कोविड-19 महामारी को गुजरे हुए भले ही कुछ साल बीत चुके हों, लेकिन आज भी जब कोई अचानक बीमार पड़ता है या किसी युवा को हार्ट अटैक पड़ता है, तो सबसे पहला सवाल यही उठता है, क्या यह कोविड का साइड-इफेक्ट है?
आजतक के हेल्थ वेल्थ समिट के मंच पर देश के नामी-गिरामी डॉक्टरों सीनियर कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. पद्मश्री डॉ. डी.एस. गंभीर, डॉ. मनोज कुमार, डॉ. संजय सचदेवा और गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. प्रीति अग्रवाल ने इस गंभीर विषय पर खुलकर चर्चा की.
इस सत्र में उन्होंने बताया कि युवाओं में बढ़ती दिल की बीमारियां, स्ट्रेस और महिलाओं में कंसीविंग (गर्भावस्था) से जुड़ी समस्याओं के पीछे असल में क्या वजहें छिपी हैं. आइए जानते हैं इस हाई-प्रोफाइल पैनल चर्चा से आपके काम की कौन-कौन सी बड़ी बातें सामने आईं.
क्या हर बीमारी के लिए कोविड ही जिम्मेदार है?
सत्र की शुरुआत करते हुए पद्मश्री डॉ. डी.एस. गंभीर ने स्पष्ट किया कि हालांकि कोविड के दौरान शरीर के ब्लड क्लॉटिंग सिस्टम और अंगों पर बुरा असर पड़ा था और इससे हार्ट डिजीज के मामले बढ़े हैं, लेकिन हर बात के लिए कोविड या कोरोना वायरस को दोष देना बिल्कुल सही नहीं है.
उन्होंने आंकड़े देते हुए बताया कि युवाओं में होने वाले हार्ट अटैक के मामलों में आधे से कम लोगों को ही कभी कोविड हुआ था, जबकि 70% से ज्यादा ऐसे मरीज भी हैं जिन्हें कभी कोविड नहीं हुआ था. इसका मतलब यह है कि इसके पीछे हमारी बदलती जीवनशैली और अन्य मेडिकल कारण भी उतनी ही बड़ी भूमिका निभा रहे हैं.
युवाओं में क्यों बढ़ रहे हैं हार्ट अटैक?
डॉ. मनोज कुमार ने बताया कि ब्रिटेन की एक स्टडी के मुताबिक कोविड से पीड़ित लोगों में दिल के दौरे का जोखिम जरूर बढ़ा है, क्योंकि वायरस ने रक्त धमनियों की अंदरूनी लाइनिंग को प्रभावित किया है. लेकिन इसके साथ ही कुछ अन्य बड़े 'नॉन-ट्रेडिशनल रिस्क फैक्टर' भी तेजी से उभर रहे हैं. इनमें से एक सेडेंटरी लाइफस्टाइल (सुस्त जीवनशैली) है. यानी जो लोग दिनभर में 10 घंटे से ज्यादा कुर्सी पर बैठे रहते हैं, उनमें हार्ट अटैक का खतरा दोगुना हो जाता है.
हाई बीपी, डायबिटीज, स्मोकिंग और मोटापा जैसी चीजें युवाओं को बहुत कम उम्र में अपना शिकार बना रही हैं. डॉ. संजय सचदेवा ने जोड़ा कि नाक और साइनस की हाइजीन और कमजोर इम्यूनिटी भी शरीर को बाकी संक्रमणों के प्रति संवेदनशील बना रही है.
तनाव और 'टाइप-A' पर्सनैलिटी छोड़ रही है दिल पर वार
डॉ. गंभीर ने बड़े ही दिलचस्प अंदाज में समझाया कि मानसिक तनाव और हमारी कार्यशैली सीधे तौर पर हमारी सेहत को तय करती है.
टाइप-A पर्सनैलिटी: जो लोग हर वक्त टेंशन लेते हैं, कॉम्पिटिटिव रेस में भागते रहते हैं और हर बात को अपने दिल से लगा लेते हैं, उन्हें हार्ट अटैक का खतरा सबसे ज्यादा होता है.
टाइप B पर्सनैलिटी: जो लोग काम को कूल होकर करते हैं, ऑफिस की टेंशन ऑफिस में छोड़कर घर आते हैं, वे ज्यादा सुरक्षित रहते हैं.
डॉक्टरों की सीधी सलाह है कि विकसित भारत जरूर बनाइए, लेकिन खुद को तनाव की भट्टी में मत झोंकिए." ऑफिस का स्ट्रेस घर लेकर न आएं.
महिलाओं में प्रेग्नेंसी डिले और कंसीविंग की समस्याएं
प्रजनन स्वास्थ्य पर बात करते हुए डॉ. प्रीति अग्रवाल ने बताया कि कोविड के समय कई दंपतियों ने अपनी फैमिली प्लानिंग को पोस्टपोन कर दिया था. उम्र बढ़ने के साथ महिलाओं में एग्स की क्वालिटी और संख्या प्राकृतिक रूप से कम होती जाती है. जिन महिलाओं ने 30 से 35 साल की उम्र के बाद कंसीव करने का सोचा, उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ा.
इसके अलावा, आज की युवा पीढ़ी में स्मोकिंग, अल्कोहल और अत्यधिक तनाव का बढ़ता चलन भी उनके रिप्रोडक्टिव हेल्थ को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है. इसलिए सिर्फ कोविड को दोष देने के बजाय सही समय पर मेडिकल सलाह लेना ज्यादा जरूरी है.
विशेषज्ञों का एक सुर में यही संदेश था कि बदलती लाइफस्टाइल, जंक फूड, एक्ससाइज की कमी और जरूरत से ज्यादा मानसिक तनाव हमारी सेहत के सबसे बड़े दुश्मन बन चुके हैं. अगर हम समय रहते संभल जाएं, अपने खानपान और रूटीन को सुधार लें, तो दिल की बीमारियों और अन्य गंभीर समस्याओं के खतरे को काफी हद तक कम कर सकते हैं.
आजतक हेल्थ डेस्क