'राम सिया राम...' नेत्रहीन रविंद्र जैन की वो धुन, जो 51 साल बाद भी है हिट! कौन हैं ओरिजनल गाने के सिंगर?

रणबीर कपूर की 'रामायण' के नए गाने 'जय जय राम' के बाद 51 साल पुरानी 'मंगल भवन अमंगल हारी' धुन फिर चर्चा में है. जानिए रविंद्र जैन और जसपाल सिंह की कहानी.

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कौन हैं मंगल भवन अमंगल गाने वाले ओरिजिनल सिंगर? (Photo: ITGD) कौन हैं मंगल भवन अमंगल गाने वाले ओरिजिनल सिंगर? (Photo: ITGD)

आरती गुप्ता

  • नई दिल्ली,
  • 15 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 6:46 PM IST

राम का नाम हो और संगीत में भक्ति की मिठास घुल जाए, तो वो धुन वक्त की मोहताज नहीं रहती. कुछ ऐसा ही हुआ रविंद्र जैन की बनाई उस धुन के साथ, जिसे सुनते ही आज भी जुबां पर आ जाता है-'राम सिया राम, सिया राम जय जय राम'.

करीब 51 साल पहले, 1975 में फिल्म 'गीत गाता चल' के लिए तैयार हुआ भक्ति गीत आज भी लोगों के बीच उतना ही लोकप्रिय है. खास बात ये है कि अब एक बार फिर 'रामायण' से जुड़े नए गाने 'जय जय राम' में पुराने भक्ति संगीत की झलक महसूस होने के बाद यह गीत और इसकी कहानी चर्चा में आ गई है.

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लेकिन इस अमर धुन के पीछे दो ऐसे नाम हैं, जिन्हें जानना भी इस कहानी को समझने के लिए जरूरी है- संगीतकार रविंद्र जैन और गायक जसपाल सिंह.

कौन थे रविंद्र जैन? आंखों से नहीं, दिल से देखते थे संगीत

रविंद्र जैन भारतीय सिनेमा के उन संगीतकारों में गिने जाते हैं, जिन्होंने अपनी शारीरिक चुनौती को कभी अपनी रचनात्मकता के आड़े नहीं आने दिया. जन्म से नेत्रहीन होने के बावजूद उन्होंने संगीत की दुनिया में ऐसा मुकाम हासिल किया, जहां उनकी धुनें आज भी लोगों की यादों में जिंदा हैं.

रविंद्र जैन का संगीत से रिश्ता बचपन से ही गहरा था. भजन और धार्मिक संगीत से शुरू हुआ उनका सफर धीरे-धीरे फिल्मों तक पहुंचा. उनकी सबसे बड़ी खासियत थी कि वह सरल धुनों में भी ऐसी मिठास भर देते थे कि गाने सीधे लोगों के दिल तक पहुंच जाते थे.

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फिल्मी संगीत में उन्होंने कई यादगार गीत दिए, लेकिन भक्ति संगीत से उनका रिश्ता कुछ अलग ही था. यही वजह है कि जब रामानंद सागर की 'रामायण' के संगीत की जिम्मेदारी उनके पास आई, तो उन्होंने सिर्फ टीवी शो के लिए गाने नहीं बनाए, बल्कि रामकथा को संगीत की ऐसी भाषा दी जो घर-घर में पहुंच गई.

'गीत गाता चल' और 1975 में शुरू हुई इस धुन की कहानी

सचिन पिलगांवकर और सारिका स्टारर 'गीत गाता चल' 1975 में रिलीज हुई थी. इसी फिल्म में रामायण की प्रसिद्ध चौपाई 'मंगल भवन अमंगल हारी' को रविंद्र जैन ने अपनी धुन में पिरोया. इसमें 'राम सिया राम, सिया राम जय जय राम' जैसी पंक्तियों ने भक्ति का ऐसा रंग घोला कि यह गीत फिल्म से निकलकर लोगों की निजी जिंदगी का हिस्सा बन गया. और इस गीत को अपनी आवाज देने वाले गायक थे जसपाल सिंह.

कौन थे जसपाल सिंह? जिनकी आवाज में घुली थी भक्ति

जसपाल सिंह हिंदी फिल्म संगीत के उन गायकों में रहे, जिनकी आवाज में एक अलग तरह की सादगी और मिठास थी. उन्हें खास तौर पर 1970 और 80 के दशक के गीतों के लिए याद किया जाता है.

'गीत गाता चल' का टाइटल सॉन्ग और फिल्म के दूसरे गीतों के साथ 'मंगल भवन अमंगल हारी' भी उनके यादगार कामों में शामिल रहा. उनकी आवाज ने रविंद्र जैन की धुन को वह सहजता दी, जिसने भक्ति गीत को आम श्रोताओं के दिल तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई.

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जसपाल सिंह की गायकी में बनावटी भारीपन नहीं था. उनकी आवाज सीधी, साफ और भावपूर्ण थी. यही वजह रही कि रविंद्र जैन की सरल और मधुर धुन के साथ उनकी आवाज का मेल बेहद स्वाभाविक लगा.

1987 में आई 'रामायण' और धुन बन गई घर-घर की आवाज

लेकिन इस धुन की असली लोकप्रियता की कहानी 1987 में एक नए मोड़ पर पहुंची. जब रामानंद सागर की 'रामायण' दूरदर्शन पर आई, तो रविंद्र जैन इसके संगीत से जुड़े. शो के भक्ति संगीत ने देशभर में ऐसा असर छोड़ा कि रामायण के साथ-साथ उसके गीत भी लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गए.

यहीं इस धुन को जैसे एक नई जिंदगी मिली. जो रचना 1975 में एक फिल्म के जरिए लोगों तक पहुंची थी, वह 1987 के बाद लाखों-करोड़ों घरों में भक्ति की आवाज बन गई. सुबह की पूजा हो, मंदिर हो या घर में बजता कैसेट- रविंद्र जैन की रामभक्ति वाली धुन हर जगह सुनाई देने लगी.

रविंद्र जैन ने 'रामायण' के लिए कई भक्ति गीतों को अपनी आवाज भी दी. उनकी संगीत साधना ने राम की कथा को सिर्फ संवाद और अभिनय तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि संगीत के जरिए उसे भावनाओं से जोड़ दिया.

'आदिपुरुष' से अब रणबीर कपूर की 'रामायण' तक

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इस धुन की कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. 2023 में आई 'आदिपुरुष' में भी 'मंगल भवन अमंगल हारी' को नए अंदाज में इस्तेमाल किया गया. और अब नितेश तिवारी की रणबीर कपूर और साई पल्लवी स्टारर 'रामायण' के पहले गाने 'जय जय राम' ने एक बार फिर पुराने भक्ति संगीत की यादें ताजा कर दी हैं.

नए गाने को ए.आर. रहमान ने कंपोज किया है और इसे अरिजीत सिंह और श्रेया घोषाल ने अपनी आवाज दी है. 1975 में रविंद्र जैन की कल्पना से निकली भक्ति की धुन ने 1987 में टीवी के जरिए इतिहास रचा, 2023 में नए अंदाज में वापसी की और अब 2026 में रणबीर कपूर की 'रामायण' के बहाने फिर चर्चा में है.

रविंद्र जैन की धुन क्यों नहीं हुई पुरानी?

शायद इसकी वजह सिर्फ संगीत नहीं, बल्कि उस संगीत में छिपी भावना है. रविंद्र जैन ने राम के नाम को किसी भारी-भरकम संगीत के पीछे नहीं छिपाया. उन्होंने इसे बेहद सरल रखा. जसपाल सिंह की सहज आवाज ने उस सादगी को और गहरा कर दिया. यही कारण है कि पांच दशक से ज्यादा समय गुजरने के बाद भी यह धुन किसी एक पीढ़ी की नहीं रही.

1975 में जिसे जसपाल सिंह ने आवाज दी और रविंद्र जैन ने धुन में ढाला, 1987 में जिसे 'रामायण' ने घर-घर पहुंचाया, वही भक्ति आज नई पीढ़ी के बीच नए सुरों में फिर सुनाई दे रही है.

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51 साल बाद भी अगर कोई धुन नई पीढ़ी को अपनी ओर खींच रही है, तो समझिए रविंद्र जैन का संगीत सिर्फ एक गीत नहीं रहा- वो भारतीय संगीत और रामभक्ति की ऐसी विरासत बन चुका है, जिसे वक्त भी पुराना नहीं कर पाया.

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