जब डर पीछे छूटने लगा... नक्सलवाद के बाद बदलते इलाकों की कहानी

छत्तीसगढ़ के बस्तर, दंतेवाड़ा और जगदलपुर में नक्सलवाद के प्रभाव के बाद बदलती तस्वीर अब सुरक्षा अभियानों से आगे बढ़कर सामान्य जीवन, रोजगार, महिला सशक्तिकरण, कौशल प्रशिक्षण और पर्यटन में दिखाई दे रही है. नेतानार के सीआरपीएफ कैंप में ग्रामीणों के लिए खुली सुविधाएं, दंतेवाड़ा में पूर्व नक्सलियों का कौशल प्रशिक्षण और चित्रकोट-तीरथगढ़ जैसे पर्यटन स्थलों पर लौटते पर्यटक इस बदलाव के अहम संकेत हैं. यहां अब बंदूक और डर की पहचान धीरे-धीरे बैंकिंग, रोजगार, हुनर और उम्मीद में बदल रही है.

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नेतानार सीआरपीएफ कैंप में महिलाओं के रोजगार के लिए कई केंद्र खुल गए हैं (Photo: ITG) नेतानार सीआरपीएफ कैंप में महिलाओं के रोजगार के लिए कई केंद्र खुल गए हैं (Photo: ITG)

अमित कुमार गुप्ता

  • बस्तर ,
  • 08 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 6:45 AM IST

सीआरपीएफ कैंप की पहचान आमतौर पर ऊंची दीवारों, कंटीले तारों, बंकरों और हथियारबंद जवानों से होती है. ऐसे कैंपों के भीतर आम लोगों की आवाजाही की कल्पना भी मुश्किल होती है. लेकिन छत्तीसगढ़ के जगदलपुर जिले के नेतानार में एक ऐसा सीआरपीएफ कैंप है, जिसके दरवाजे अब गांव के लोगों के लिए खुले हैं. सुबह होते ही महिलाएं यहां पहुंचने लगती हैं. कोई सिलाई मशीन पर प्रशिक्षण ले रही है, कोई चावल और इमली का प्रसंस्करण कर रही है, कोई बैंक सखी बनकर ग्रामीणों के खाते में पैसे जमा और निकासी कर रही है, तो कोई आधार कार्ड अपडेट कराने आया है. एक समय था, जब ऐसे कैंपों के आसपास आम ग्रामीणों की मौजूदगी भी असामान्य मानी जाती थी. सुरक्षा और समाज के बीच की यह घटती दूरी ही शायद बदलते समय की सबसे बड़ी पहचान है.

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यह दृश्य किसी सरकारी योजना का प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक बड़े सामाजिक परिवर्तन का संकेत है. जिस इलाके की पहचान कभी बंदूक और बारूद से होती थी, वहां अब रोजमर्रा की जिंदगी अपनी रफ्तार पकड़ रही है. शायद किसी भी संघर्षग्रस्त क्षेत्र की सबसे बड़ी सफलता यही होती है. यह बदलाव आंकड़ों से अधिक चेहरों पर दिखाई देता है.  बस्तर, दंतेवाड़ा, जगदलपुर के इन इलाकों को कभी देश ने लंबे समय तक केवल नक्सलवाद के चश्मे से देखा. यहां की पहचान जंगलों से कम और मुठभेड़ों से ज्यादा बनी. इन इलाकों का नाम आता था, तो उसके साथ आईईडी विस्फोट, सुरक्षाबलों पर हमला या नक्सली हिंसा जैसी खबरें जुड़ी होती थीं. लेकिन किसी समाज को केवल उसकी सबसे बुरी खबरों से नहीं समझा जा सकता. वहां की असली कहानी तब शुरू होती है, जब डर धीरे-धीरे पीछे हटता है और सामान्य जीवन वापस लौटने लगता है.

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दंतेवाड़ा और जगदलपुर की यात्रा के दौरान यही बदलाव सबसे ज्यादा महसूस हुआ. यह बदलाव केवल सुरक्षा के मोर्चे पर नहीं दिखता, बल्कि समाज के भीतर दिखाई देता है. महिलाएं आर्थिक गतिविधियों से जुड़ रही हैं. गांवों तक बैंकिंग और डिजिटल सेवाएं पहुंच रही हैं. आत्मसमर्पण कर चुके युवा रोजगारपरक प्रशिक्षण ले रहे हैं. जिन रास्तों पर कभी शाम ढलने के बाद सन्नाटा उतर आता था, वहां अब पर्यटकों की गाड़ियां दिखाई देती हैं. बदलाव की यह तस्वीर किसी एक योजना की नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक माहौल की कहानी कहती है.

इस बदलाव को समझना हो तो नेतानार में बने शहीद वीर गुंडाधुर सेवा डेरा को देखना चाहिए. 18 मई 2026 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसका उद्घाटन किया था. यहां आधार सेवा केंद्र, बैंकिंग सुविधा, सिलाई प्रशिक्षण, चावल और इमली प्रसंस्करण जैसी कई गतिविधियां एक ही परिसर में चल रही हैं. पहली नजर में यह एक जन सुविधा केंद्र लगता है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने गांव की महिलाओं को घर की चौखट से बाहर निकालकर आर्थिक गतिविधियों से जोड़ा है. बैंक सखी के रूप में काम कर रही महिलाओं को 8 से 10 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय मिल रहा है, जबकि धान और चावल प्रसंस्करण से जुड़ी महिलाओं को प्रतिदिन लगभग 200 रुपये की आय हो रही है. यह रकम बहुत बड़ी नहीं है, लेकिन इतना जरूर है कि इससे घर की जरूरतें पूरी हो रही हैं और बच्चों की पढ़ाई में मदद मिल रही है. जिन महिलाओं के लिए कभी घर से बाहर निकलना भी कठिन था, वे आज गांव की आर्थिक गतिविधियों की अहम कड़ी बन चुकी हैं.

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गृहमंत्री अमित शाह ने 18 मई 2026 को नेतानार में सेवा डोरा का उद्घाटन किया. (File Photo)

अगर इस बदलाव का दूसरा दृश्य देखना हो तो दंतेवाड़ा का जिला परियोजना आजीविका महाविद्यालय जाना चाहिए. यहां माहौल किसी प्रशिक्षण संस्थान का है, लेकिन यहां सीखने वाले सामान्य विद्यार्थी नहीं हैं. कई ऐसे चेहरे हैं, जिन पर कभी पांच लाख, छह लाख और आठ लाख रुपये तक का इनाम घोषित था. जो कभी जंगलों में हथियार लेकर घूमते थे, वे आज वेल्डिंग मशीन के सामने खड़े हैं. कोई ड्राइविंग सीख रहा है, कोई नल-जल परियोजना का संचालन, कोई फील्ड टेक्नीशियन बनने की तैयारी कर रहा है तो कोई असिस्टेंट मेसन का प्रशिक्षण ले रहा है. इस समय 97 पूर्व नक्सली यहां प्रशिक्षण ले रहे हैं, जबकि 428 लोग प्रशिक्षण पूरा कर मुख्यधारा में लौट चुके हैं. किसी भी संघर्ष का सबसे कठिन चरण लड़ाई जीतना नहीं, बल्कि लड़ाई खत्म होने के बाद लोगों को समाज में सम्मान के साथ वापस जोड़ना होता है. दंतेवाड़ा में यह कोशिश जमीन पर दिखाई देती है.

बदलाव का तीसरा चेहरा पर्यटन में दिखाई देता है. चित्रकोट जलप्रपात की गर्जना अब केवल प्रकृति प्रेमियों को ही नहीं, बल्कि देशभर से आने वाले पर्यटकों को भी आकर्षित कर रही है. तीरथगढ़ जलप्रपात, कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान, कुटुमसर गुफाएं और विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा अब फिर से पर्यटन मानचित्र पर अपनी जगह मजबूत कर रहे हैं. कुछ वर्ष पहले जिन इलाकों का नाम सुनकर लोग यात्रा टाल देते थे, वहां अब परिवार और युवा कैमरे लेकर घूमते दिखाई देते हैं. किसी संघर्षग्रस्त क्षेत्र में पर्यटकों की वापसी केवल कारोबार नहीं बढ़ाती, बल्कि यह भी बताती है कि उस इलाके को लेकर लोगों के मन में भरोसा लौट रहा है.

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सफर के दौरान मेरे ड्राइवर सुनील की बात ने भी सच्चाई उजागर की दी. उसने कहा, सर, 2011 में इन रास्तों पर गाड़ी चलाने से पहले कई बार सोचना पड़ता था. एक बार मेरे सामने ही नक्सली हमला हुआ था. पांच से सात सेकंड के अंतर पर मेरी जान बची. वरना मैं भी मर जाता. आज देखिए, हम उसी सड़क पर बिना किसी डर के आराम से घूम रहे हैं. यह किसी सरकारी रिपोर्ट का हिस्सा नहीं था, लेकिन शायद पूरे दंतेवाड़ा में आए बदलाव का सबसे सटीक बयान था. सरकारी आंकड़े हिंसा में कमी दर्ज कर सकते हैं, लेकिन लोगों के मन से डर निकला है या नहीं, इसका जवाब ऐसे अनुभव ही देते हैं.

दरअसल, नक्सलवाद केवल कानून-व्यवस्था की चुनौती कभी नहीं था. यह विकास, विश्वास और व्यवस्था से दूरी की भी कहानी थी. इसलिए इसकी सफलता या विफलता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि कितने नक्सली मारे गए या कितनों ने आत्मसमर्पण किया. असली सवाल यह है कि क्या गांवों में भरोसा लौटा है? क्या महिलाएं बिना डर घर से निकल रही हैं? क्या युवा बंदूक छोड़कर हुनर सीख रहे हैं? क्या पर्यटक उन रास्तों पर लौट रहे हैं, जहां कभी जाने से लोग कतराते थे? दंतेवाड़ा और बस्तर में इन सवालों के जवाब अब धीरे-धीरे 'हां' में मिलने लगे हैं.

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केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार पिछले वर्षों में वामपंथी उग्रवाद से जुड़ी घटनाओं और मौतों में उल्लेखनीय कमी आई है. सुरक्षा अभियानों के साथ सड़क, मोबाइल नेटवर्क, बैंकिंग, शिक्षा और आजीविका जैसी बुनियादी सुविधाओं का विस्तार भी हुआ है. लेकिन किसी भी नीति की असली सफलता आंकड़ों से नहीं, बल्कि समाज में आए बदलाव से तय होती है. जब महिलाएं रोजगार से जुड़ती हैं, जब पूर्व नक्सली फिर से सामान्य जीवन का हिस्सा बनते हैं, जब गांव तक बैंक पहुंचता है और जब पर्यटक बिना डर किसी इलाके की यात्रा करने लगते हैं, तब समझना चाहिए कि बदलाव केवल सरकारी फाइलों में नहीं, बल्कि जमीन पर भी दिखाई देने लगा है.

बस्तर की कहानी अभी पूरी नहीं हुई है. चुनौतियां आज भी हैं और कई गांव अब भी विकास की लंबी यात्रा तय कर रहे हैं. लेकिन यह भी उतना ही सच है कि किसी समाज का भविष्य उस दिन बदलना शुरू हो जाता है, जब उसकी पहचान बंदूक से हटकर बैंक, हुनर, पर्यटन और महिलाओं की भागीदारी से बनने लगे. दंतेवाड़ा और जगदलपुर में यह परिवर्तन दिखाई देने लगा है. यह कहना जल्दबाजी होगी कि सारी समस्याएं समाप्त हो गई हैं, लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि जहां कभी डर सबसे बड़ी पहचान था, वहां अब उम्मीद धीरे-धीरे अपनी जगह बना रही है. और शायद नक्सलवाद पर सबसे बड़ी और सबसे स्थायी जीत यही है.

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