Babita Singh Reporting Review: वर्दी के पीछे छिपी उस औरत की कहानी, जो घर और पुलिस सिस्टम दोनों से लड़ती है

‘बबीता सिंह रिपोर्टिंग’ में निमिषा सजयन एक ऐसी पुलिसवाली बनी हैं, जो मर्डर केस के साथ-साथ घर और सिस्टम से भी लड़ती है. जानिए कैसी है फिल्म और क्या इसे देखना चाहिए.

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कैसी है बबीता सिंह रिपोर्टिंग फिल्म? (Photo: Screengrab) कैसी है बबीता सिंह रिपोर्टिंग फिल्म? (Photo: Screengrab)

आरती गुप्ता

  • नई दिल्ली,
  • 28 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 6:36 PM IST
फिल्म:क्राइम, ड्रामा
3.5/5
  • कलाकार : निमिषा सजयन, बरुण सोबती और अंशुमन पुष्कर
  • निर्देशक :अंबिका पंडित

पुलिस की कहानियों में अक्सर ऐसे अफसर नजर आते हैं जो असंभव काम भी चुटकी में कर लेते हैं और हर केस के साथ समाज को ज्ञान भी बांटते हैं. ‘बबीता सिंह रिपोर्टिंग’ इन सबसे अलग, बेहद शांत अंदाज में एक ऐसी औरत की कहानी कहती है, जिसकी असली लड़ाई सिर्फ अपराध से नहीं, बल्कि पितृसत्ता से है.

28 अगस्त से प्राइम वीडियो पर बबीता सिंह रिपोर्टिंग स्ट्रीम हो रही हैं, हमने भी यह फिल्म देख ली है, ताकि आपको बता सकें कि इसकी कहानी कितनी बेहतर है. और यह आपके देखने लायक है भी या नहीं. जानने के लिए पढ़ें रिव्यू...

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खैरात में मिली नौकरी का बोझ ढोती बबीता!

भोपाल की असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर बबीता सिंह (निमिषा सजयन) पुलिस में नौकरी अपने बहादुर पिता की मौत के बाद अनुकंपा नियुक्ति पर पाती है. लेकिन थाने में उसे गंभीर जिम्मेदारियां देने के बजाय छोटे-मोटे कागजी कामों में उलझाकर रखा जाता है. घर में भी हालात कुछ अलग नहीं हैं. पति शरद (अंशुमन पुष्कर) और ससुराल वालों के लिए उसकी नौकरी बस तभी तक ठीक है, जब तक उससे घर के काम और उनकी सहूलियत पर कोई असर न पड़े.

यहां तक कि उसकी पहचान भी ‘बबीता’ से घटाकर प्यार से ‘बेबी’ कर दी जाती है. फील्ड ड्यूटी की चाहत रखने वाली बबीता पति को खुश करने के लिए एक झूठा अनुशासनात्मक आरोप तक अपने सिर ले लेती है, ताकि छुट्टी मिल सके.

कहानी तब करवट लेती है, जब बबीता अपने पति के साथ रीवा जाती है. वहां उसकी मुलाकात बचपन के दोस्त बंसी (बरुण सोबती) से होती है. लेकिन उसी रात बंसी की रहस्यमय तरीके से हत्या हो जाती है. स्थानीय पुलिस और समाज इस मौत को दबाकर आगे बढ़ना चाहते हैं, मगर बबीता के भीतर का ईमानदार पुलिसवाला उसे चैन नहीं लेने देता.

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इसके बाद बबीता चोरी-छिपे बंसी के लिए इंसाफ की तलाश शुरू करती है. लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ती है, उसके सामने अपने ही दोस्त की जिंदगी के ऐसे पहलू खुलते हैं, जो कहानी को और पेचीदा बना देते हैं.

काम ही नहीं परिवार के बीच भी पहचान की तलाश करती बबीता

फिल्म की सबसे बड़ी खूबी इसका जमीन से जुड़ा हुआ यथार्थ है. डायरेक्टर अंबिका पंडित और लेखिका अमिता व्यास फिल्म के जरिए बताना चाहती हैं कि महिलाओं को भेदभाव हमेशा चीख-चिल्लाकर नहीं झेलना पड़ता. कई बार मुस्कुराते हुए ताने, ‘तुमसे नहीं होगा’ वाली सोच और जरूरत से ज्यादा चिंता जताने के बहाने भी किसी की जिंदगी को धीरे-धीरे नियंत्रित किया जाता है.

दिलचस्प बात यह है कि फिल्म थाने और घर की दुनिया के बीच एक खूबसूरत समानता खींचती है. बबीता का मेल ऑफिसर और उसका पति- दोनों उससे अपनी बात मनवाना चाहते हैं, दोनों उसे उसकी काबिलियत पर शक करवाते हैं. सास भी सिर्फ रूढ़िवादी खलनायिका नहीं है, उसके लिए बबीता की पुलिस की नौकरी घर की जिम्मेदारियों के बीच एक बेवजह की रुकावट है.

यही वजह है कि फिल्म बबीता को कोई ‘मर्दाना तेवर वाली महिला पुलिसवाली’ बनाकर पेश नहीं करती. उसका आत्मविश्वास धीरे-धीरे पैदा होता है और इसी वजह से उसका सफर ज्यादा असली लगता है. निमिषा सजयन बबीता के किरदार में बेहद सटीक हैं. थकान हो, बेबसी हो या फिर अंदर से पैदा होता गुस्सा- उनकी आंखें बिना जरूरत के ड्रामा किए सब कुछ कह देती हैं. बरुण सोबती और बाकी कलाकार भी कहानी को मजबूती देते हैं. 

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खास बात ये है कि फिल्म बिना किसी भाषणबाजी और सुपरकॉप ड्रामा के पितृसत्ता पर करारा वार करती है. 

कुछ नजरअंदाज की जा सकने वाली कमजोरियां... 

हालांकि, फिल्म का कमजोर पक्ष इसकी मर्डर मिस्ट्री है. कहानी समाज की चुप्पी और उसके पीछे छिपी सोच को समझने में ज्यादा दिलचस्पी लेती है, लेकिन इसी चक्कर में आखिरी हिस्से में जांच थोड़ी लड़खड़ा जाती है. कुछ किरदारों के इरादे और कहानी के सुराग पूरी तरह संतोषजनक नहीं लगते.

फिर भी ‘बबीता सिंह रिपोर्टिंग’ की असली ताकत उसका मर्डर केस नहीं, बल्कि वह सवाल है जो यह हमारे सामने रखती है- क्या एक औरत अपने घर को संभालते हुए अपने सपनों और अपने पेशे को भी पूरी आजादी से जी सकती है? और शायद फिल्म का सबसे कड़वा सच यही है कि बबीता को सिर्फ अपराधी से नहीं, उस व्यवस्था से भी लड़ना है जो हर कदम पर उसे छोटा महसूस कराती है.

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