Film Review: दमदार और दिलचस्प है अमिताभ बच्चन की 'पिंक'

बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन की 'पिंक' की स्‍पेशल स्क्रीनिंग देखने के बाद फिल्म और इसके कलाकारों की खूब तारीफ हुई. फिल्‍म को काफी पसंद किया जा रहा है.

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फिल्‍म 'पिंक' में अमिताभ बच्‍चन फिल्‍म 'पिंक' में अमिताभ बच्‍चन

आर जे आलोक / दीपिका शर्मा

  • मुंबई,
  • 14 सितंबर 2016,
  • अपडेटेड 7:39 PM IST

फिल्म का नाम: पिंक

डायरेक्टर: अनिरुद्ध रॉय चौधरी

स्टार कास्ट: अमिताभ बच्चन, तापसी पन्नू, कीर्ति कुल्हाड़ी ,एंड्रिया तेरियांग, अंगद बेदी, पीयूष मिश्रा

अवधि: 2 घंटा 16 मिनट

सर्टिफिकेट: U/A

रेटिंग: 4 स्टार

'अनुरानन' और 'अंतहीन' जैसी एक से बढ़कर एक बंगाली फिल्में डायरेक्ट करने के बाद पहली बार डायरेक्टर अनिरुद्ध रॉय चौधरी ने हिंदी फिल्म 'पिंक' का डायरेक्शन किया है. आइए फिल्म की समीक्षा करते हैं.

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कहानी
यह कहानी दिल्ली में किराए पर रहने वाली तीन वर्किंग लड़कियों मीनल अरोड़ा(तापसी पन्नू), फलक अली (कीर्ति कुल्हाड़ी) एंड्रिया तेरियांग (एंड्रिया तेरियांग) की है. एक रात एक रॉक कॉन्सर्ट के बाद पार्टी के दौरान जब उनकी मुलाकात राजवीर (अंगद बेदी) और उसके दोस्तों से होती है तो रातो रात कुछ ऐसा घटित हो जाता है जिसकी वजह से मीनल, फलक और एंड्रिया डर सी जाती हैं, और भागकर अपने किराए के मकान पर पहुचती हैं, वहीं से बहुत सारे ट्विस्ट और टर्न्स शुरू हो जाते हैं, कहानी और दिलचस्प तब बनती है जब इसमें वकील होती है. तीनों लड़कियों को कोर्ट जाना पड़ता है और उनके वकील के रूप में दीपक उनका केस लड़ते हैं. कोर्ट रूम में वाद विवाद के बीच कई सारे खुलासे होते हैं और अंततः क्या होता है, इसे जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी.

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स्क्रिप्ट
फिल्म की स्क्रिप्ट रितेश शाह ने बहुत ही सरल लेकिन सोचने पर विवश करने वाली लिखी है, कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, आप उससे कनेक्ट करने लगते हैं. किरदारों का चित्रण भी बखूब किया गया है, में प्रयोग किये हुए शब्दों के चयन से लगता है की लिखने से पहले रिसर्च वर्क काफी हुआ है. संवाद भी अच्छे हैं.

अभिनय
तापसी पन्नू और कीर्ति कुल्हाड़ी की मौजूदगी ने फिल्म को काफी सजाया है, उनकी एक्टिंग से आप खुद को कनेक्ट कर पाते हैं. कोर्ट रूम में वकील के रूप में पीयूष मिश्रा ने उम्दा एक्टिंग की है, ने एक बार फिर से किरदार में खुद को ढालने का फन बहुत ही बेहतरीन अंदाज में पर्दे पर निभाया है, उनके कई व्यक्तित्व आपको पूरी फिल्म के दौरान दिखाई देते हैं. वहीं एंड्रिया तेरियांग, अंगद बेदी, विजय वर्मा और बाकी सह कलाकारों का काम भी सटीक है. हरेक किरदार में कुछ न कुछ खास है, जो बांधे रखता है.

कमजोर कड़ी
फिल्म की कमजोर कड़ी इसका बैकड्रॉप हो सकता है, जो की मुद्दों पर बेस्ड है और किसी खास तरह की ऑडियंस को बिल्कुल भी रास ना आए.

संगीत
फिल्म का संगीत कहानी को निखारता है और 'कारी कारी' वाला गीत फिल्म में समय समय पर आता है,जो मौके की नजाकत को दर्शाता है.

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क्यों देखें
अगर मुद्दों पर आधारित और सरल लिखावट की हार्ड हिटिंग फिल्में पसंद हैं, तो एक मिस मत कीजिए.

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