कुछ फिल्में सिर्फ पर्दे पर नहीं बनतीं, उनकी कहानी कैमरे के पीछे भी लिखी जाती है. ‘पाकीजा’ ऐसी ही फिल्म है, जिसकी खूबसूरत तस्वीरों और मीना कुमारी के यादगार अभिनय के पीछे प्यार, तकरार, बीमारी, अफवाहों और बरसों की जद्दोजहद की एक लंबी कहानी छिपी है. 1972 में रिलीज हुई इस क्लासिक फिल्म को अब 54 साल बाद नए रूप में दुनिया के सामने लाया जा रहा है.
फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन ने करीब दो साल की मेहनत के बाद इसका 4K रेस्टोरेशन किया है और इसका वर्ल्ड प्रीमियर फ्रांस के फेस्टिवल ल्यूमिएर में होने जा रहा है. इसके बाद फिल्म लंदन फिल्म फेस्टिवल में भी दिखाई जाएगी.
लेकिन ‘पाकीजा’ की असली कहानी फिल्म के रिलीज होने से कहीं पहले शुरू हो चुकी थी. कमाल अमरोही ने 1956 में इस फिल्म की शूटिंग शुरू की थी. शुरुआत में फिल्म ब्लैक एंड व्हाइट में बनाई जा रही थी, लेकिन बाद में रंगीन सिनेमा का दौर आया तो उन्होंने फिल्म को ईस्टमैनकलर में दोबारा शूट करने का फैसला किया. इसके बाद सिनेमास्कोप का दौर आया और फिल्म के विजुअल्स को लेकर अमरोही की परफेक्शनिज्म ने शूटिंग को और लंबा कर दिया. महंगे सेट, बार-बार बदलाव, लोकेशन और तकनीकी परेशानियों के बीच फिल्म की शूटिंग कभी चलती तो कभी रुक जाती. इतना ही नहीं, स्टूडियो में लगी आग में फिल्म के पुराने ब्लैक एंड व्हाइट निगेटिव का कुछ हिस्सा भी बर्बाद हो गया.
फिर आई इस कहानी की सबसे निजी और सबसे चर्चित परत. मीना कुमारी और कमाल अमरोही पति-पत्नी थे, लेकिन दोनों के रिश्ते में तनाव बढ़ता गया. 1964 में दोनों अलग हो गए और इसी के साथ ‘पाकीजा’ का काम भी ठंडे बस्ते में चला गया. इसी दौर में मीना कुमारी की जिंदगी शराब और बिगड़ती सेहत की मुश्किलों से घिर गई. 1968 में उन्हें लिवर सिरोसिस का पता चला और इलाज के लिए विदेश भी जाना पड़ा. फिल्म लगभग अधूरी पड़ी रही.
और फिर इस कहानी में धर्मेंद्र का नाम भी जुड़ा. रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि धर्मेंद्र फिल्म में मीना कुमारी के हीरो बनने वाले थे और दोनों की नजदीकियों की चर्चा के बाद कमाल अमरोही ने उन्हें फिल्म से हटा दिया. हालांकि यह बात लंबे समय से किस्सों और रिपोर्ट्स का हिस्सा रही है, इसकी अलग-अलग व्याख्याएं भी मिलती हैं. बाद में फिल्म में राज कुमार ने सलीम का किरदार निभाया.
‘पाकीजा’ की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं. फिल्म के सिनेमैटोग्राफर जोसेफ विरशिंग का 1967 में निधन हो गया. संगीतकार गुलाम मोहम्मद भी फिल्म की रिलीज से पहले दुनिया छोड़ गए और बाद में नौशाद ने फिल्म के बैकग्राउंड स्कोर को पूरा किया. आखिरकार सुनील दत्त और नरगिस के समझाने के बाद मीना कुमारी ने 1969 में फिल्म दोबारा शुरू की. तब तक बीमारी ने उनके शरीर को बुरी तरह प्रभावित कर दिया था, लेकिन उन्होंने फिल्म पूरी करने की ठान ली.
4 फरवरी 1972 को ‘पाकीजा’ रिलीज हुई और कुछ ही हफ्तों बाद मीना कुमारी का निधन हो गया. उनकी मौत ने फिल्म को एक अलग ही भावनात्मक विरासत दे दी.
आज 54 साल बाद जब वही ‘पाकीजा’ 4K में दुनिया के सामने लौट रही है, तो उसके हर रंग के पीछे मीना कुमारी की वो जिंदगी भी दिखाई देगी, जिसने इस फिल्म को सिर्फ एक क्लासिक नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा की सबसे दर्दनाक फिल्मी कहानियों में शामिल कर दिया.
आरती गुप्ता