कटरीना कैफ एक बेहद खूबसूरत और आकर्षक महिला... वो लंबे समय तक इस देश के लाखों नौजवानों का क्रश रहीं. विक्की कौशल से शादी के बाद पिछले साल मां बनीं और जब वह हाल ही में एक कार्यक्रम में नजर आईं तो उन्हीं नौजवानों के हाथों ट्रोल हुईं, जो उन्हें देखकर आहें भरा करते थे. हमें कोई सरोबार नहीं कि उनके Kay Beauty ने 350 करोड़ का रेवेन्यू हासिल किया. हमें फिक्र है मां बनने के बाद उनके बढ़े हुए वजन की.
कोई पूछ रहा है कि वह पहले जैसी क्यों नहीं दिख रहीं, कोई उनके वजन पर टिप्पणी कर रहा है, तो कोई उनकी पुरानी तस्वीरें शेयर कर विलाप करने में जुटा है. सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि कटरीना को ट्रोल क्यों किया जा रहा है. असली सवाल यह है कि आखिर हम किसी महिला के बढ़े हुए वजन को देखकर इतना असहज क्यों हो जाते हैं?
मान लीजिए कटरीना अगर मां नहीं बनी होतीं. अगर उम्र के साथ उनका वजन बढ़ता फिर चाहे वह हार्मोनल बदलावों की वजह से होता या फिर किसी और वजह से तो क्या तब भी उनके शरीर पर की गई टिप्पणियां जायज होती? बिल्कुल नहीं. इसलिए इस पूरी बहस को सिर्फ पोस्टपार्टम बॉडी तक सीमित करना भी कहीं न कहीं मूल सवाल से बच निकलना है.
मुद्दा यह नहीं है कि कटरीना का वजन क्यों बढ़ा. मुद्दा यह है कि हमें यह जानने में इतनी दिलचस्पी क्यों है कि उनका वजन क्यों और कैसे बढ़ गया? हम एक खास बॉडी टाइप को ही आदर्श क्यों मानते हैं? क्यों एक्ट्रेस का स्लिम दिखना ही जरूरी है? क्यों महिलाओं का बढ़ा वजन हमें असहज करने लगता है. दरअसल समस्या हमारी सोच में है. हम सभी ने कटरीना को चिकनी चमेली और शीला की जवानी जैसे गानों में ग्लैमर की एक खास छवि में देखा है. हिंदी सिनेमा ने भी उन्हें उसी तरह पेश किया और दर्शकों ने भी उनकी एक तस्वीर अपने मन में बना ली.
लेकिन किसी अभिनेत्री की सार्वजनिक छवि और उसका शरीर एक ही चीज नहीं है. पर्दे पर एक ग्लैमरस किरदार निभाना और जिंदगी भर उसी ग्लैमर की देह में बने रहना दो अलग बातें हैं. कटरीना पहले एक महिला हैं, फिर एक अभिनेत्री. उन्होंने शादी की, वह मां बनीं, उनकी जिंदगी ठीक उसी तरह से आगे बढ़ रही है, जैसे हमारे या आपके घरों की सामान्य महिलाओं की जिंदगी आगे बढ़ती है.
लेकिन ग्लैमर की दुनिया में महिलाओं के लिए यह सामान्य मानवीय प्रक्रिया जैसे स्वीकार ही नहीं की जाती. सिनेमा एक विजुअल माध्यम है, इसमें शक नहीं. अभिनेताओं की शक्ल, शरीर, कपड़े और स्टाइल उनकी पेशेवर पहचान का हिस्सा होते हैं. दर्शक किसी कलाकार को देखकर यह नोटिस भी कर सकते हैं कि वह पहले से अलग दिख रहा है. लेकिन किसी चीज को नोटिस करना और उस पर अपना अधिकार समझ लेना ये दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं.
यह पहली बार भी नहीं है जब किसी अभिनेत्री के शरीर को उसके काम से बड़ा विषय बना दिया गया हो. ऐश्वर्या राय बच्चन के साथ भी ऐसा ही हुआ. विद्या बालन और स्वरा भास्कर लंबे समय तक अपने वजन की वजह से ट्रोलर्स के निशाने पर रही हैं.
2011 में बेटी आराध्या के जन्म के बाद ऐश्वर्या के पोस्टपार्टम शरीर को लेकर लंबे समय तक टिप्पणियां होती रहीं. एक नई मां को उस समय जिस सहजता और निजता की जरूरत थी, उसकी जगह बहस इस बात पर होने लगी कि वह पहले जैसी क्यों नहीं दिख रही हैं. एक दशक से ज्यादा समय गुजर गया. तकनीक बदली, सोशल मीडिया की भाषा बदली, लेकिन महिलाओं के शरीर को लेकर हमारी बेचैनी पूरी तरह नहीं बदली.
यहां सबसे असहज सवाल शायद ‘पहले जैसी’ वाली टिप्पणी में छिपा है. आखिर पहले जैसा होना जरूरी क्यों है? और अगर लौटना है तो किस रूप में लौटना है? एक महिला बिना गर्भवती हुए भी वजन बढ़ा सकती है. उम्र के साथ उसका शरीर बदल सकता है. वह एक्सरसाइज कर सकती है या नहीं कर सकती. उसकी जीवनशैली बदल सकती है. उसके शरीर में हार्मोनल बदलाव हो सकते हैं और वह बिना किसी कारण बताए भी अलग दिख सकती है क्योंकि हर शारीरिक बदलाव के पीछे समाज को एक ऐसी वजह नहीं चाहिए, जिसे वह स्वीकार कर सके. किसी महिला को अपने शरीर के बारे में सफाई देने की जरूरत नहीं होनी चाहिए.
मां बनने के बाद शरीर में बदलाव तो इस बहस को और संवेदनशील बना देता है. गर्भावस्था और प्रसव शरीर में बड़े जैविक बदलाव लाते हैं और हर महिला का अनुभव और रिकवरी अलग हो सकती है लेकिन सवाल यह भी है कि किसी महिला को सम्मान देने के लिए हमें हर बार उसे ‘पोस्टपार्टम’, ‘हार्मोनल’ या ‘मेडिकल’ वजह देने की जरूरत क्यों पड़ती है? क्या वह सिर्फ इसलिए अपने शरीर पर टिप्पणी से मुक्त नहीं हो सकती क्योंकि वह मां बनी है? अगर किसी महिला ने बच्चा पैदा नहीं किया होता, तब भी उसके शरीर पर टिप्पणी गलत होती इसलिए सम्मान की वजह मातृत्व नहीं, उसकी इंसान होने की पहचान होनी चाहिए.
पहले जैसी नहीं दिख रही... दरअसल ये टिप्पणी हमारी तथाकथित अपेक्षाओं के बारे में बहुत कुछ बयां करती हैं. मां बनना और उसके बाद वजन कम करना कोई डिस्क्सलेमर नहीं है. उन्हें सिर्फ एक इंसान होने की आजादी चाहिए. जिस शरीर में आप नहीं रहते, उसका मजाक उड़ाना आसान है.
सोशल मीडिया ने इस एनटाइटलमेंट को और ज्यादा साफ कर दिया है. किसी महिला की तस्वीर सामने आती है और कुछ ही मिनटों में लोग उसके वजन, रंग-रूप या उम्र पर चर्चा शुरू हो जाती है. अक्सर इसे मजाक कहकर टाल दिया जाता है. वह तो ग्लैमर वर्ल्ड में है, पब्लिक फिगर है तो ये सब सुनने की आदत डालनी चाहिए. लोकप्रियता के साथ आलोचना भी होती है. इसके लिए तैयार रहना चाहिए. ये सब वही घिसी-पिटी बातें और ट्रोल करने के तरीके हैं जिससे हम ट्रोलिंग को जायज ठहराते हैं.
खासकर पुरुषों का महिलाओं के शरीर पर इतनी सहजता से टिप्पणी करना भी सोचने वाली बात है. गर्भावस्था, प्रसव और शरीर में होने वाले बदलाव जटिल जैविक प्रक्रियाएं हैं. जिस शरीर में हम रहते ही नहीं, उसके बारे में सलाह देना कितना आसान है. महिलाओं को हर बार अपने शरीर में आए बदलाव के लिए किसी तरह की बायोलॉजी क्लास देने की जरूरत नहीं होनी चाहिए.
जरा पुरुष अभिनेताओं के शरीर में होने वाले बदलावों को देखने का नजरिया भी देखिए. पुरुष अभिनेताओं का भी वजन बढ़ता या घटता है. उम्र के साथ झुर्रियों का आना और बाल पकना आम है. लेकिन 60 पार के सलमान को देखकर हम बड़े कूल अंदाज में कह देते हैं कि भाईजान 60 की उम्र में भी फिट हैं. He is Aging like fine wine.
तो 43 साल की कटरीना से 22 साल वाली कटरीना बने रहने की उम्मीद आखिर क्यों? महिलाएं तस्वीरें भर नहीं हैं कि उन्हें किसी एक फ्रेम में हमेशा के लिए फ्रीज कर दिया जाए. वे उम्र के साथ बदलती हैं, उनके शरीर बदलते हैं, उनकी प्राथमिकताएं बदलती हैं, उनके रिश्ते बदलते हैं, उनका जीवन बदलता है. यही सामान्य जीवन है. असामान्य बात यह है कि हम उनसे इस बदलाव को छिपाने की उम्मीद करते हैं.
इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं कि सिनेमा में अपीयरेंस मायने नहीं रखता. बिल्कुल रखता है. कलाकारों को स्टाइल किया जाता है, उनकी तस्वीरें खींची जाती हैं, उनके लुक पर मार्केटिंग होती है और दर्शक उन्हें उसी नजर से देखते हैं. लेकिन पेशे का हिस्सा होना शरीर पर हक छोड़ देना नहीं है. दर्शक यह कह सकता है कि कोई कलाकार पहले से अलग दिख रहा है लेकिन यह तय करने का अधिकार उसके पास नहीं है कि उस कलाकार को कैसा दिखना चाहिए.
कटरीना कैफ को किसी को यह भरोसा दिलाने की जरूरत नहीं है कि वह वजन कम करेंगी या नहीं करेंगी. उन्हें अपने शरीर को लेकर कोई क्लैरिफिकेशन देने की जरूरत नहीं है. उन्हें यह साबित करने की जरूरत नहीं कि मातृत्व ने उनके शरीर को बदला है और न ही यह साबित करने की जरूरत है कि वह उसे फिर से बदल लेंगी. ऐश्वर्या राय बच्चन को भी नहीं. विद्या बालन को भी नहीं और स्वरा भास्कर को भी नहीं. किसी भी महिला को नहीं.
हमें थोड़ी सी तो संवेदनशीलता और परिपक्वता दिखानी होगी कि जब अगली बार बच्चे के जन्म के बाद कोई भी महिला दिखाई दे तो उसके वजन या रंगरूप पर टिप्पणी करने के बजाए उसकी जर्नी को सेलिब्रेट करें. मां बनने के बाद उसके शरीर में हुए सामान्य बदलावों को उसी स्वरूप में स्वीकार करें क्योंकि किसी महिला के शरीर को देखकर हर बार उसका हिसाब मांगना जरूरी नहीं है.
रितु तोमर