राम से लेकर रावण तक...रामानंद सागर और नितेश तिवारी की 'रामायण' के किरदारों में क्या कुछ बदला?

रणबीर कपूर की फिल्म रामायण बड़े पर्दे पर रिलीज हो गई है. इसके साथ ही रामानंद सागर की रामायण पर भी फिर से चर्चा शुरू हो गई है. क्योंकि रामानंद सागर की 'रामायण' चार दशक बीत जाने के बाद भी भारतीय दर्शकों के जहन में बैठी हुई है.

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रामायण कितनी बदली? (Photo:Social Media) रामायण कितनी बदली? (Photo:Social Media)

शिखर नेगी

  • नई दिल्ली,
  • 07 नवंबर 2026,
  • अपडेटेड 7:26 AM IST

हाल ही में फिल्म 'रामायण' देखी और सच कहूं तो हफ्तों से कास्टिंग को लेकर जो चर्चाएं चल रही थीं, पर्दा उठते ही वे सब सामने आ गईं. आप दुनिया के किसी भी कोने में रामायण बना लें, दर्शकों के दिलों-दिमाग पर रामानंद सागर की 1987 वाली रामायण की छाप इतनी गहरी है कि आप तुलना किए बिना रह ही नहीं सकते.

फिल्म की कास्टिंग में कोई बड़ी तकनीकी दिक्कत नहीं है, लेकिन असली खेल छिपा है इसकी राइटिंग और उस सोच में जिसे यह फिल्म आज के दौर में परोसना चाहती है. आइए, दोनों दौर की इस कहानी के मुख्य किरदारों और उनके बीच के फर्क को बेहद करीब से समझते हैं.

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अरुण गोविल और रणबीर कपूर 

1987 की रामानंद सागर की प्रसिद्ध सीरीज में अरुण गोविल ने जिस राम को जिया, वह शांत, सौम्य, मृदुभाषी और गहरी भक्ति से लबरेज था. उनकी संयमित मुद्रा और चेहरे के शांत भाव ने उन्हें ऐसा स्थायी आध्यात्मिक प्रतीक बना दिया कि आज भी भारत में जब कोई राम बनता है, तो उसकी तुलना सीधे अरुण गोविल से ही होती है.

दिलचस्प बात यह है कि इस नई फिल्म में अरुण गोविल खुद राजा दशरथ की भूमिका में नजर आते हैं. उनकी आवाज सुनकर आज भी पुराने राम की याद ताजा हो जाती है, हालांकि वह दशरथ के किरदार के साथ पूरी तरह न्याय करते नहीं दिखते.

इसके उलट, नितेश तिवारी की 2026 की 'रामायण' में रणबीर कपूर एक पूरी तरह अलग अंदाज में नजर आते हैं. यहां राम अधिक एथलेटिक, जमीन से जुड़े और शारीरिक रूप से सक्रिय योद्धा राजकुमार के रूप में दिखते हैं. उनकी एक्टिंग एक तरफ आध्यात्मिक स्थिरता तो दूसरी तरफ वनवास झेल रहे इंसान के साहस और भावनात्मक कमजोरियों के बीच बेहतरीन संतुलन बिठाती है. हालांकि, रणबीर को राम के रूप में देखना थोड़ा अजीब जरूर लगता है क्योंकि उनकी पिछली हिंसात्मक और कमर्शियल फिल्मों की इमेज दर्शकों के दिमाग में ताजा है, जिससे एकदम से ढल पाना थोड़ा मुश्किल हो जाता है.

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साई पल्लवी और दीपिका चिखलिया

रामानंद सागर की रामायण में दीपिका चिखलिया ने जिस सीता को पर्दे पर उतारा, उसमें पारंपरिक संयम, शांत शालीनता और गहरा आत्म-सम्मान झलकता था. उन्होंने इस किरदार को केवल निभाया नहीं बल्कि जिया था, और उनकी आंखों में राम के प्रति जो बेइंतहा सम्मान और प्यार दिखता था, उसने भारतीय परिवारों के दिलों को गहराई से छू लिया था.

वहीं, 2026 की फिल्म में साई पल्लवी द्वारा निभाया गया सीता का किरदार पुरानी छवि से कोसों दूर है. यहां की सीता बिल्कुल आधुनिक और बेबाक हैं. राम की तरह ही वह भी एथलेटिक हैं और तलवारबाजी में पूरी तरह निपुण हैं. फिल्म में एक ऐसा सीन भी है जहां मां सीता युद्ध के मैदान में उतरकर फुल एक्शन मोड में नजर आती हैं और राम व लक्ष्मण के साथ मिलकर 14000 राक्षसों को धूल चटाती हैं. यहां तक कि सीता हरण के दौरान उनकी आंखों में डर या आंसू की एक बूंद तक नहीं दिखती, जो पारंपरिक भारतीय मानस के लिए एक बहुत बड़ा बदलाव है.

अरविंद त्रिवेदी और यश

1987 की सीरीज में अरविंद त्रिवेदी ने रावण को एक पारंपरिक, नाटकीय भव्यता, दमदार संवादों, गूंजती हुई हंसी और पूरी ऊर्जा के साथ एक खूंखार पौराणिक खलनायक के रूप में अमर कर दिया था. उनके एक-एक संवाद में रावण का अहंकार और उसका खौफ साफ झलकता था, और सबसे बड़ी बात यह है कि उस दौर में रावण के किरदार का कोई महिमामंडन या पॉलिशिंग नहीं की गई थी.

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इसके विपरीत, 2026 की फिल्म में यश ने रावण को एक बेहद प्रभावशाली, राजनीतिक रूप से चतुर और जटिल लंकापति के रूप में पेश किया है. नितेश तिवारी की रामायण में रावण को सिर्फ एक घृणित खलनायक दिखाने के बजाय उसकी बुद्धिमत्ता, ताकत और उसके अंदरूनी उद्देश्यों को समझने में काफी समय लगाया है. यश अपनी एक्टिंग में बेहतरीन लग रहे हैं, लेकिन जिस तरह से इस किरदार को गढ़ा गया है, उसे देखकर कई बार ऐसा लगने लगता है कि मेकर्स रावण को सही ठहराने या उसका महिमामंडन करने की कोशिश कर रहे हैं.

लक्ष्मण का बदल गया अंदाज

सुनील लहरी ने 1987 की सीरीज में बड़े भाई राम के प्रति अपने जोशीले, भावपूर्ण और युवा समर्पण से सबका दिल जीता था. उनकी आंखों में हर वक्त एक खास किस्म का गुस्सा, वफादारी और बड़बोलापन दिखाई देता था, जो लक्ष्मण के किरदार की यूएसपी थी.

वहीं 2026 की फिल्म में रवि दुबे ने इस वफादार छोटे भाई के रिश्ते को आज के दौर की सिनेमाई तीव्रता के साथ पेश किया है. इन्हें आप एक तरह से 'जेन जी' लक्ष्मण कह सकते हैं, जिनकी भाषा उतनी संयमित नहीं है, जो आंख भी मारते हैं, बेझिझक गुस्सा दिखाते हैं और एक्शन के लिए हर पल तैयार रहते हैं.  उनके संवाद काफी हल्के-फुल्के हैं. अगर आपने फिल्म 'हम साथ-साथ हैं' में सैफ अली खान का किरदार देखा होगा, तो यह लक्ष्मण आपको कहीं न कहीं उसी मस्तीखोर और आधुनिक अंदाज की याद दिलाएगा.

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बदल गई शूर्पणखा
रेणु धारीवाल का किरदार पीढ़ियों के जहन में बस गया है. रामानंद सागर ने लोक-कथाओं की परंपरा का सहारा लेते हुए, शूर्पणखा को एक ऐसी राक्षसी के रूप में पेश किया जो एकदम बेबाक, निडर और डरावनी थी. उनकी खौफनाक हंसी और राम-लक्ष्मण के साथ उनका आक्रामक सामना, पुराने भारतीय टेलीविजन की एक यादगार पहचान बन गया है.

इसके विपरित नितेश तिवारी की रामायण में रकुल प्रीत सिंह का किरदार शूर्पणखा एक बहुत ही खास शैली में, मानवीय रूप में पेश किया गया है. इसमें उसे किसी डरावने या राक्षसी रूप में दिखाने के बजाय, तिवारी ने लंका की राजकुमारी के तौर पर उसके शाही अंदाज के तौर पर दिखाया गया. उसे काफी अट्रैक्टिव दिखाया गया है. हालांकि मेकर्स ने इसे ये सोचकर पेश किया है, जो सुंदर होने के बावजूद ठुकरा दी गई.

कैकेयी की बदली इमेज
रामानंद सागर के टीवी सीरियल 'रामायण' में कैकेयी का किरदार पद्मा खन्ना ने निभाया था. जिसे राम से प्यार तो था लेकिन वो भ्रमित मंथरा के लगातार बहकाने से होती है. यहां कैकेयी को योद्धा की तरह भी दिखाया गया था.  जिसके बाद पारंपरिक, नाटकीय और भावनात्मक रुप देखने को मिला. 

वहीं नितेश तिवारी की रामायण में कैकेयी का किरदार लारा दत्ता ने निभाया. यहां पर लारा दत्ता और अरुण गोविल (दशरथ) के बीच उम्र का फासला भी साफ दिखा. इसके अलावा लारा दत्ता को राजनीतिक रूप से प्रखर, मजबूत इरादों वाली रानी के तौर पर दिखाया. जिसने मंथरा को कई बार टोका भी. यहां पर हो सकता है कि कैकेयी के किरदार से आपको नफरत ना हो, क्योंकि वो कहती भी हैं कि भाग्य को कौन मिटा सकता है. यानी यहां तर्क दिया गया कि राम को वनवास भेजना और रावण का अंत होना, उनकी ही वजह से है.
 

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भले ही रामानंद सागर की 'रामायण' की तुलना नितेश तिवारी की इस बड़े पर्दे की महत्वाकांक्षी फिल्म से करना पूरी तरह न्यायसंगत न लगे, क्योंकि दोनों के दौर, माध्यम और तकनीक में जमीन-आसमान का फर्क है. एक तरफ जहां वह टेलीविजन के सीमित संसाधनों में बनी एक पवित्र भावना थी, तो दूसरी तरफ यह आज की आधुनिक तकनीक, भारी-भरकम बजट और भव्य विजुअल इफेक्ट्स से सजी एक सिनेमैटिक फिल्म है.

लेकिन चूंकि दोनों ही हमारे सबसे बड़े और सम्मानित महाकाव्य को जीवंत करने का दावा करती हैं, इसलिए इनकी तुलना होना लाजिमी है. जहां रामानंद सागर की रामायण ने अपने बेजोड़ एक्टिंग और दिल को छू लेने वाली सरलता से इतिहास रचा, वहीं यह नई फिल्म आज के तकनीकी दौर में नए तेवर और कलेवर के साथ दर्शकों के सामने आई है, जिस पर बहस लम्बी चलने वाली है. हालांकि अभी रामायण का पार्ट 1 रिलीज हुआ है, अब 2028 में इसका पार्ट-2 रिलीज होगा. तब देखने वाली बात होगी कि आखिर क्या कुछ बदलता है.

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