पिछला कुछ समय विरोध के नाम गया है. जंतर मंतर पर विरोध, जेन-ज़ी का विरोध, विपक्ष का विरोध और सरकार का विरोध. प्रोटेस्ट या विरोध प्रदर्शन का मतलब अपनी बात, असंतोष या मांगों को सार्वजनिक रूप से सरकार, प्रशासन या समाज के सामने रखना है. क्यूंकि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, तो विरोध दर्ज कराने के कई पारंपरिक और आधुनिक तरीके अपनाए जाते हैं. देश के संविधान ने आपको विरोध का अधिकार दिया है, सर्वोच्च अदालत ने समय-समय पर उन अधिकारों पर टिप्पणी भी की हैं.
समय के साथ विरोध का तरीका बदलता है और साथ ही बदलता है विरोध को सहने का तरीका. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक टिप्पणी भी की, जिसमें कहा कि विरोध करने का अधिकार सभी को है, लेकिन कोई भी एक समूह या व्यक्ति तय प्रदर्शन स्थल पर अनिश्चितकाल के लिए कब्जा जमाकर नहीं बैठ सकता. सर्वोच्च अदालत की इसी टिप्पणी के बाद विरोध प्रदर्शन को लेकर एक नई बहस शुरू हुई. भारत में विरोध का इतिहास क्या रहा है, कैसे विरोध प्रदर्शनों ने सत्ता को बदला है या झुकाया है, एक नज़र डालते हैं…
संविधान में विरोध का अधिकार:
संविधान निर्माताओं ने जब इसे बनाया, तो इस बात का ध्यान रखा कि लोकतंत्र की गरिमा बनी रही. तभी भारतीय संविधान नागरिकों को अपने विचारों को खुलकर रखने और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने के बुनियादी अधिकार देता है. संविधान के भाग-3 के तहत मौलिक अधिकारों में ये प्रावधान शामिल हैं:
भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: अनुच्छेद 19(1)(a) हर नागरिक को अपने विचार, मत और असंतोष को बोलकर, लिखकर या अन्य माध्यमों से व्यक्त करने की छूट देता है.
शांतिपूर्ण सभा करने का अधिकार: अनुच्छेद 19(1)(b) बिना हथियारों के शांतिपूर्वक इकट्ठा होने और सभा करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है.
संगठन बनाने की स्वतंत्रता: अनुच्छेद 19(1)(c) नागरिकों को संघ, यूनियन या संगठन बनाने का अधिकार देता है.
अब ये समझना ज़रूरी है कि ये अधिकार पूर्ण नहीं हैं. संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत इन पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं. ये प्रतिबंध देश की संप्रभुता, अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता, नैतिकता या अदालत की अवमानना जैसे आधारों पर लगाए जाते हैं.
विरोध प्रदर्शन पर सर्वोच्च अदालत की राय:
हाल ही में राजधानी दिल्ली में लगातार हो रहे विरोध प्रदर्शन के बीच जब शहर के व्यापारियों ने अदालत में गुहार लगाई. तब सर्वोच्च अदालत की एक टिप्पणी आई, अदालत ने कहा कि कोई भी प्रदर्शनकारी लंबे वक्त तक किसी प्रदर्शन स्थल पर कब्जा नहीं कर सकता है, ऐसा करने पर अन्य लोगों को प्रदर्शन करने में दिक्कत आ सकती है.
ये सिर्फ एक केस का मामला है, लेकिन सर्वोच्च अदालत ने कई मामलों में विरोध प्रदर्शन को लेकर अहम टिप्पणियां की हैं. जो कि बताता है कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन सिर्फ सरकार ही नहीं, बल्कि नागरिक की भी ज़िम्मेदारी है.
अमित साहनी बनाम दिल्ली सरकार (शाहीन बाग मामला, 2020): इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि अनिश्चितकालीन समय के लिए सार्वजनिक रास्तों, सड़कों या सार्वजनिक जगहों पर कब्जा करके प्रदर्शन नहीं किया जा सकता है. अदालत ने कहा था कि अधिकार और कर्तव्य साथ-साथ चलते हैं और विरोध के नाम पर आम जनता को भारी असुविधा में नहीं डाला जा सकता.
सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा: कई मामलों में शीर्ष अदालत ने यह भी तय किया है कि विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान नहीं पहुंचाया जाना चाहिए. यदि प्रदर्शनकारियों की ओर से हिंसा का सहारा लिया जाता है, तो प्रशासन और पुलिस कानून के दायरे में कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र हैं.
जब प्रोटेस्ट का अधिकार खत्म होता है:
ऐसा नहीं है कि नागरिक के विरोध प्रदर्शन के अधिकार हमेशा के लिए हैं. कुछ खास परिस्थितियों में ये अधिकार समाप्त हो जाते हैं या इन्हें गैरकानूनी घोषित कर दिया जाता है:
हिंसा और हथियार: जब कोई प्रदर्शन हिंसक हो जाए, तोड़फोड़ शुरू हो जाए या प्रदर्शनकारी हथियार लेकर सड़कों पर उतर आएं, तब विरोध का अधिकार कानूनी दायरे से बाहर हो जाता है.
राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून-व्यवस्था: यदि कोई प्रोटेस्ट देश की संप्रभुता, अखंडता, सार्वजनिक सुरक्षा या कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बन जाए, तो प्रशासन को उसे रोकने का पूरा अधिकार है.
सार्वजनिक मार्गों का अनिश्चितकालीन अवरोध: सड़क, हाईवे या रेलवे ट्रैक को अनिश्चितकाल के लिए बाधित करना नागरिकों के आवागमन के अधिकार का हनन माना जाता है, इसलिए ऐसे प्रदर्शनों पर रोक लगाई जा सकती है.
कानूनी आदेशों की अवहेलना: प्रशासन द्वारा लगाई गई निषेधाज्ञा (जैसे धारा 144) या न्यायालय के स्पष्ट आदेशों का उल्लंघन करके किए जाने वाले प्रदर्शन अवैध माने जाते हैं.
प्रोटेस्ट, जो यादगार रहे:
इस मुल्क ने करीब 80 साल पहले ही आज़ादी पाई है. इतिहास के पन्नों में ये उम्र बहुत छोटी होती है. फिर भी भारत में कई ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शन देखने को मिले हैं.
जेपी आंदोलन (1974) : आज़ादी के बाद सबसे बड़ा राजनीतिक आंदोलन. इसी विरोध प्रदर्शन ने इंदिरा गांधी की सरकार को गिरा दिया.
अन्ना आंदोलन (2011) : भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मनमोहन सरकार के खिलाफ हुआ सबसे बड़ा देशव्यापी जन-आंदोलन. अन्ना हजारे इस आंदोलन के हीरो रहे.
निर्भया आंदोलन (2012): दिल्ली में हुए जघन्य निर्भया कांड के बाद महिला सुरक्षा, त्वरित न्याय और कड़े कानूनों की मांग को लेकर देश भर में ऐतिहासिक और स्वतःस्फूर्त प्रदर्शन हुए थे.
किसान आंदोलन (2020-2021): मोदी सरकार के कृषि कानूनों के विरोध में किसानों का आंदोलन. जवाब में सरकार को कानून वापस लेने पड़े.
NEET-छात्र आंदोलन (2026): नीट पेपर लीक से परेशान होकर छात्रों और युवाओं ने मोदी सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया. प्रदर्शन के बाद शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा.
मोहित ग्रोवर