जरा सोचकर देखिए, एक फिल्म का प्रीमियर होता है और उस फिल्म के खत्म होने के बाद दर्शक तकरीबन 25 मिनट तक खड़े होकर जोरदार तालियां बजाते हैं. फिल्म को स्पेशल जूरी प्राइज भी मिलता है लेकिन जिस मुल्क से इन फिल्ममेकर्स का राब्ता है, वहां की सरकार भड़क जाती है. उनकी नागरिकता छीनने की धमकी दी जाती है.
इजरायल की डॉक्यूमेंट्री NAZA के साथ कुछ ऐसा ही हुआ. 10 सितंबर 2026 को वेनिस में वर्ल्ड प्रीमियर के बाद फिल्म को लगभग 25 मिनट का स्टैंडिंग ओवेशन मिला, जो इस फेस्टिवल का रिकॉर्ड भी है. नाजा तकरीबन 80 मिनट की डॉक्यूमेंट्री है, जिसे इजरायली पत्रकार और फिल्ममेकर्स युवाल अब्राहम और रेचल जोरने बनाया है. दोनों पहले भी ऑस्कर जीत चुकी डॉक्यूमेंट्री नो अदर लैंड से जुड़े हैं.
इस डॉक्यूमेंट्री में वेस्ट बैंक में फिलिस्तीनियों के विस्थापन और इजरायली बस्तियों से जुड़े मुद्दों को दिखाया गया है. नाजा में दोनों ने अपना कैमरा गाजा युद्ध के दौरान इजरायली सैन्य और खुफिया तंत्र के काम करने के तरीके की तरफ मोड़ा है.
डॉक्यूमेंट्री का नाम ही बड़ा मैसेज है
फिल्म का नाम कोई सामान्य टाइटल नहीं है. नाजा दरअसल इजरायली सेना के संदर्भ में इस्तेमाल होने वाला एक अक्रोनिम है, जिसका संबंध किसी हमले में संभावित कोलेट्रल कैजुअलटी से होता है. आसान भाषा में कहें तो किसी संभावित सैन्य हमले में कितने आम नागरिक मारे जा सकते हैं, उस अनुमान को इसी शब्द के जरिए समझाया जाता है. फिल्म इसी कॉन्सेप्ट को पकड़कर सवाल करती है कि युद्ध में नागरिकों की मौत को किस तरह सैन्य निर्णय की प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाता है.
फिल्म में लैवेंडर नाम के एआई टारगेटिंग सिस्टम का भी जिक्र है. फिल्म के मुताबिक इस तरह की तकनीक का इस्तेमाल बड़ी मात्रा में डेटा और संचार संबंधी जानकारी को खंगालकर संभावित टारगेट की पहचान करने में किया गया.
नाजा अचानक कुछ महीनों में तैयार हुई डॉक्यूमेंट्री नहीं है. इसके पीछे करीब तीन साल की खोजी पत्रकारिता बताई जा रही है. अब्राहम और जोर ने इजरायली सेना और खुफिया तंत्र से जुड़े 24 लोगों के इंटरव्यू किए. इनमें खुफिया अधिकारी और सैनिक शामिल थे. उनकी पहचान छिपाने के लिए फिल्म में उनकी आवाज और चेहरे को डिजिटल तरीके से बदला गया, क्योंकि ये लोग संवेदनशील सैन्य जानकारी और अपने अनुभवों के बारे में बात कर रहे थे.
इन इंटरव्यू की एक खास बात यह भी रही कि कई बातचीत रात के वक्त तेल अवीव की छतों पर रिकॉर्ड की गईं. फिल्ममेकर्स के मुताबिक रात और अंधेरे का इस्तेमाल सिर्फ सुरक्षा की वजह से नहीं था, बल्कि यह फिल्म के पूरे विजुअल ट्रीटमेंट का हिस्सा भी था. उनका कहना था कि वे ऐसी व्यवस्था को समझना चाहते थे जिसमें हजारों किलोमीटर दूर बैठे लोग स्क्रीन के जरिए ऐसे फैसले लेते हैं जिनका असर गाजा में मौजूद लोगों की जिंदगी पर पड़ता है.
फिल्म में ऐसा क्या है जिससे इजरायल भड़क गया?
विवाद की जड़ फिल्म का यह दावा है कि गाजा में नागरिकों की मौतें हमेशा युद्ध की अनपेक्षित या आकस्मिक कीमत नहीं थीं, बल्कि कुछ मामलों में पहले से अनुमानित और सैन्य फैसलों में शामिल थीं. डॉक्यूमेंट्री में शामिल सूत्र दावा करते हैं कि एआई और इंटेलिजेंस सिस्टम संभावित टारगेट की पहचान करते थे और कुछ हमलों में बड़ी संख्या में नागरिकों के मारे जाने की संभावना पहले से पता होती थी.
यहीं फिल्म और इजरायली सरकार के बयान के बीच सबसे बड़ा टकराव है. इजरायली सेना ने फिल्म के आरोपों को खारिज किया है. सेना का कहना है कि फिल्म में दिए गए गुमनाम बयानों को सत्यापित नहीं किया जा सकता और फिल्म वास्तविकता को तोड़-मरोड़कर पेश करती है. इजरायली सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल एयाल जमीर ने इसे सेना और इजरायल के खिलाफ हमला बताया और कहा कि फिल्म में लगाए गए आरोप गंभीर और झूठे हैं.
यानी यहां दो बिल्कुल अलग नैरेटिव आमने-सामने हैं. फिल्ममेकर्स का कहना है कि उन्होंने संवेदनशील सूत्रों की पहचान बचाते हुए उनकी गवाही को पत्रकारिता की प्रक्रिया से जांचा. वहीं इजरायली सेना का कहना है कि अनाम स्रोतों के आधार पर ऐसे गंभीर आरोपों को प्रमाणित तथ्य के रूप में पेश नहीं किया जा सकता.
नेतन्याहू क्यों भड़के?
फिल्म के वेनिस में सम्मानित होने के बाद मामला सीधे इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू तक पहुंचा. नेतन्याहू ने नाजा को उकसावे वाला बताते हुए कहा कि दुनियाभर में यहूदियों के खिलाफ भड़काई जा रही नफरत के खिलाफ इजरायल लड़ रहा है, लेकिन जब अपने ही लोगों की तरफ से ऐसा कुछ होता है तो वह अस्वीकार्य है. उन्होंने यह भी कहा कि फिल्म में इजरायली सेना को युद्ध अपराधियों के रूप में पेश किया गया है और वेनिस में उसे मिली तालियां इस बात को और गंभीर बनाती हैं.
इजरायली सरकार ने डॉक्यूमेंट्री पर कड़ी आपत्ति जाहिर की. इजरायल के संस्कृति मंत्री मिकी जोहर ने सोशल मीडिया पर फिल्म को बेहद आपत्तिजनक बताया और दोनों फिल्ममेकर्स पर देशद्रोह का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि संस्कृति मंत्री के तौर पर वह युवाल अब्राहम और रेचल जोर की इजरायली नागरिकता रद्द करने के लिए तुरंत कदम उठाएंगे.
फिल्ममेकर्स खुद क्या कह रहे हैं?
युवाल अब्राहम का कहना है कि उनका मकसद इजरायल को नुकसान पहुंचाना नहीं बल्कि इजरायली समाज के सामने युद्ध के उन पहलुओं को रखना है जिन पर वहां पर्याप्त चर्चा नहीं हुई. उन्होंने एक इजरायली टीवी इंटरव्यू में कहा कि वे चाहते हैं कि फिल्म इजरायल में भी दिखाई जाए. उनका कहना था कि इजरायल उनका घर है और वह वहीं रहना चाहते हैं, हालांकि मौजूदा विवाद के बीच उन्होंने यह चिंता भी जताई कि क्या वह वापस लौट पाएंगे.
दोनों निर्देशकों ने अपने फिल्ममेकर स्टेटमेंट में कहा है कि उन्होंने यह फिल्म इसलिए बनाई क्योंकि वे इजरायली नागरिक होने के नाते अपने देश की उस व्यवस्था की जांच करना चाहते थे जो गाजा में बड़ी संख्या में फिलिस्तीनी नागरिकों की मौत से जुड़ी है.
आजतक एंटरटेनमेंट डेस्क