जिस गांव में कभी स्कूल इसलिए बम से उड़ा दिया गया था कि वहां सुरक्षाबलों का कैंप न बन सके, उसी गांव की एक बेटी आज डॉक्टर बनने की राह पर है. दंतेवाड़ा के पोटाली गांव की 21 वर्षीय आदिवासी छात्रा दीपा मरकाम ने नीट परीक्षा में 412 अंक हासिल किए हैं. पोटाली से करीब 50 किलोमीटर दूर दंतेवाड़ा के पुनर्वास केंद्र में कभी नक्सली संगठन का हिस्सा रहे युवक अब वेल्डिंग, सिलाई और इलेक्ट्रिशियन का प्रशिक्षण ले रहे हैं. बस्तर के दौरे में सामने आईं ये दो तस्वीरें बताती हैं कि यहां एक नई 'फ्रंटलाइन' भी तैयार हो रही है, जहां हथियार नहीं, हुनर सबसे बड़ा हथियार बनता दिख रहा है.
एक तरफ वे लोग हैं, जिन्होंने हथियार छोड़कर सामान्य जिंदगी की राह चुनी है. दूसरी तरफ ऐसे युवा हैं, जो कभी नक्सल हिंसा से प्रभावित रहे इलाकों से निकलकर मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसे पेशों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं. बस्तर में इन दो तस्वीरों के बीच एक साझा कड़ी भी है. जिन इलाकों की पहचान कभी नक्सल हिंसा से होती थी, वहां अब शिक्षा, कौशल विकास, पुनर्वास और पर्यटन जैसे नए प्रयास भी दिखाई दे रहे हैं. आजतक डॉट इन की टीम ने जगदलपुर और दंतेवाड़ा के कई इलाकों का दौरा किया. इस दौरान जो तस्वीरें सामने आईं, वे बताती हैं कि सुरक्षा अभियानों के समानांतर अब एक और मोर्चे पर काम हो रहा है युवाओं को शिक्षा, रोजगार और मुख्यधारा से जोड़ने का.
पोटाली... जहां कभी स्कूल उड़ा दिया गया था
दंतेवाड़ा मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर दूर घने जंगलों के बीच बसा पोटाली गांव कभी नक्सल गतिविधियों की वजह से चर्चा में रहता था. स्थानीय लोगों के मुताबिक, गांव के स्कूल को नक्सलियों ने इसलिए विस्फोट कर उड़ा दिया था ताकि वहां सुरक्षा बल अपना कैंप न बना सकें. लंबे समय तक गांव में शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों ही सबसे बड़ी चुनौती बने रहे. गांव का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र वर्ष 2005 में बना जरूर, लेकिन बढ़ती नक्सली हिंसा के कारण वह करीब दो दशक तक बंद पड़ा रहा. एक जनवरी 2025 को यहां फिर से स्वास्थ्य सेवाएं शुरू हो सकीं. इसके कुछ महीने बाद जुलाई 2025 में गांव का प्राथमिक स्कूल भी दोबारा खुल गया. गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि वर्षों बाद बच्चों की आवाज फिर से स्कूल परिसर में सुनाई देने लगी है. इसी गांव की रहने वाली 21 वर्षीय दीपा मरकाम ने इस साल नीट परीक्षा में 412 अंक हासिल किए हैं. अब वह सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाखिले का इंतजार कर रही हैं. दीपा कहती हैं, बचपन में गांव में इलाज की सुविधा नहीं थी. किसी मरीज की तबीयत बिगड़ती थी तो जिला अस्पताल पहुंचने में घंटों लग जाते थे. कई बार इलाज मिलने से पहले ही हालत गंभीर हो जाती थी. तभी मन में तय कर लिया था कि डॉक्टर बनना है. दीपा बताती हैं कि मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी आसान नहीं थी. उन्होंने जिला प्रशासन की आवासीय कोचिंग 'छू लो आसमान' में दो साल तक रहकर पढ़ाई की. सुबह क्लास, दोपहर में टेस्ट और रात तक सेल्फ स्टडी उनकी दिनचर्या का हिस्सा रही. दीपा के चाचा दिलीप मरकाम कहते हैं, हमारे गांव में कभी पढ़ाई का माहौल नहीं था. ऐसे गांव से निकलकर मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास करना हमारे पूरे परिवार ही नहीं, आसपास के गांवों के लिए भी गर्व की बात है. हमें उम्मीद है कि वह डॉक्टर बनकर इसी इलाके के लोगों की सेवा करेगी.
'छू लो आसमान'... जहां से निकल रहे हैं डॉक्टर
दीपा की कहानी कोई अपवाद नहीं है. दंतेवाड़ा में चल रही आवासीय कोचिंग 'छू लो आसमान' अब नक्सल प्रभावित इलाकों के छात्रों के लिए उम्मीद का बड़ा केंद्र बन चुकी है. इस साल यहां से 158 विद्यार्थियों ने नीट परीक्षा दी. इनमें 21 छात्रों ने 300 से अधिक अंक हासिल किए. इस संस्थान की सबसे बड़ी उपलब्धि यह मानी जा रही है कि यहां से पढ़े छह छात्र आज दंतेवाड़ा जिले में मेडिकल ऑफिसर के रूप में सेवाएं दे रहे हैं. यानी जो छात्र कभी बेहतर शिक्षा और अवसर की तलाश में यहां पहुंचे थे, वे अब उसी इलाके की स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत कर रहे हैं. कोचिंग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि दूरस्थ गांवों के कई छात्र पहली बार घर से बाहर निकलकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं. आवास, पढ़ाई और मार्गदर्शन की सुविधा मिलने से उनके लिए मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों तक पहुंचना पहले की तुलना में आसान हुआ है.
जगदलपुर की ज्ञानगुड़ी भी बदल रही तस्वीर
ऐसी ही एक पहल जगदलपुर में ज्ञानगुड़ी के रूप में दिखाई देती है. जिला प्रशासन की ओर से संचालित यह आवासीय कोचिंग अब मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए महत्वपूर्ण केंद्र बन चुकी है. आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2020-21 से अब तक 469 विद्यार्थियों को यहां नीट की तैयारी कराई गई. इनमें 290 छात्र परीक्षा पास कर चुके हैं. अब तक 16 छात्रों का चयन एमबीबीएस, 36 का बीएससी नर्सिंग, 32 का फार्मेसी, 7 का बीडीएस और कई अन्य छात्रों का अलग-अलग प्रोफेशनल पाठ्यक्रमों में हुआ है. वर्ष 2024-25 में 67 छात्रों ने नीट परीक्षा पास की थी, जबकि इस साल भी बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने सफलता हासिल की है. ज्ञानगुड़ी में पढ़ने वाले अधिकांश छात्र बस्तर के दूरस्थ आदिवासी गांवों से आते हैं, जहां कुछ साल पहले तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की कल्पना भी मुश्किल मानी जाती थी. ज्ञानगुड़ी के एक शिक्षक कहते हैं कि अब सबसे बड़ा बदलाव बच्चों के सपनों में दिखाई देता है. पहले जहां सरकारी नौकरी तक सोच सीमित रहती थी, वहीं अब छात्र डॉक्टर, इंजीनियर और वैज्ञानिक बनने की बात करते हैं.
पुनर्वास केंद्र... जहां पूर्व नक्सली सीख रहे हैं नया हुनर
शिक्षा के साथ-साथ बस्तर में बदलाव की एक और तस्वीर दंतेवाड़ा के जिला परियोजना लाइवलीहुड कॉलेज में दिखाई देती है. यहां आत्मसमर्पण कर चुके पूर्व नक्सलियों और नक्सल प्रभावित युवाओं को अलग-अलग ट्रेड में प्रशिक्षण देकर रोजगार से जोड़ने की कोशिश की जा रही है. आजतक डॉट इन की टीम जब इस केंद्र पहुंची तो अलग-अलग वर्कशॉप में प्रशिक्षण चल रहा था. वेल्डिंग यूनिट में युवा लोहे की ग्रिल तैयार करना सीख रहे थे. सिलाई कक्ष में मशीनों की आवाज लगातार सुनाई दे रही थी. इलेक्ट्रिशियन लैब में वायरिंग का अभ्यास चल रहा था, जबकि सोलर तकनीशियन और प्लंबिंग की ट्रेनिंग भी साथ-साथ चल रही थी. प्रशिक्षक एक-एक प्रशिक्षु के काम पर नजर रख रहे थे और गलतियां सुधार रहे थे. पहली नजर में यह किसी सामान्य स्किल डेवलपमेंट सेंटर जैसा लगता है, लेकिन यहां मौजूद कई युवाओं का अतीत अलग रहा है. अधिकारियों के मुताबिक इनमें कई ऐसे लोग हैं जिन्होंने आत्मसमर्पण के बाद यहां प्रशिक्षण लेना शुरू किया है. अब उनका लक्ष्य स्थायी रोजगार और सामान्य जीवन है. जिला प्रशासन के आंकड़ों के मुताबिक अब तक 428 लोगों को विभिन्न ट्रेडों में प्रशिक्षण दिया जा चुका है. प्रशिक्षण के दौरान 480 हितग्राहियों को मानदेय और 495 लोगों को मोबाइल फोन भी उपलब्ध कराए गए हैं. प्रशिक्षण पूरा करने वाले कई युवा निजी कंपनियों, स्थानीय उद्योगों और स्वरोजगार से जुड़ चुके हैं. कॉलेज से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि पुनर्वास का मकसद केवल आत्मसमर्पण कराना नहीं है, बल्कि युवाओं को ऐसी आजीविका से जोड़ना है, जिससे वे दोबारा हिंसा के रास्ते पर न लौटें.
सिर्फ सुरक्षा नहीं, अब रोजगार और शिक्षा पर भी जोर
बस्तर के दौरे के दौरान एक बात लगातार महसूस हुई कि अब सरकारी प्रयास सिर्फ सुरक्षा अभियानों तक सीमित नहीं हैं. जिन इलाकों में कभी स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और सड़कें सबसे बड़ी चुनौती थे, वहां अब शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास और रोजगार को भी प्राथमिकता देने की कोशिश हो रही है. पोटाली जैसे गांवों में स्वास्थ्य केंद्र और स्कूल दोबारा शुरू हुए हैं. दूसरी तरफ 'छू लो आसमान' और ज्ञानगुड़ी जैसे संस्थान मेडिकल और इंजीनियरिंग की तैयारी करने वाले छात्रों को मंच दे रहे हैं. वहीं पुनर्वास केंद्र पूर्व नक्सलियों को नई शुरुआत का अवसर देने की कोशिश कर रहा है.
अब पर्यटन के जरिए बस्तर की नई पहचान बनाने की तैयारी
बस्तर की नई तस्वीर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा पर्यटन भी है. चित्रकोट जलप्रपात और तीरथगढ़ जैसे प्राकृतिक स्थलों को देश के प्रमुख पर्यटन केंद्रों में विकसित करने की योजना पर काम चल रहा है. मकसद सिर्फ पर्यटकों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर तैयार करना भी है. सरकार ने अगले पांच वर्षों के लिए पर्यटन विकास का खाका तैयार किया है. इसके तहत चित्रकोट से करीब 20 किलोमीटर दूर तीरथा गांव में लगभग 25 करोड़ रुपये की लागत से टेंट सिटी विकसित की जा रही है. यहां पर्यटकों के लिए आधुनिक कॉटेज, कैंपिंग, एडवेंचर एक्टिविटी और अन्य सुविधाएं विकसित की जाएंगी. चित्रकोट जलप्रपात पर करीब 50 मीटर लंबे ग्लास ब्रिज के निर्माण की भी योजना है. इस पुल से पर्यटक जलप्रपात और इंद्रावती घाटी का अलग अनुभव ले सकेंगे. वहीं चित्रकोट से करीब छह किलोमीटर दूर मटनार बैराज में इंद्रावती नदी पर रिवर क्रूज शुरू करने की तैयारी चल रही है. पर्यटन विभाग चित्रकोट, तीरथगढ़, बारसूर, नारायणपाल और आसपास के धार्मिक एवं प्राकृतिक स्थलों को जोड़कर एक पर्यटन सर्किट विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है. स्थानीय कारोबारियों का मानना है कि यदि ये परियोजनाएं समय पर पूरी होती हैं तो होटल, परिवहन, गाइड, हस्तशिल्प और छोटे व्यापारियों को इसका सीधा लाभ मिलेगा.
'सबसे पहले स्कूल' पर सरकार का फोकस
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का कहना है कि नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा अभियान के साथ-साथ बुनियादी सुविधाओं को बहाल करना सरकार की प्राथमिकता है. मुख्यमंत्री के मुताबिक पिछले दो वर्षों में करीब 500 गांवों को दोबारा बसाया गया है. 'नियाद नेल्लानार' योजना के तहत सड़क, बिजली, पेयजल, मोबाइल नेटवर्क और राशन जैसी सुविधाएं गांवों तक पहुंचाई गई हैं. कई बंद पड़े स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्रों को भी फिर से शुरू किया गया है. साय कहते हैं, आम लोग माओवाद का अंत चाहते थे, इसलिए इस लड़ाई में सफलता मिली. हमारी प्राथमिकता नक्सल प्रभावित गांवों में सबसे पहले स्कूल खोलने की है. शिक्षा और स्वास्थ्य की योजनाएं हर घर तक पहुंचें, इसी दिशा में काम किया जा रहा है. आदिवासी समाज पर कुछ भी थोपा नहीं जाएगा.
अमित कुमार गुप्ता