फोन बन चुका है एक नया 'नशा', ऐसे बना रहा है बीमार, RML के मनोचिकित्सक ने बताया क्यों बढ़ रहे हैं एंग्जाइटी और डिप्रेशन के मामले

स्मार्टफोन का अत्यधिक उपयोग अब मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन गया है. दिल्ली के डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल के मानसिक रोग विभाग के प्रोफेसर डॉ. राम प्रताप बेनीवाल के अनुसार, फोन भी एक प्रकार का नशा बन गया है. लोगों को इसकी लत लग गई है.

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फोन से मेंटल हेल्थ हो रही खराब फोन से मेंटल हेल्थ हो रही खराब

अभिषेक पांचाल

  • नई दिल्ली ,
  • 24 जून 2026,
  • अपडेटेड 12:53 PM IST

स्मार्टफोन आज हमारी जिंदगी का सबसे अहम हिस्सा बन चुका है. फोन ने हमारे कई काम आसान बना दिए हैं, लेकिन यही सुविधा अब मानसिक स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बनती जा रही है. यहां तक कि यह एक नया नशा बन चुका है. जिस तरह शराब और तंबाकू का नशा होता है उसी तरह फोन का भी हो रहा है. देश के प्रमुख सरकारी अस्पतालों में से एक दिल्ली के डॉ. राम मनोहर लोहिया (RML) अस्पताल के मनोरोग विभाग के प्रोफेसर डॉ. राम प्रताप बेनीवाल का कहना है फोन मानसिक स्वास्थ्य को बहुत खराब कर रहा है.

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इस बारे में डॉ राम प्रताप ने आजतक.इन को डिटेल में बताया है. वह कहते हैं कि मानसिक रोगियों में अधिकतर मरीजों को एंग्जायटी और डिप्रेशन की शिकायत होती है. पहले जहां पारिवारिक और आर्थिक वजह इन समस्याओं का प्रमुख कारण हुआ करते थे, वहीं अब स्मार्टफोन और डिजिटल दुनिया लोगों की मेंटल हेल्थ को काफी खराब कर रही है. अब लोगों के जीवन में फोन एक तरह का नशा बन गया है.

फोन कैसे बन चुका है एक नया 'नशा'

डॉ बेनिवाल कहते हैं कि नशा दो प्रकार का होता है. एक पदार्थों का नशा और दूसरा व्यवहार का नशा. पदार्थों का नशा जैसे शराब, सिगरेट गांजा और अफीम, वहीं, व्यवहार का नशा मतलब किसी चीज या व्यवहार की लत होती है जिसको हम चाहकर भी कंट्रोल नहीं कर सकते हैं. अब फोन भी इस श्रेणी में आ गया है. आज कई लोग मोबाइल का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं. धीरे-धीरे यह एक व्यवहारिक लत का रूप ले रहा है. यही लत आगे चलकर एंग्जायटी और डिप्रेशन जैसी मानसिक समस्याओं को जन्म दे रही है.

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स्मार्ट फोन ऐसे बिगाड़ रहा मेंटल हेल्थ

डॉ. बेनीवाल बताते हैं कि एंग्जायटी और डिप्रेशन जैसी मानसिक बीमारियों का स्वरूप पहले जैसा ही है, लेकिन इनके पीछे की वजहें बदल गई हैं. उन्होंने कहा कि आज बड़ी संख्या में लोग घंटों मोबाइल फोन पर समय बिता रहे हैं. सोशल मीडिया, वीडियो, गेम्स और लगातार स्क्रीन पर बने रहने की आदत लोगों के दिमाग के फंक्शन पर असर डाल रही है. इससे दिमाग का नेचुरल केमिकल बैलेंस बिगड़ जाता है,  इससे मानसिक तनाव, बेचैनी, अकेलापन और डिप्रेशन जैसी समस्याएं बढ़ रही है. 

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रिश्तों में भी बढ़ रही दूरियां

स्मार्टफोन का असर केवल मानसिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है. यह लोगों के व्यक्तिगत और पति- पत्नी के रिश्तों को भी खराब कर रहा है. डॉ. बेनीवाल का कहना है कि कई बार पति-पत्नी एक ही कमरे में होते हैं, लेकिन दोनों का ध्यान एक-दूसरे की बजाय मोबाइल स्क्रीन पर होता है. इससे बातचीत कम होती है, भावनात्मक जुड़ाव घटता है और रिश्तों में दूरी बढ़ने लगती है. कुछ मामलों में यह इतना गंभीर रूप ले लेता है कि बात तलाक तक भी आ जाती है.  

डॉ बेनिवाल बताते हैं कि ऐसे कई मरीज रोज उनके पास आते हैं जिनकी मेंटल हेल्थ फोन यूज करने से खराब हो रही है. ऐसे भी केस आते हैं जहां फोन के कारण पति- पत्नी के संबंध खराब हो चुके हैं. 

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फोन का इतना यूज क्यों बढ़ गया है

डॉ बेनिवाल बताते हैं कि आज के समय में लोग अकेलेपन का शिकार हैं. सोशल मीडिया पर तो हजारो लोग जुड़े हैं, लेकिन असल जीवन में कहानी अलग है. इस अकेलेपन को भरने के लिए लोग फोन का यूज करने लगते हैं. जब वह फोन पर सोशल मीडिया चलाते हैं या कुछ देखते हैं तो उनको खुशी मिलती है. इसके पीछे दिमाग का एक हार्मोन जिम्मेदार होता है, जिसे डोपामाइन कहा जाता है.

फोन का यूज करने से लोगों के शरीर में अधिक मात्रा में डोपामाइन रिलीज होता है. इससे कुछ समय के लिए अच्छा महसूस होता है. लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब दिमाग बार-बार उसी खुशी की तलाश करने लगता है. धीरे-धीरे व्यक्ति फोन को अधिक समय देने लगता है और यह आदत लत का रूप ले सकती है.

रिसर्च भी दे रही हैं चेतावनी

PUBMed की रिसर्च में बताया गया है कि ज्यादा स्क्रीन टाइम मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ा हो सकता है.ऑनलाइन रहने से व्यक्ति खुद की तुलना दूसरों से करने लगता है. इससे मानसिक समस्याएं होने लगती हैं. व्यक्ति एंग्जाइटी और डिप्रेशन का शिकार हो सकता है. 
डॉ. बेनीवाल मानते हैं कि यदि समय रहते लोगों ने अपने फोन के इस्तेमाल को कंट्रोल नहीं किया, तो आने वाले सालों में यह एक गंभीर समस्या बन सकती है.

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फोन की लत से बचने के लिए क्या करें?

सोने से कम से कम एक घंटा पहले फोन बंद कर दें

खाने के दौरान मोबाइल का इस्तेमाल न करें

सोशल मीडिया उपयोग की सीमा तय करें

छुट्टी के दिन कुछ समय डिजिटल डिटॉक्स के लिए निकालें

सुबह उठते ही फोन देखने की आदत छोड़ें.

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