Gandhari Review: बेअसर कहानी, दम तोड़ता ट्विस्ट! निराश करती है बेटी के लिए 'गांधारी' बनी तापसी की फिल्म

कैसी है तापसी पन्नू की ‘गांधारी’? बेटी की तलाश, चाइल्ड ट्रैफिकिंग और बदले की इस कहानी में तापसी का एक्शन दमदार है, लेकिन क्या कमजोर कहानी और उलझे ट्विस्ट फिल्म का मजा किरकिरा कर देते हैं? पढ़ें पूरा रिव्यू.

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कैसी है तापसी की फिल्म गांधारी? (Photo: Movie poster) कैसी है तापसी की फिल्म गांधारी? (Photo: Movie poster)

आरती गुप्ता

  • नई दिल्ली,
  • 03 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 4:02 PM IST
फिल्म:ड्रामा, एक्शन, थ्रिलर
2/5
  • कलाकार : तापसी पन्नू, स्वास्तिका मुखर्जी, इश्वाक सिंह
  • निर्देशक :देवाशीष मखीजा

'मैं मिष्टी को लिए बगैर जॉयपुरा नहीं छोड़ूंगी.' तापसी पन्नू के किरदार की ये लाइन सुनकर लगता है कि अब कहानी एक ऐसी मां की जंग दिखाने वाली है, जो अपनी बेटी को वापस पाने के लिए किसी भी हद तक जाएगी. शुरुआत में इसकी उम्मीद जागती भी है. लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, इसका रोमांच कम और उलझन ज्यादा बढ़ने लगती है. 

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‘गांधारी’ एक गंभीर और जरूरी मुद्दे को उठाती है, तापसी पूरी जान लगाकर किरदार निभाती हैं, लेकिन कमजोर पटकथा, कई सुविधाजनक मोड़ और जबरदस्ती ठूंसा गया फिक्शनल एंगल फिल्म का असर बिगाड़ देते हैं.

कहानी जो कहती है फिल्म वो कर नहीं पाती

फिल्म को कहानी की जमीन तैयार करने में ही करीब 30 मिनट लग जाते हैं. बेटी के रेलवे स्टेशन से गायब होने और हादसे में आंखों की रोशनी खोने के बाद बानी का खुद को ट्रेन कर योद्धा बनना दिलचस्प जरूर है, लेकिन कहानी का यह सफर उतना असरदार नहीं बन पाता. जॉयपुरा पहुंचने के बाद मामला चाइल्ड ट्रैफिकिंग के बड़े नेटवर्क तक पहुंचता है, मगर इसकी कई परतें खुलने के बजाय उलझती चली जाती हैं. कई जगह किरदार कहानी की जरूरत के हिसाब से चलते नजर आते हैं और ट्विस्ट स्वाभाविक कम, सुविधाजनक ज्यादा लगते हैं.

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तापसी पन्नू ने मां की बेबसी, गुस्से और बदले की आग को पूरी ताकत से निभाया है और एक्शन सीक्वेंस में उनका अंदाज जरूर जमता है, लेकिन उनकी परफॉर्मेंस भी कमजोर पटकथा की भरपाई नहीं कर पाती. जॉयपुरा की सुरंगें, रहस्यमय किरदार और पौराणिक संदर्भ फिल्म को अलग बनाने की कोशिश करते हैं, मगर यही चीजें कई जगह कहानी को और भारी कर देती हैं.‘गांधारी’ एक तरफ ‘मर्दानी’ और ‘मॉम’ जैसी मां की लड़ाई वाली भावनात्मक कहानी बनना चाहती है और दूसरी तरफ नकलीपने वाली कहानी थ्रिलर का रंग पकड़ती है, लेकिन दोनों का मेल सहज नहीं बैठता.

कास्ट को देख होगा अफसोस

सपोर्टिंग कास्ट में जतिन सरना, ईश्वर सिंह, मीता वशिष्ठ और छाया कदम अपने हिस्से का काम करते हैं, लेकिन उनके किरदारों को खुलने की ज्यादा जगह नहीं मिलती. वहीं प्रशांत नारायणन की एंट्री भी उस असर के साथ नहीं आती, जिसकी उम्मीद उनसे होती है. क्लाइमैक्स में कुछ खुलासे जरूर हैं, लेकिन उनमें वो जोरदार झटका नहीं है जो एक थ्रिलर से चाहिए. 

कई मोड़ पहले ही भांपे जा सकते हैं और आखिर तक पहुंचते-पहुंचते फिल्म का रहस्य रोमांच से ज्यादा उलझन पैदा करता है. तापसी की मेहनत और कुछ दमदार एक्शन के बावजूद ‘गांधारी’ की बिखरी कहानी, कमजोर ट्विस्ट और जबरन जोड़े गए नकली रंग इसे औसत से नीचे की फिल्म बना देते हैं.

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क्लाइमैक्स भी नहीं देता वो जोरदार झटका

देवाशीष मखीजा का यथार्थवादी अंदाज और कनिका ढिल्लों का मसालेदार थ्रिलर ट्रीटमेंट ‘गांधारी’ में ठीक से घुल नहीं पाता. फिल्म कभी गंभीर सामाजिक कहानी बनती है तो कभी बड़े संवादों और एक्शन के सहारे मसाला फिल्म की तरफ मुड़ जाती है. नतीजा ये कि कई किरदारों का दर्द और टकराव दिल तक पहुंचने से पहले ही पटकथा की उलझनों में दब जाता है.

थ्रिलर का क्लाइमैक्स भी कहानी को वो जोरदार झटका नहीं देता, जिसकी उम्मीद रहती है. कई ट्विस्ट पहले ही भांपे जा सकते हैं और कुछ खुलासे कहानी में स्वाभाविक लगने के बजाय सुविधाजनक तरीके से आते हैं. तापसी की मेहनत और कुछ एक्शन सीक्वेंस जरूर असर छोड़ते हैं, लेकिन बिखरी कहानी, कमजोर ट्विस्ट और जबरन जोड़ा गया फिक्शनल एंगल फिल्म का असर काफी कम कर देते हैं. ‘गांधारी’ का इरादा मजबूत है, लेकिन कहानी उस इरादे का साथ नहीं दे पाती.

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