आजकल आप दुकान या ग्रोसरी स्टोर पर कोई सामान खरीदने जाते हैं तो कई बार ऐसा होता होगा है कि खाने का कोई पैकेट आपने सिर्फ इसलिए खरीद लिया होगा क्योंकि उस पर बड़े अक्षरों में लिखा 100% प्योर, '100% नेचुरल', लिखा था. ऐसे शब्द मन में भरोसा पैदा करते हैं कि यह सब लिखा है तो सच ही होगा. उसपर आप अगर FSSAI की मुहर देख लेते होंगे तो फिर पैकेट खरीद ही लेते होंगे कि मुहर लगी है तो 100 Pure वाली बात ठीक ही होगी, लेकिन हाल ही में FSSAI (Food Safety and Standards Authority of India) ने डाबर इंडिया को शहद, घी और तेल समेत कुछ फूड प्रोडक्ट पर '100%' जैसे दावों को लेकर नोटिस भेजा है. साथ ही 100 प्रतिशत' के दावे के साथ इन चीजों को बेचने पर रोक लगा दी है.
इसके बाद यह सवाल फिर चर्चा में है कि आखिर किसी भी खाने की चीज पर लिखे ऐसे दावे कितने सच होते हैं? क्या इन दावों की सच्चाई के लिए कोई मेडिकल टेस्ट होते हैं? और अगर किसी पैकेट पर FSSAI का लाइसेंस नंबर है, तो क्या इसका मतलब उस पर लिखा हर दावा भी बिलकुल सही है? आजतक.in ने इन्हीं सवालों के जवाब जानने के लिए FSSAI और सफदरजंग अस्पताल में मेडिसिन विभाग में डायरेक्टर प्रोफेसर डॉ. जुगल किशोर से बात की है.
फूड प्रोडक्ट का FSSAI से रजिस्ट्रेशन होने का क्या मतलब होता है?
FSSAI के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि किसी भी पैकेड फूड प्रोडक्ट पर FSSAI लाइसेंस/रजिस्ट्रेशन नंबर होने का मतलब यह है कि संबंधित कंपनी ने Food Safety and Standards Act, 2006 के तहत उस फूड को बेचने का कारोबार करने के लिए जरूरी परमिशन ले ली है.
जब कोई कंपनी शहद, घी, खाद्य तेल, बिस्कुट या अन्य फूड प्रोडक्ट को बनाने और बिक्री के लिए लाइसेंस लेती है तो उसे फूड सेफ्टी और उसकी क्वालिटी से संबंधित सभी पैरामीटर का पालन करना होता है, राज्य सरकारों के प्रवर्तन अधिकारी समय-समय पर निरीक्षण और उस प्रोडक्ट के सैंपल लेकर जांच करते हैं .अगर कोई कंपनी नियमों का उल्लंघन करती है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाती है,
FSSAI के Advertising and Claims Regulations के तहत किसी भी फूड बिजनेस को ऐसा दावा करने की अनुमति नहीं है, जो ग्राहक को भ्रमित कर सकता हो, किसी प्रोडक्ट को "100% नेचुरल,100% प्योर वाले दावे तभी किए जा सकते हैं, जब वे संबंधित नियमों और मेडिकल साइंस में इसको साबित किया जा चुका हो, लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ है तो फिर इस तरह के किसी दवा को करने वाली कंपनी कार्रवाई के दायरे में आती है.
100% नेचुरल,100% प्योर वाले दावे क्यों किए जाते हैं?
अधिकारी ने बताया कि FSSAI लगातार ग्राहकों को फूड प्रोडक्ट के लेबल पढ़ने के लिए भी प्रेरित और जागरूक करता है, ताकि वे किसी चीज को खरीदते समय भ्रामक विज्ञापन और गलत दावों के चक्कर में ना फंसे.
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि FSSAI का लाइसेंस या रजिस्ट्रेशन फूड बिजनेस चलाने की अनुमति है, लेकिन अगर कोई फूड प्रोडक्ट कंपनी नियमों का उल्लंघन करती है, तो जांच के आधार पर उसका लाइसेंस सस्पेंड किया जा सकता है और उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है. FSSAI ही फूड सेफ्टी से जुड़े स्टैंडर्ड्स और रेगुलेशन बनाता है, जिसे राज्यों के खाद्य सुरक्षा विभाग लागू करवाते हैं.
अधिकारी के अनुसार, "100% प्योर" जैसे दावों का ग्राहक के खरीद करने से संबंधी फैसले पर सीधा असर डालता है. इनको देखकर लोग प्रोडक्ट को खरीदने लगते हैं. इसलिए कानून यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी कंपनी अपने प्रोडक्ट को लेकर कोई दावा भ्रामक ना करें, बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया या ग्राहक को गुमराह करने वाला दावा अगर है तो फिर उसके खिलाफ एक्शन लिया जाता है.
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डाबर को नोटिस भेजने का क्या कारण है?
किसी भी कंपनी के खिलाफ कार्रवाई Food Safety and Standards Act, 2006 और उसके तहत बनाए गए संबंधित नियमों और रेगुलेशन के अनुसार की जाती है. जरूरत पड़ने पर कंपनी से स्पष्टीकरण मांगा जाता है, नोटिस जारी किया जाता है, जांच की जाती है और नियमों का उल्लंघन अगर साबित हो जाता है तो कार्रवाई की जाती है.
अधिकारी ने बताया कि डाबर को जो नोटिस भेजा गया है वह नियमों के उल्लंघन को लेकर भेजा गया है, उन्होंने शहद और घी को 100 फीसदी प्योर बताया है, लेकिन सही में ऐसा होता नहीं है. ये लोगों को गुमराह करने वाली लाइन है.
क्या फूड प्रोडक्ट के लिए कोई मेडिकल टेस्ट होता है?
इस सवाल पर सफदरजंग अस्पताल में मेडिसिन विभाग में डायरेक्टर प्रोफेसर डॉ. जुगल किशोर ने बताया है. वह कहते हैं कि खानपान के कई प्रोडक्ट का लैब में टेस्ट होता ही है, लेकिन यहां आपको फूड टेस्ट और मेडिकल टेस्ट का फर्क समझना होगा.
जब कोई कंपनी शहद, घी या तेल का लैब टेस्ट कराती है तो उसका मकसद यह जानना होता है कि प्रोडक्ट खाने के लिए सुरक्षित है या नहीं, उसमें कोई खतरनाक बैक्टीरिया तो नहीं है. किसी तरह के केमिकल को तो नहीं डाला गया है. अगर डाला है को उसकी मात्रा क्या है. अगर यह सब चीजें ठीक हैं तो प्रोडक्ट मार्केट में बिक्री के लिए जा सकता है. लेकिन यह टेस्ट ये साबित नहीं करते हैं कि वह प्रोडक्ट 100 प्योर है.
डॉ किशोर कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि शहद को सीधे मधुमक्खियों के छत्ते से तोड़ा और पैकेट या बोतल में भर दिया. उसको कई तरह से प्रोसेस किया जाता है. कुछ प्रिजरवेटिव डालते हैं. पूरा प्रक्रिया के बाद वह तैयार होता है. इसके बाद फूड टेस्ट किया जाता है, जिसमें देखा जाता है कि फूड में कोई मिलावट तो नहीं हैं और लोगों के खाने के लिए सुरक्षित है या नहीं, लेकिन फूड टेस्ट यह साबित नहीं करता कि वह प्रोडक्ट 100 फीसदी प्योर या नेचुरल है. इसलिए किसी पैकेट पर लिखा हर क्लेम क्वालिटी टेस्ट के हिसाब से तो सही है, लेकिन मेडिकल टेस्ट और मेडिकल साइंस के हिसाब से ऐसा नहीं होता है. यही कारण है कि FSSAI ऐसे दावों को करने वालों को गंभीरता से देखता है और जरूरत पड़ने पर कंपनियों से उसका वैज्ञानिक आधार मांगता है.
तो आम लोगों को अब क्या करना चाहिए
इस बारे में डॉ किशोर कहते हैं कि किसी भी पैकेज्ड फूड को सिर्फ सामने लिखी बड़ी-बड़ी लाइनों के आधार पर न खरीदें. पैकेट पलटकर इंग्रीएंटस लिस्ट पढ़ें और FSSAI License Number जरूर देखें. आप कोई भी प्रोडक्ट उसके लिखे दावों विज्ञापन में बताए दावों के आधार पर बिलकुल न खरीदें.
अभिषेक पांचाल