प्रोस्टेट कैंसर पुरुषों में होने वाला एक कैंसर है. 50 साल की उम्र के बादइसके मामले ज्यादा देखे जाते हैं. इस कैंसर के कई मरीजों में सर्जरी करके पूरे प्रोस्टेट ग्लैंड को ही निकाल दिया जाता है. लेकिन अब इस कैंसर के इलाज में एक बड़े बदलाव की उम्मीद है. HIFU तकनीक और क्रायोथेरेपी से कुछ मरीजों का इलाज किया गया है. जिसमें प्रोस्टेट को निकाले बिना ही केवल कैंसर वाले हिस्से का इलाज किया गया है. इसको लेकर एक रिसर्च हुई है, जिसको European Urology में प्रकाशित किया गया है.
इस रिसर्च में ब्रिटेन के 14 स्वास्थ्य केंद्रों के 3,477 ऐसे मरीजों के आंकड़े बताए गए हैं, जिन्हें शरीर के दूसरे हिस्सों में कैंसर फैलने से पहले फोकल HIFU तकनीक से उनका इलाज किया गया था. इनमें 2,897 मरीजों का HIFU से इलाज हुआ था और 580 को क्रायोथेरेपी मिली थी.10 साल तक हुई निगरानी के बाद इन मरीजों में प्रोस्टेट कैंसर से मौत की दर 0.13% रही. वहीं कैंसर के शरीर के दूसरे हिस्सों में फैलने की दर 3.3% रही. इसस पता चला कि HIFU से इलाज काफी फायदेमंद है.
रिसर्च में बताया गया है कि प्रोस्टेट कैंसर के इलाज में सर्जरी और रेडियोथेरेपी का यूज लंबे समय से इस्तेमाल होता रहा है. कई मरीजों में सर्जरी की जरूरत पड़ने पर पूरा प्रोस्टेट निकाल दिया जाता है. प्रोस्टेट पुरुषों में पेशाब की थैली के ठीक नीचे और मूत्रमार्ग (यूरिन ट्यूब) को घेरते हुए एक ग्लैंड होता है. जिसको निकाल दिया जाता है, लेकिन HIFU तकनीक में इलाज थोड़ा अलग है. इसमें कोशिश रहती है कि कैंसर वाली जगह का इलाज करके बाकी प्रोस्टेट को बचाया जा सके, ताकि बाद में पुरुषों को पेशाब संबंधी समस्या या अन्य परेशानियों का सामना न करना पड़े.
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HIFU क्या होता है इसको ऐसे समझिए
इसका नाम आपको भले ही मेडिकल और मुश्किल लगे, लेकिन इसका काम आसान भाषा में समझा जा सकता है मान लीजिए एक बड़े खेत के सिर्फ एक हिस्से में खरपतवार उग गई है. पूरे खेत को खत्म करने के बजाय अगर मशीन सिर्फ उसी हिस्से को निशाना बनाकर खरपतवार खत्म कर दे और बाकी खेत बचा रहे, तो यही फोकल इलाज की सोच है.
HIFU में बहुत तेज अल्ट्रासाउंड को प्रोस्टेट के उस हिस्से पर फोकस किया जाता है जहां कैंसर है. वहां गर्मी पैदा होती है और कैंसर वाले टिश्यू को खत्म करने की कोशिश की जाती है,यानी पूरे प्रोस्टेट को निकालने के बजाय कैंसर वाली जगह का इलाज किया जाता है.इसी वजह से इसे ‘फोकल’ यानी किसी खास हिस्से पर केंद्रित इलाज कहा जाता है.
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10 साल की रिसर्च में क्या नया पता चला?
यहां सबसे जरूरी बात समझना जरूरी है. HIFU कोई नई तकनीक नहीं है, यह कई वर्षों से इस्तेमाल हो रही है.इस नई रिसर्च में यह साबित हुआ कि यह फायदेमंद हो सकती है और इसके लिए 10 सालों का डाटा भी मिल गया. इसमें
पता चला कि करीब साढ़े तीन हजार मरीजों के लंबे फॉलोअप में बहुत कम मरीजों की मौत सीधे प्रोस्टेट कैंसर से हुई थी. वैज्ञानिकों के मुताबिक यह नतीजा सही तरीके से चुने गए मरीजों में फोकल थेरेपी की संभावनाओं को मजबूत करता है.
हालांकि इन आंकड़ों को केवल HIFU का परिणाम बताना सही नहीं होगा, क्योंकि अध्ययन में HIFU और क्रायोथेरेपी दोनों शामिल थे.
आम मरीज को इससे क्या फायदा हो सकता है?
अगर कैंसर प्रोस्टेट के सीमित हिस्से में है और मरीज इसके लिए सही है, तो डॉक्टर पूरे प्रोस्टेट को हटाने के बजाय कैंसर वाले हिस्से का इलाज करने पर विचार कर सकते हैं. इससे इलाज के दौरान स्वस्थ प्रोस्टेट और उसके आसपास के जरूरी हिस्सों को बचाने की कोशिश की जाती हे. इसका मकसद खास तौर पर पेशाब पर कंट्रोल और यौन क्षमता जैसी सामान्य शारीरिक क्षमताओं पर असर को कम रखना है. लेकिन इसे यह समझना गलत होगा कि HIFU कराने वाले हर मरीज को ये परेशानियां नहीं होंगी, इसका फायदा मरीज की बीमारी और इलाज की परिस्थितियों पर निर्भर करता है.
भारत में भी बढ़ रहा HIFU का इस्तेमाल
भारत में प्रोस्टेट कैंसर के मामलों में बढ़ती जागरूकता, PSA जांच, मल्टीपैरामेट्रिक MRI और टार्गेटेड बायोप्सी जैसी सुविधाओं की उपलब्धता के कारण बीमारी का पहले चरण में पता लगाने की संभावना बढ़ी है. ऐसे मामलों में कुछ चुनिंदा मरीजों के लिए फोकल थेरेपी पर विचार किया जा सकता है
देश के कुछ प्रमुख संस्थानों ने मरीजों के लिए अपनी मल्टीडिसिप्लिनरी प्रोस्टेट कैंसर सेवाओं में HIFU को शामिल किया है. इनमें राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर, नई दिल्ली, टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल, मुंबई और कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल, मुंबई जैसे संस्थान शामिल हैं,
राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर के मेडिकल डायरेक्टर और चीफ ऑफ जेनिटोरिनरी ऑन्कोलॉजी डॉ. सुधीर रावल ने बताया कि पूरे प्रोस्टेट के HIFU से आगे बढ़कर ऑर्गन-प्रिजर्विंग फोकल थेरेपी की ओर जाना प्रोस्टेट कैंसर के इलाज में एक महत्वपूर्ण बदलाव है.
उन्होंने कहा कि लंबे समय के आंकड़े उत्साहजनक हैं, लेकिन बेहतर परिणामों के लिए मरीज का सावधानीपूर्वक चयन, और अनुभवी मेडिकल टीम जरूरी है.
हर मरीज के लिए नहीं है यह इलाज
डॉक्टर को पहले पता करना होता है कि कैंसर कहां है, कितना फैला है और कितना आक्रामक है. इसके लिए PSA, MRI और बायोप्सी जैसी जांचों की मदद ली जाती है. इसके बाद ही फैसला होता है कि मरीज फोकल HIFU के लिए सही है या नहीं.
आजतक हेल्थ डेस्क