पैसा देंगे, मौका नहीं... दिल्ली में महिलाओं के लिए खूब वादे, लेकिन टिकट देने से क्यों बचती हैं पार्टियां

दिल्ली में सियासी दल महिलाओं को पैसा देने को तो तैयार हैं लेकिन टिकट देकर मौका देने को राजी नहीं हैं. यही वजह है कि तीनों पार्टियों में से किसी ने 70 सीटों वाली दिल्ली में इस बार 9 से ज्यादा महिलाओं को टिकट नहीं दिया है.

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 चुनाव में कब बढ़ेगी महिलाओं की उम्मीदवारी चुनाव में कब बढ़ेगी महिलाओं की उम्मीदवारी

अनुग्रह मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 23 जनवरी 2025,
  • अपडेटेड 5:34 PM IST

दिल्ली में विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार जोर-शोर से चल रहा है और इस बार महिलाओं के लिए वादों की झड़ी लग गई है. दिल्ली की तीनों ही प्रमुख पार्टियां AAP, बीजेपी और कांग्रेस ने महिलाओं को न सिर्फ सुविधाएं बल्कि कैश देने तक के वादे कर डाले हैं. चुनाव में महिला वोटर्स निर्णायक साबित होते हैं, ऐसे में राजनीतिक दलों का फोकस भी महिलाओं पर है. दिल्ली में सियासी दल महिलाओं को पैसा देने को तो तैयार हैं लेकिन टिकट देकर मौका देने को राजी नहीं हैं. यही वजह है कि तीनों पार्टियों में से किसी ने 70 सीटों वाली दिल्ली में इस बार 9 से ज्यादा महिलाओं को टिकट नहीं दिया है.

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दिल्ली में सिर्फ 13% महिला उम्मीदवार

महिला आरक्षण बिल संसद से भले ही पारित हो गया है लेकिन उसके जमीन पर उतरने में अभी वक्त लगेगा. लेकिन दिल्ली के विधानसभा चुनाव में एक तिहाई तो दूर की बात तीनों ही दलों ने 13 फीसदी से भी कम महिला उम्मीदवार उतारे हैं. इस मामले में आम आदमी पार्टी, बीजेपी और कांग्रेस एक ही पायदान पर हैं और तीनों पार्टियों ने चुनाव में 9-9 महिलाओं को टिकट दिया है. ये हाल तब है तब दिल्ली में महिला वोटर्स की संख्या करीब 46 फीसदी है और पिछले चुनाव में 62 फीसदी महिलाओं ने सरकार चुनने के लिए वोट किया था. लेकिन सियासी दल महिलाओं का वोट तो हासिल करना चाहते हैं लेकिन उन्हें प्रतिनिधित्व देने के मामले में काफी पीछे हैं.

दिल्ली चुनाव में AAP ने महिलाओं को 2100 रुपये देने का वादा किया है तो जवाब में कांग्रेस और बीजेपी 2500 देने को तैयार हैं. इसके साथ बीजेपी 500 रुपये कम में एलपीजी सिलेंडर देने और गर्भवती महिलाओं के लिए भी वादे कर चुकी है. साथ ही AAP सरकार की तरफ से महिलाओं को फ्री बस यात्रा पहले से ही चल रही है. बुजुर्ग महिलाओं को मुफ्त स्वास्थ्य सुविधाएं मिल रही हैं. लेकिन इन राजनीतिक दलों ने टिकट सिर्फ उन महिलाओं को दिए हैं जिनका पहले से कोई सियासी बैकग्राउंड है, उनके पति या पिता विधायक या फिर पार्षद रह चुके हैं. 

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तीन महिलाएं बनीं मुख्यमंत्री

दिल्ली में 1993 से 2020 तक हुए 7 विधानसभा चुनावों में कभी भी 9 से ज्यादा महिला विधायक नहीं रही हैं. इस दौरान दिल्ली को कुल 8 मुख्यमंत्री मिले हैं जिनमें तीन महिलाएं शामिल हैं. सबसे लंबा कार्यकाय शीला दीक्षित का रहा जो कांग्रेस की सरकार में 1998, 2003 और 2008 तीन बार मुख्यमंत्री रहीं. इससे पहले बीजेपी की सरकार में 1998 में कुछ दिन के लिए सुषमा स्वराज को दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाया गया था. पिछले साल आम आदमी पार्टी की ओर से आतिशी को अरविंद केजरीवाल के इस्तीफे का बाद CM बनने का मौका मिला था.   

दिल्ली में 1998 में सबसे ज्यादा 9 महिलाएं विधायक बनीं और यह रिकॉर्ड अब तक बरकारर है. अब तक हुए सात विधानसभा चुनावों में दिल्ली में कुल 39 महिला विधायक रही हैं जिनमें कांग्रेस की 20, AAP की 17 और बीजेपी की दो महिला विधायक शामिल हैं. एक रिकॉर्ड यह भी है कि दिल्ली में अब तक कोई निर्दलीय महिला उम्मीदवार चुनाव नहीं जीती है. हालांकि पिछली बार के मुकाबले इस बार सियासी दलों ने 20 ज्यादा महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया है. 2020 में दिल्ली में 76 महिला उम्मीदवार थीं जिनकी संख्या इस बार 96 पहुंच गई है. पिछले बार कांग्रेस ने 10, आप ने 9 और बीजेपी ने सिर्फ 3 महिलाओं को टिकट दिया था, जिनमें कुल 8 महिलाएं चुनाव जीती थीं.

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'महिला आरक्षण का कोई भविष्य नहीं'

दिल्ली चुनाव में महिलाओं की भागीदारी और मुफ्त के वादों पर एडीआर के सह संस्थापक जगदीप छोकर का कहना है कि इस तरह के वादे पूरी तरह से गलत हैं क्योंकि ये सारा पैसा जनता के टैक्स से ही आता है, फिर चाहे वो आम आदमी हो या फिर सड़क पर भीख मांगने वाला भिखारी. हर कोई किसी ने किसी रूप में टैक्स देता है और उसी टैक्स के पैसे से चुनावों में ये फ्री की रेवड़ियां बांटी जा रही हैं. उन्होंने कहा कि कोई भी पार्टी मुफ्त में कुछ भी नहीं दे रही बल्कि ये जनता का ही पैसा है.

जगदीप छोकर ने कहा कि वोट पाने के लिए महिलाओं को प्रलोभन तो दिए जा रहे हैं लेकिन उन्हें टिकट नहीं दी जाती. उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण बिल तो पास हो गया लेकिन उन्हें टिकट बंटवारे में आरक्षण मिलेगा कब ये कोई नहीं जानता. वो आरक्षण अगले परिसीमन के बाद मिलेगा, जो अगली जनगणना के बाद होगा. ऐसे में फिलहाल उसका कोई भविष्य नजर नहीं आता. ऐसे में महिलाओं को चुनाव में भागीदारी कब मिल पाएगी, इसका जवाब दे पाना मुश्किल है.

'पार्टियों की क्षमता देखें, सिर्फ वादे नहीं'

दिल्ली यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर संजय कुमार देशभर में महिलाओं को फोकस में रखकर शुरू होने वाली योजनाओं को अच्छी पहल मानते हैं. उनका कहना है कि सियासी दल महिला वोटर्स की समस्याओं और उनकी जरूरतों का ध्यान रख रहे हैं, यह एक तरह से महिला सशक्तिकरण को दर्शाता है. लेकिन सवाल यह है कि क्या ये वादे और योजनाएं जमीन पर उतर पाएंगी. उन्होंने कहा कि कुछ राज्यों में महिलाओं के लिए जो वादे किए गए वो चुनाव बाद पूरी नहीं हुए हैं. ऐसे में सवाल उठने लाजमी हैं. ऐसे में महिला वोटर्स को भी उस पार्टी को चुनना चाहिए जिसमें वादों को जमीन पर उतारने की क्षमता हो ताकि चुनाव के बाद उनके साथ धोखा न हो. 

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प्रोफेसर संजय कुमार का कहना है कि दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है और यहां बजट की कुछ सीमाएं हैं. ऐसे में जो भी दल चुनावी वादे कर रहे हैं, वह इन बातों को जरूर ध्यान रखें ताकि अगर वो चुनाव जीतते हैं तो उन्हें पूरा कैसे किया जाएगा. भागीदारी के सवाल पर उन्होंने कहा कि किसी सीट पर अगर महिला उम्मीदवार का दावा मजबूत होता है तभी कोई पार्टी वहां से उसे टिकट देती है. लेकिन दिल्ली के सभी इलाकों में महिलाओं की दावेदारी उतनी मजबूत नहीं दिखती, ऐसे में पार्टियां भी जिताऊं उम्मीदवार देखकर ही टिकट बांटती हैं. हां, अगर आरक्षण लागू होता है तो पार्टियों को निश्चित सीटों पर महिलाओं को टिकट देना ही पड़ता. उन्होंने कहा कि सरकार-संगठन के स्तर पर भी महिलाओं की भागीदारी में कमी टिकट वितरण में उनके पिछड़ने की एक बड़ी वजह है. 

दिल्ली में प्रमुख राजनीतिक दलों ने इस बार पहले के मुकाबले भले ही ज्यादा महिलाओं को टिकट दिया हो लेकिन फिर भी 21 सीटें ऐसे ही जहां एक भी महिला उम्मीदवार नहीं है. इन सीटों में चांदनी चौक, दिल्ली कैंट, द्वारका और रोहिणी जैसे इलाके शामिल हैं. यहां बड़ी पार्टियों के के साथ-साथ छोटे दल, यहां तक कि कोई निर्दलीय महिला उम्मीदवार भी मैदान में नहीं है. पिछली बार 23 सीटें ऐसी थी जिन पर एक भी महिला उम्मीदवार चुनाव नहीं लड़ी थी. 

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