ओनिर सेन की पीरियड वॉर ड्रामा सीरीज ऑपरेशन सफेद सागर रिलीज के बाद से ही चर्चा में है. सात अगस्त को रिलीज हुई इस छह एपिसोड की सीरीज में 1999 के करगिल युद्ध की घटनाओं को दिखाया गया है, जिसमें भारत ने पाकिस्तान को मात दी थी. सीरीज में कुछ ऐसे नाटकीय दृश्य हैं, जिन्हें देखकर दर्शकों के मन में सवाल उठा कि क्या वाकई उस समय ऐसा ही हुआ था?
ऑपरेशन सफेद सागर में ऐसा ही एक वाकया अटल बिहार वाजपेयी की पाकिस्तान यात्रा से जुड़ा हुआ है. फरवरी 1999 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की लाहौर गए थे. ऐसे में उस समय पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने उस समय के पाकिस्तान के ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी के अध्यक्ष परवेज मुशर्रफ को वाजपेयी को सलामी देने को कहा था. लेकिन मुशर्रफ ने ऐसा नहीं किया और वाजपेयी को सैन्य सलामी देने के बजाए उनसे हाथ मिलाया. उनका यह व्यवहार वाजपेयी के लिए हैरान करने वाला था.
सीरीज में मुशर्रफ का किरदार मनु ऋषि चड्ढा ने निभाया है जबकि नवाज शरीफ की भूमिका विनय पाठक और अटल बिहारी वाजपेयी की भूमिका अंजन श्रीवास्तव ने निभाई है.
ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि यह घटना वास्तव में हुई थी. वाजपेयी के स्वागत के लिए अटारी-वाघा सीमा पर आयोजित समारोह का पाकिस्तान के सैन्य सेवा प्रमुखों ने बहिष्कार किया था. इसकी वजह यह बताई जाती है कि तब तक पाकिस्तानी सेना भारत की ओर कश्मीर में सैन्य कार्रवाई शुरू कर चुकी थी. हालांकि, पाकिस्तान आधिकारिक तौर पर यही कह रहा था कि सिविलियन कपड़ों में भारत में घुसे ये लोग अलगाववादी संगठन इंडियन मुजाहिदीन से जुड़े हुए थे.
बाद में नवाज शरीफ ने मुशर्रफ को एक औपचारिक समारोह में शामिल होने और भारतीय प्रधानमंत्री को सलामी देने के लिए मजबूर किया. मुशर्रफ ने अनिच्छा से ऐसा किया, लेकिन उन्होंने वाजपेयी को औपचारिक सैन्य सलामी देने के बजाय उनसे हाथ मिलाया. इसे सैन्य और कूटनीतिक प्रोटोकॉल का उल्लंघन माना गया.
क्या मुशर्रफ ने नवाज शरीफ को अंधेरे में रखा था?
ऑपरेशन सफेद सागर में यह भी दिखाया गया है कि मुशर्रफ ने नवाज शरीफ को करगिल युद्ध के वास्तविक दायरे से अनजान रखा था. उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को यह भरोसा दिलाया कि यह कार्रवाई भारत के खिलाफ चल रही ‘इंडियन मुजाहिदीन’ की गतिविधियों को आगे बढ़ाने भर की है. इस तरह उन्होंने शरीफ की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को भी हवा दी और उन्हें भारत में पाकिस्तानी सैनिकों की घुसपैठ को मंजूरी देने के लिए तैयार किया.
बाद में जब नवाज शरीफ को मुशर्रफ की वास्तविकमंशा का पता चला, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. नसीम जहरा की 2018 में प्रकाशित किताब फ्रॉम कारगिल टू द कूप: इवेंट्स दैट शूक पाकिस्तान भी इस बात की पुष्टि करती है कि मुशर्रफ ने करगिल के दौरान नवाज शरीफ को काफी हद तक अंधेरे में रखा था. उन्होंने इसे भारतीय सेना के खिलाफ सीधी सैन्य कार्रवाई के बजाय इंडियन मुजाहिदीन की गतिविधियों के विस्तार के तौर पर पेश किया. हालांकि, इस मामले में एक दूसरा पक्ष भी है.
2021 में एक लेख में इस दावे पर सवाल उठाया गया कि शरीफ को करगिल योजना के बारे में बिल्कुल जानकारी नहीं थी. लेख में लेखक और 2016 में प्रकाशित किताब करगिल: द हाइट्स ऑफ ब्रेवरी के लेखक आजाद सिंह राठौर के हवाले से कहा गया कि शरीफ को योजना की जानकारी थी, लेकिन उन्हें इसके इतने गंभीर परिणाम होने का अंदाजा नहीं था.
लेख के मुताबिक, असली सवाल यह नहीं था कि शरीफ को योजना की जानकारी थी या नहीं, बल्कि यह थी कि उन्होंने इसे मंजूरी क्यों दी. ऐसा लगता है कि तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को नियंत्रण रेखा पर दोनों सेनाओं की वास्तविक ताकत का सही अंदाजा नहीं था. शरीफ को भरोसा था कि पाकिस्तानी सेना करगिल पर कब्जा कर लेगी और बाद में सियाचिन पर भी अपना नियंत्रण स्थापित कर लेगी.लेकिन कारगिल अभियान 1971 के युद्ध के बाद पाकिस्तान की सबसे बड़ी सैन्य भूल साबित हुआ.
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