आमतौर पर एक आदमी जब अपनी आंखें डोनेट करता है तो उससे दो लोगों के जीवन में रोशनी आती है. लेकिन अब एक डोनर की आंखें दान करने से 4 से 6 लोगों की जिंदगी का अंधेरा दूर हो रहा है. AIIMS नई दिल्ली के डॉ. राजेंद्र प्रसाद सेंटर फॉर ऑप्थेलमिक साइंसेज में कॉर्निया सर्जरी के लिए एक नई तकनीक के इस्तेमाल से ऐसा किया जा रहा है. इसमें डॉक्टर आंख के एक कॉर्निया के अलग-अलग हिस्सों का यूज करके कई मरीजों का इलाज कर रहे हैं. ऐसे समय में जब देश में कॉर्निया की जरूरत बहुत ज्यादा है, यह बदलाव काफी अहम माना जा रहा है.
AIIMS दिल्ली के आर.पी सेंटर की चीफ डॉ. राधिका टंडन ने इस बारे में Aajtak. in से बातचीत में बताया है. वह कहती हैं कि कॉर्निया आंख की सबसे बाहर पारदर्शी परत होती है. इससे होकर ही रोशनी अंदर जाती है. अगर किसी इंफेक्शन, आंखों की बीमारी या हादसे के कारण इस परत को नुकसान पहुंचे तो व्यक्ति कि आंख की रोशनी जा सकती है. ऐसे में रोशनी वापिस लाने के लिए कॉर्निया ट्रांसप्लांट किया जाता है. इसमें एक व्यक्ति की आंख से स्वस्थ कार्निया को निकालकर दूसरे व्यक्ति में लगाया जाता है. आमतौर पर एक डोनर की दोनों आंखों से दो अलग- अलग व्यक्तियों की रोशनी लौटती है, लेकिन नई तकनीक में एक डोनर की मदद से 2 से 6 लोगों की आंखों में रोशानी वापिस लाई जा सकती है. इस तकनीक को लैमलर कॉर्नियल ट्रांसप्लांट कहते हैं.
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लैमलर कॉर्नियल ट्रांसप्लांट क्या होता है
डॉ. राधिका ने बताया कि हर मरीज में पूरी कॉर्निया बदलने की जरूरत नहीं होती. कुछ मरीजों में कॉर्निया की सिर्फ एक खास परत खराब होती है. ऐसी स्थिति में डॉक्टर लैमलर कॉर्नियल ट्रांसप्लांट जैसी तकनीकों का इस्तेमाल कर सकते हैं. AIIMS के RP Centre में इसी तरह की आधुनिक तकनीक के जरिए एक डोनर कॉर्निया के अलग-अलग हिस्सों का इस्तेमाल कई मरीजों का इलाज किया जा रहा है.
इसको ऐसे समझें कि अगर एक मरीज को कॉर्निया की एक परत की जरूरत है और दूसरे मरीज को दूसरी परत की, तो हर मरीज के लिए एक डोनर का पूरा एक कॉर्निया इस्तेमाल करने के बजाय उसके जरूरत वाले हिस्से को ही निकालकर यूज किया जा सकता है. बाकी बचे हिस्से को दूसरे जरूरतमंद मरीज में ट्रांसप्लांट किया जा सकता है. इससे फायदा ये होता है कि एक ही डोनर के कॉर्निया के हिस्सों को अलग करके दो या तीन अलग-अलग मरीजों की आंखों में ट्रांसप्लांट किया जा सकता है. इसको सिंगल डोनर, मल्टीपल रिसिपिएंट्स कहते हैं.
यह नॉर्मल कॉर्निया ट्रांसप्लांट से लैमलर कॉर्नियल ट्रांसप्लांट काफी अलग भी है. नॉर्मल कॉर्निया ट्रांसप्लांट में कॉर्निया की सभी परतों को डोनर टिश्यू से बदला जाता है, जबकि लैमलर कॉर्नियल ट्रांसप्लांट में पूरे कॉर्निया को बदलने के बजाय केवल खराब परत को बदला जाता है.
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भारत में इसकी जरूरत क्यों है?
देश में कॉर्नियल ब्लाइंडनेस यानी कॉर्निया खराब होने की वजह से होने वाले अंधापन एक बड़ी समस्या है ऐसे मरीजों के लिए कॉर्नियल ट्रांसप्लांट कई बार नजर वापस पाने का अच्छा रास्ता है. लेकिन इसके लिए सबसे जरूरी चीज है डोनर है. इसके लिए AIIMS का नेशनल आई बैंक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. नेशनल आई बैंक ने पिछले 61 वर्षों में 38 हजार से ज्यादा कॉर्निया जुटाए हैं और 28 हजार से ज्यादा लोगों में कॉर्निया ट्रांसप्लांट के जरिए नजर वापिस लाई है. अब इसी कड़ी में मरीजों को लैमलर कॉर्नियल ट्रांसप्लांट की सुविधा भी दी जा रही है.
अभिषेक पांचाल