कभी मुलायम-मायावती का गढ़, तो कभी भाजपा का दबदबा… बदायूं में राजनीति की कहानी

यूपी का बदायूं जिला अपनी ऐतिहासिक विरासत के साथ-साथ दिलचस्प राजनीतिक इतिहास के लिए भी जाना जाता है. यहां मुलायम सिंह यादव, मायावती और शिवपाल यादव जैसे दिग्गज नेताओं का चुनावी प्रभाव रहा है. 2017 में भाजपा ने पांच सीटें जीतकर बड़ा उलटफेर किया. छह विधानसभा सीटों वाले इस जिले में 2022 में भाजपा और सपा ने तीन-तीन सीटें जीती थी. बदायूं की राजनीति में यादव, मुस्लिम, मौर्य-शाक्य और अन्य समुदायों के मतदाताओं की भूमिका अहम रही है.

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बदायूं जिले में कुछ छह विधानसभा सीटें हैं (Photo: AI generated) बदायूं जिले में कुछ छह विधानसभा सीटें हैं (Photo: AI generated)

aajtak.in

  • बदायूं ,
  • 08 नवंबर 2026,
  • अपडेटेड 11:02 AM IST

यूपी के रुहेलखंड क्षेत्र में स्थित बदायूं की पहचान केवल ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत तक सीमित नहीं है. यह जिला प्रदेश की राजनीति में भी खास जगह रखता है. समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव, बसपा प्रमुख मायावती के अलावा सलीम शेरवानी, धर्मेंद्र यादव, शिवपाल यादव के बेटे आदित्य यादव जैसे नेताओं के साथ-साथ भाजपा की संघमित्रा मौर्य और स्वामी चिन्मयानंद भी यहां की चुनावी चर्चा का हिस्सा रहे हैं. कभी समाजवादी पार्टी ने विधानसभा की कई सीटों पर मजबूत पकड़ बनाई, तो कभी भाजपा ने जिले की अधिकांश सीटें जीतकर सियासी समीकरण बदल दिए. बसपा का प्रभाव भी यहां अलग-अलग चुनावों में देखने को मिला.

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बदायूं की ऐतिहासिक पहचान 

जिला प्रशासन के अनुसार, जिले का कुल क्षेत्रफल करीब 4,234 वर्ग किलोमीटर है. 2011 की जनगणना के आंकड़ों में जिले की आबादी लगभग 31.29 लाख दर्ज है. यहां ग्रामीण आबादी का हिस्सा शहरी आबादी से काफी अधिक है. जिले का इतिहास काफी पुराना माना जाता है. जिला प्रशासन के मुताबिक 11वीं शताब्दी के एक अभिलेख का उल्लेख है, जिसमें इस नगर का नाम ‘वोदामयूता’ बताया गया है. बदायूं के पांचाल क्षेत्र से जुड़े प्राचीन संदर्भ भी मिलते हैं. हालांकि, नगर की स्थापना से जुड़ी कई अलग-अलग मान्यताएं भी प्रचलित हैं. 1838 में बदायूं जिला मुख्यालय बना. मध्यकाल में भी यह क्षेत्र प्रशासनिक और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा. जिले की ऐतिहासिक इमारतों में जामा मस्जिद शमशी, इखलास खां का रोजा और बदायूंनी का मकबरा प्रमुख हैं. इन स्मारकों से शहर के लंबे इतिहास और स्थापत्य परंपरा की झलक मिलती है.

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बदायूं को जिला प्रशासन की वेबसाइट पर सूफी संतों और धार्मिक स्थलों की भूमि के रूप में वर्णित किया गया है. यहां की जामा मस्जिद शमशी मध्यकालीन स्थापत्य का प्रमुख उदाहरण है. जिला प्रशासन के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, दिल्ली सल्तनत के शासक इल्तुतमिश ने 1222 ईस्वी में इस मस्जिद का निर्माण कराया था. जिले के दूसरे चर्चित स्थलों में इखलास खां का रोजा, पिसनहारी का गुंबद और कछला गंगा घाट के आसपास स्थित धार्मिक स्थल शामिल हैं. इन जगहों से बदायूं की सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय आस्था की विविधता सामने आती है.

जब मायावती और मुलायम सिंह यादव ने बदायूं का रुख किया

बदायूं की विधानसभा राजनीति में 1990 के दशक का दौर काफी दिलचस्प रहा. वर्ष 1996 के विधानसभा चुनाव में मायावती ने बिल्सी सीट से और मुलायम सिंह यादव ने सहसवान से चुनाव लड़ा था. उस समय जिले की सात विधानसभा सीटों पर अलग-अलग दलों के बीच मुकाबला देखने को मिला. इस चुनाव में बसपा ने दो, सपा ने तीन, भाजपा ने एक और जनता दल ने एक सीट जीती थी. वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन और मजबूत रहा. जिले की सात सीटों में से पांच पर सपा ने जीत दर्ज की. बसपा और जनता दल (यूनाइटेड) को एक-एक सीट मिली. वर्ष 2007 में मुलायम सिंह यादव ने एक बार फिर बदायूं क्षेत्र की गुन्नौर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. हालांकि, जिले की अन्य सीटों पर समीकरण बदल गए. उस चुनाव में बसपा ने तीन सीटें जीतीं, जबकि सपा और भाजपा को एक-एक सीट मिली. दो सीटों पर राष्ट्रीय परिवर्तन दल के प्रत्याशी विजयी हुए. बाद में डीपी यादव और उनकी विधायक पत्नी के बसपा में शामिल होने से क्षेत्र की राजनीति में एक नया मोड़ आया.

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गुन्नौर के संभल में जाने के बाद बदली चुनावी तस्वीर

वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव तक बदायूं की चुनावी तस्वीर बदल चुकी थी. परिसीमन के बाद गुन्नौर विधानसभा सीट संभल जिले से जुड़ गई और बदायूं में छह विधानसभा सीटें रह गईं. इनमें बिसौली, सहसवान, बिल्सी, बदायूं, शेखुपुर और दातागंज शामिल हैं. 2012 के चुनाव में समाजवादी पार्टी ने चार सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि दो सीटें बसपा के खाते में गईं. लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में तस्वीर पूरी तरह बदल गई. भाजपा ने बदायूं की छह में से पांच सीटों पर जीत हासिल की. सहसवान सीट समाजवादी पार्टी के पास रही. इस सीट से ओमकार सिंह यादव की जीत को सपा के लिए अहम माना गया. 

2022 में भी भाजपा और सपा के बीच मुकाबला

वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में बदायूं की छह सीटों पर भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच मुकाबला केंद्र में रहा. पिछले चुनाव में पांच सीटें जीतने वाली भाजपा को इस बार पहले जैसी बढ़त नहीं मिली. सपा ने भी अपनी स्थिति मजबूत की और दो सीटों पर जीत दर्ज की. 

2022 में किसका कहां बजा डंका

बिसौली: यहां से सपा के आशुतोष मौर्य जीते हैं. उन्होंने बीजेपी कुशाग्र सागर को 1834 वोटों से हरा दिया.

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सहसवान: सपा के ब्रजेश यादव इस सीट पर जीते हैं. उन्होंने बीएसपी के मुसर्रत अली को हराया. दोनों के बीच वोटों का अंतर 13 हजार 945 रहा.

बिल्सी: बीजेपी के हरीश चंद्र यहां से जीते हैं. वो 25115 वोटों से जीते. उन्होंने सपा के चंद्रप्रकाश मौर्य को हराया

बदायूं: बीजेपी के महेश चंद्र गुप्ता यहां से 11 हजार 179 वोटों जीते हैं. उन्होंने सपा के रईस अहमद को हाराया.

शेखूपुर: यहां 6100 वोटों सपा के हिमांशू यादव जीते.उन्होंने बीजेपी के धर्मेंद्र कुमार शाक्य को हराया. 

दातागंज: दातागंज सीट से बीजेपी के राजीव कुमार जीते हैं. उन्होंने सपा के अर्जुन सिंह को हराया.

सामाजिक समीकरण भी चुनावी राजनीति में अहम

बदायूं में हिंदू और मुस्लिम आबादी के साथ-साथ विभिन्न पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जातियों के मतदाता चुनावी समीकरणों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. यादव और मुस्लिम मतदाताओं को लंबे समय से समाजवादी पार्टी का अहम समर्थक आधार माना जाता रहा है. वहीं, भाजपा को कई चुनावों में गैर-यादव पिछड़े वर्गों, सवर्णों और अन्य समुदायों के समर्थन से फायदा मिला है. बसपा का प्रभाव भी उसके सामाजिक आधार और स्थानीय नेतृत्व के अनुसार बदलता रहा है.

लोकसभा चुनाव: बदायूं में सपा की मजबूत मौजूदगी, भाजपा की वापसी

बदायूं लोकसभा सीट का चुनावी इतिहास भी उतार-चढ़ाव से भरा रहा है. यहां कांग्रेस, जनता दल, भाजपा और समाजवादी पार्टी अलग-अलग समय पर जीत हासिल करते रहे हैं. समाजवादी पार्टी ने विशेष रूप से 1990 के दशक के मध्य से इस सीट पर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई. वर्ष 1984 के लोकसभा चुनाव में सलीम शेरवानी कांग्रेस के टिकट पर सांसद चुने गए थे. बाद के वर्षों में बदायूं की राजनीति में जनता दल और फिर समाजवादी पार्टी का प्रभाव बढ़ा. 1989 में जनता दल के शरद यादव ने इस सीट पर जीत दर्ज की. 1991 में भाजपा के स्वामी चिन्मयानंद ने जीत हासिल कर पार्टी का खाता खोला. इसके बाद सलीम शेरवानी समाजवादी पार्टी में शामिल हुए और 1996, 1998, 1999 तथा 2004 के लोकसभा चुनावों में जीत दर्ज की.

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लगातार जीत के इस दौर ने उन्हें बदायूं की राजनीति का प्रमुख चेहरा बना दिया. हालांकि, 2009 में सपा ने उन्हें टिकट नहीं दिया. उस चुनाव में धर्मेंद्र यादव सपा के टिकट पर विजयी हुए और बदायूं की राजनीति में उनका प्रभाव बढ़ा. वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के धर्मेंद्र यादव ने बदायूं सीट पर जीत हासिल की. लेकिन 2019 के चुनाव में भाजपा की संघमित्रा मौर्य ने उन्हें हराकर सीट पर कब्जा कर लिया. इस जीत के साथ भाजपा ने लंबे अंतराल के बाद बदायूं लोकसभा सीट पर अपनी स्थिति मजबूत की. संघमित्रा मौर्य की जीत को जिले की राजनीति में बड़े बदलाव के रूप में देखा गया. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने फिर वापसी की. शिवपाल यादव के बेटे आदित्य यादव ने बदायूं सीट पर जीत दर्ज की. 

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