश दिल्ली के एयरोसोल प्रदूषण में सिर्फ अस्थायी राहत देती है. हवा की गुणवत्ता में स्थायी सुधार के लिए बारिश के भरोसे रहने के बजाय उत्सर्जन घटाने के निरंतर उपाय जरूरी हैं.

तेज बारिश से ज्यादा देर तक राहत मिले, ऐसा नहीं दिखा. बारिश की मात्रा का इस बात से कोई खास संबंध नहीं मिला कि कण कितनी जल्दी लौटे. करीब 45 फीसदी घटनाओं में तो 30 दिन बाद भी प्रदूषण पहले के स्तर पर नहीं लौटा था. विशेषज्ञों के मुताबिक यह समय इंसानी गतिविधियों से होने वाले उत्सर्जन, हवा में पहले से मौजूद प्रदूषकों और नए कणों के बनने पर निर्भर करता है और उत्सर्जन की तीव्रता के हिसाब से बदल सकता है.

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मौसम के हिसाब से भी यह समय अलग रहा. मानसून में यह छह दिन, गर्मी और सर्दी में पांच दिन और मानसून के बाद वाले मौसम में तीन दिन रहा. ये बीच वाले यानी माध्यिका आंकड़े हैं, जो हर मौसम की घटनाओं में दर्ज बीच का समय बताते हैं.

शोध के लिए वैज्ञानिकों ने 2003 से 2024 तक दिल्ली के उपग्रह आंकड़ों को बारिश और मौसम के आंकड़ों से मिलाया. उन्होंने ऐसी घटनाएं चुनीं जिनमें एक दिन की बारिश 5 मिलीमीटर से ज्यादा रही और हर घटना के बाद 30 दिन तक कणों के स्तर पर नजर रखी. इसके लिए एयरोसोल ऑप्टिकल डेप्थ नाम का पैमाना इस्तेमाल हुआ, जो बताता है कि प्रदूषण के कण हवा में कितनी रोशनी को रोकते या बिखेरते हैं. हालांकि यह जमीन के स्तर का प्रदूषण या एक्यूआई सीधे नहीं मापता. 22 साल में कणों के लौटने के समय में कोई खास बदलाव नहीं दिखा.

अध्ययन का शीर्षक "केवल बारिश शहरी प्रदूषण को कम क्यों नहीं कर सकती: दिल्ली पर दो दशकों (2003-2024) के उपग्रह अवलोकन" है. यह जर्नल ऑफ एटमॉस्फेरिक एंड सोलर टेरेस्ट्रियल फिजिक्स में छपा है.

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