सियासत के दो आउटसाइडर: केजरीवाल के अनुभवों से थलपति विजय को क्या सीखना चाहिए?

थलपति विजय और अरविंद केजरीवाल दोनों ही स्थापित व्यवस्था को चुनौती देने वाले 'डिसरप्टर्स' के रूप में उभरे, जहां विजय का करिश्मा सिनेमाई पर्दे से आता है, वहीं केजरीवाल का आधार ज़मीनी सक्रियता थी, लेकिन दोनों ही जनता की राजनीतिक हताशा और बदलाव की तीव्र आकांक्षा के प्रतीक हैं.

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विजय और केजरीवाल की राजनीति का तुलनात्मक सफर (Photo-ITG) विजय और केजरीवाल की राजनीति का तुलनात्मक सफर (Photo-ITG)

प्रीति चौधरी

  • नई दिल्ली,
  • 07 मई 2026,
  • अपडेटेड 11:29 AM IST

मुझे एक शब्द नापसंद है- आशा!

यह एक ऐसे भविष्य में भावनात्मक निवेश की मांग करती है, जिसके आने का कोई प्रमाण नहीं है और जब वह भविष्य बार-बार ठहर जाता है, तो यही आशा हताशा में बदल जाती है. फिर भी जब सब कुछ विफल हो जाता है, तब केवल आशा ही शेष रहती है. इंसान की फितरत ऐसी है कि सब कुछ खत्म होने के बाद भी वह उम्मीद का दामन नहीं छोड़ पाता, और यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है. राजनीति इसी कमजोरी का फायदा उठाती है, जब लोग थककर निराश हो जाते हैं, तब वे किसी ऐसे जादुई नेता या 'मसीहा' की तलाश करने लगते हैं जो आकर उनके सारे दुख दूर कर दे.

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तमिलनाडु इसका एक जीता-जागता उदाहरण है.

दशकों से वहां का राजनीतिक परिदृश्य द्रविड़ दिग्गजों के आपसी खींचतान और प्रभाव के बीच फंसा हुआ है. सत्ता बदलती रही, भाषणबाजी का दौर विकसित हुआ और लंबे समय से सत्ता के एक ही ढर्रे को देखते-देखते जनता के बीच एक तरह की थकान और ऊब पैदा हो गई. यहीं विजय और उनकी पार्टी, 'तमिलगा वेट्ट्री कज़गम' (TVK) की एंट्री होती है.

वह किसी परखे हुए राजनीतिक रिकॉर्ड या शासन के किसी ठोस ब्लूप्रिंट के साथ नहीं आते. इसके बजाय, वह जो लेकर आते हैं, वह है बदलाव की हलचल और एक ऐसे माहौल में जहां लोग बार-बार वही पुरानी राजनीति देखकर थक चुके हों, वहां केवल यह बदलाव ही 'आशा' जगाने के लिए काफी है.

तमिलनाडु में रचा इतिहास

4 मई को, जब नतीजे आने लगे, तो यह साफ हो गया कि राजनीति को नई दिशा देने वाला यह खिलाड़ी सिर्फ आने की तैयारी में नहीं था बल्कि वह आ चुका था, ऐसा करके उन्होंने पारंपरिक ज्ञान की उस हर धारणा को तोड़ दिया, जिसका दावा था कि उनके इर्द-गिर्द दिखने वाला उत्साह वोटों में नहीं बदलेगा, लेकिन वह उत्साह वोटों में बदला और इसके साथ ही, टीवी स्टूडियो के घिसे-पिटे माहौल और अनुभवी राजनीतिक विश्लेषकों ने खुद को मंत्रमुग्ध होकर इस नए बदलाव को टकटकी लगाए देखते हुए पाया.

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यह भारतीय राजनीति का एक अप्रत्याशित क्षण था. दुर्लभ, रोमांचक और क्रांतिकारी, ऐसा क्षण शायद एक पीढ़ी में एक बार ही आता है. आशा का अचानक उदय, बदलाव का ठोस वादा. इससे कुछ सालों पहले कुछ ऐसा ही चेन्नई से 2,500 किलोमीटर उत्तर में नई दिल्ली में हुआ था. भ्रष्टाचार के खिलाफ एक जमीनी आंदोलन एक राजनीतिक शक्ति में तब्दील हो गया, जिससे अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी का उदय हुआ.

इन दोनों के बीच समानताएं अपरिहार्य हैं. एक बिजली की तेजी से हुआ उदय, जनता के मोहभंग से ताकत पाने वाली एक कहानी, और एक ऐसा नेता जिसे स्थापित मानदंडों को चुनौती देने वाले एक 'आउटसाइडर' के रूप में पेश किया गया. 

लेकिन क्या ये समानताएं वास्तव में टिकती हैं? और यदि हां, तो किस हद तक?

आइए समानताओं से शुरू करते हैं. ..

ऊपरी तौर पर, ये समानताएं चौंकाने वाली हैं. केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (AAP) के शुरुआती दिनों (2013-2015) की तरह, TVK भी एक 'स्टार्टअप' राजनीतिक प्रयोग का प्रतिनिधित्व करती है. एक अनपरखी हुई इकाई जो लंबे समय से स्थापित दिग्गजों के वर्चस्व वाली व्यवस्था को चुनौती देने की कोशिश कर रही है.

दोनों नेताओं ने सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाया. केजरीवाल ने खुद को दिल्ली में कांग्रेस और भाजपा जैसे पारंपरिक दलों के विकल्प के रूप में पेश किया, जबकि विजय उन मतदाताओं को लुभा रहे हैं जो द्रमुक (DMK) और अन्नाद्रमुक (AIADMK) के नेतृत्व वाले मौजूदा द्रविड़ शासन से असंतुष्ट हैं. बस एक छोटा सा अंतर यह है एक राष्ट्रीय दिग्गजों से लोहा ले रहा था, तो दूसरा क्षेत्रीय क्षत्रपों से.

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एक और समानचा यह है कि दोनों को ही परिणाम आने के दिन से पहले अनिश्चितता का सामना करना पड़ा. जिस तरह शुरुआती दौर में 'आप' के चुनावी अनुमानों को लेकर कोई स्पष्टता नहीं थी, ठीक वैसे ही टीवीके (TVK) की संभावनाओं पर भी भारी बहस छिड़ी रही. कुछ अनुमानों में इसे केवल वोट काटने वाले एक 'स्पॉइलर' के रूप में एक मामूली शुरुआत बताया गया, जबकि अन्य ने इसके आश्चर्यजनक रूप से शानदार प्रदर्शन का संकेत दिया.

यहां व्यक्तिगत करिश्मे की भी अहम भूमिका है. विजय के पास दशकों के फिल्मी करियर से बना एक विशाल प्रशंसक आधार है. उनकी अधिकांश फिल्मों ने उन्हें व्यवस्था से लोहा लेने वाले एक 'एंटी-एस्टेब्लिशमेंट अंडरडॉग' के रूप में दिखाया है. यह काफी हद तक वैसा ही है जैसे केजरीवाल ने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान अर्जित जन-विश्वास का लाभ उठाया था. हालांकि शुरुआत में अन्ना हजारे उस आंदोलन का चेहरा थे, लेकिन केजरीवाल को उस साये से बाहर निकलकर खुद को 'आम आदमी' के असली नायक के रूप में पेश करने में ज्यादा समय नहीं लगा. दोनों ही मामलों में, लोकप्रियता ने शुरुआती राजनीतिक पूंजी का काम किया.

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दिल्ली से कैसे अलग है तमिलनाडु

दोनों ही आंदोलन दिल्ली में 'आप' और तमिलनाडु में 'TVK' ऐसे समय में उभरे जब जनता राजनीतिक व्यवस्था से निराश थी और विपक्ष में किसी प्रभावशाली ताकत की कमी साफ नजर आ रही थी.

दिल्ली में माहौल गुस्से से भरा था. तत्कालीन सरकार 2जी स्पेक्ट्रम विवाद से लेकर कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाले जैसे भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी थी, वहीं निर्भया कांड ने जनता के आक्रोश को और बढ़ा दिया था और शासन पर से विश्वास खत्म कर दिया था. इस पृष्ठभूमि में, अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को एक ताज़ा विकल्प के रूप में देखा गया. एक ऐसी बाहरी ताकत, जिसने व्यापक मोहभंग को राजनीतिक कार्यवाही में बदल दिया.  

तमिलनाडु एक अलग, हालांकि पूरी तरह से भिन्न नहीं, संदर्भ पेश करता है. यहां असंतोष दिल्ली जैसा विस्फोटक तो नहीं था, लेकिन उसे महसूस साफ तौर पर किया जा सकता था. विशेष रूप से अन्नाद्रमुक (AIADMK) के कमजोर होने के बीच, मतदाताओं में धीरे-धीरे एक तरह की ऊब पैदा हो गई. भले ही यहां की भावनात्मक तीव्रता दिल्ली के उस बड़े उथल-पुथल जितनी न हो, फिर भी परिस्थितियां बदलाव की गुंजाइश का संकेत दे रही थीं. दोनों ही मामलों में, समय  बहुत महत्वपूर्ण साबित हुआ. जब स्थापित पार्टियां थकी हुई दिखने लगें और विपक्ष में कल्पनाशीलता की कमी हो, तो एक नई या गैर-पारंपरिक ताकत के लिए भी उपजाऊ जमीन तैयार हो जाती है.

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एक और समानता की संभावना भी दिख रही है.  2013 में केजरीवाल की पहली सरकार, जहां 'आप' ने 70 में से 28 सीटें जीती थीं, उसे कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया था. तमिलनाडु में भी कांग्रेस विजय को समर्थन देने के लिए बातचीत कर रही है. इन समानताओं के बावजूद, अंतर काफी बड़े और निर्णायक हैं. उत्पत्ति और संगठनात्मक संरचना की बात करें तो, केजरीवाल का उदय 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' आंदोलन से हुआ था, जिसने शासन सुधार और भ्रष्टाचार विरोध पर केंद्रित एक मजबूत राजनीतिक आधार प्रदान किया. उनके अभियान को कार्यकर्ताओं, नीति विचारकों और जमीनी स्वयंसेवकों का समर्थन प्राप्त था.

इसके विपरीत, विजय की एंट्री सिनेमा की दुनिया और उनके प्रशंसकों के आधार से हुई है, जहां वे अपनी ऑन-स्क्रीन छवि को ऑफ-स्क्रीन राजनीति में बदलने का वादा कर रहे हैं. हालांकि उनके फैन क्लब एक बना-बनाया नेटवर्क प्रदान करते हैं, लेकिन वे राजनीतिक रूप से प्रशिक्षित कैडर या नीति-संचालित स्वयंसेवकों के समान नहीं हैं.

विजय और केजरीवाल दोनों को विरासत में बेहद अलग राजनीतिक परिस्थितियां मिलीं. दिल्ली, तमिलनाडु जैसे पूर्ण विकसित राज्य से काफी भिन्न है. दिल्ली एक 'अर्ध-राज्य' (half-state) के रूप में कार्य करती है, जहां विधानसभा की केवल 70 सीटें, केवल 7 लोकसभा क्षेत्र और 7 कैबिनेट मंत्री होते हैं. इसके अलावा, केंद्र सरकार के साथ साझा शासन संरचना के कारण इसके मुख्यमंत्री और कैबिनेट की शक्तियां तुलनात्मक रूप से सीमित हैं.

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इसके विपरीत, तमिलनाडु एक पूर्ण विकसित राज्य के रूप में संचालित होता है, जिसका राजनीतिक ढांचा काफी बड़ा है. इसमें 234 विधानसभा सीटें, 39 लोकसभा क्षेत्र और लगभग 35 मंत्रियों का एक बहुत बड़ा कैबिनेट शामिल है. यह संरचनात्मक अंतर प्रतिनिधित्व के पैमाने, प्रशासनिक अधिकार और शासन के स्तर पर मौजूद बड़े अंतर को दर्शाता है.

स्पष्टता और भविष्य की रूपरेखा में अंतर

कई लोग सुझाव देंगे कि वे लड़खड़ाए हैं, लेकिन केजरीवाल ने शुरुआत में शिक्षा, स्वास्थ्य और भ्रष्टाचार विरोधी उपायों पर केंद्रित एक स्पष्ट शासन एजेंडे के साथ राजनीति में प्रवेश किया था. इस स्पष्टता ने 'आप' को विरोध-प्रदर्शन से राजनीतिक नीति की ओर बढ़ने में मदद की. 

हालांकि, 'आप' के शुरुआती सफर में एक नाटकीय झटका भी शामिल था. 2013 में दिल्ली में अल्पसंख्यक सरकार बनाने के बाद, भ्रष्टाचार विरोधी मुख्य वादे 'जन लोकपाल विधेयक' को पारित न कर पाने के कारण केजरीवाल ने 48 दिनों के भीतर इस्तीफा दे दिया था. उस इस्तीफे ने राजनीतिक सुविधा के बजाय जवाबदेही के इर्द-गिर्द पार्टी की पहचान को और मजबूत किया.

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आश्चर्यजनक रूप से, इस घटनाक्रम ने 'आप' की लोकप्रियता को कम नहीं किया, इसके बजाय इसने ईमानदारी और शुचिता की उसकी सार्वजनिक छवि को और मजबूत ही किया. 2015 में, पार्टी ने ऐतिहासिक वापसी की और 70 में से 67 सीटें जीतकर भारत की राज्य राजनीति में अब तक की सबसे निर्णायक चुनावी जीत दर्ज की.

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कई लोग विजय के चुनाव-पूर्व गठबंधन न करने के फैसले को एक साहसी राजनीतिक कदम के रूप में देखते हैं, जिसने पारंपरिक राजनीति और सौदेबाजी वाले गठबंधनों से थक चुके मतदाताओं का विश्वास जीता. उनके इस निर्णय ने उन लोगों के बीच उनकी अपील बढ़ा दी जो स्थापित राजनीतिक मानदंडों के विकल्प की तलाश में थे.

हालांकि, विजय अभी भी एक व्यापक राजनीतिक दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने की प्रक्रिया में हैं. आने वाले समय में वह अपनी शासन प्राथमिकताओं को कितनी स्पष्टता के साथ परिभाषित करते हैं, यह उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा. यही यह तय करेगा कि वह पर्दे पर मिलने वाली दीवानगी को एक नीति निर्माता के रूप में मिलने वाली टिकाऊ विश्वसनीयता और सम्मान में कितनी सहजता से बदल पाते हैं. 

विजय के शुरुआती राजनीतिक सफर को आकार देने वाला एक अहम सवाल यह होगा कि वह अपनी लड़ाइयों को कितनी रणनीतिक रूप से चुनते हैं, और खुद को दूसरों से कितना अलग और स्पष्ट रूप से स्थापित कर पाते हैं.

विजय ने पहले ही भाजपा को अपने वैचारिक विरोधी और DMK को तमिलनाडु में अपने तात्कालिक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में पहचान लिया है. यह दोहरी स्थिति एक राष्ट्रीय वैचारिक रुख अपनाने और एक क्षेत्रीय चुनावी चुनौती पेश करने, दोनों के इरादे को दर्शाती है.

हालांकि, इसके साथ कुछ जाने-पहचाने राजनीतिक जोखिम भी जुड़े हैं. अरविंद केजरीवाल के साथ तुलना यहां एक शिक्षाप्रद और चेतावनी भरी कहानी पेश करती है. दिल्ली की राजनीति में केजरीवाल की शुरुआती सफलता उनके भ्रष्टाचार विरोधी और शासन-केंद्रित स्पष्ट एजेंडे से आई थी, जिसने 2013 में कांग्रेस को उखाड़ फेंकने में मदद की, फिर भी, 2014 के आम चुनावों में अपनी चुनौती को राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने के उनके फैसले विशेष रूप से वाराणसी में नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने और कई राज्यों में उम्मीदवार उतारने का परिणाम एक गंभीर चुनावी झटके के रूप में निकला. कई उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई, जिसने संगठनात्मक गहराई के बिना तेजी से किए गए राष्ट्रीय विस्तार की सीमाओं को रेखांकित किया.

दिलचस्प बात यह है कि केजरीवाल ने बाद में जोरदार वापसी की और 2015 में दिल्ली की राजनीति पर अपना दबदबा कायम किया. फिर भी समय के साथ, आलोचकों का तर्क है कि केंद्र के साथ लगातार "डेविड बनाम गोलियत" वाली छवि बनाए रखने से, जहां राजनीतिक रूप से ऊर्जा तो मिली, वहीं पार्टी के दीर्घकालिक एकीकरण और संस्थागत मजबूती से ध्यान भटक गया होगा.

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विजय के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वे तमिलनाडु में अपनी पार्टी को ज़मीनी स्तर पर मजबूत करने और काम करने के तरीके पर ध्यान देंगे, या फिर वे सिर्फ बड़े नेताओं से उलझकर सुर्खियां बटोरने में लगे रहेंगे. चर्चा में रहना आसान है, लेकिन लंबे समय तक टिके रहने के लिए संगठन की मजबूती ज़रूरी है. उनकी सफलता इस बात पर निर्भर नहीं करेगी कि वे अपने विरोधियों से कितनी ज़ोर-शोर से लड़ते हैं, बल्कि इस पर निर्भर करेगी कि वे कितनी समझदारी और अनुशासन के साथ अपनी राजनीति को आगे बढ़ाते हैं.

विजय और केजरीवाल में क्या अंतर

जहां दक्षिण में फिल्मी सितारों को राजनीति में नए खिलाड़ियों के रूप में स्वीकार किया गया है, वहीं उत्तर भारत नए राजनीतिक चेहरों के प्रति कम उदार रहा है. दोनों ने जो समय दिया है, उसमें भी अंतर है विजय केवल 2 साल पहले पूरी तरह सक्रिय हुए, जबकि केजरीवाल राजनीति में उतरने से पहले एक दशक तक एक्टिविज्म के जरिए अपनी जमीन तैयार कर रहे थे.

हालांकि, जहां विजय को उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों ने काफी हद तक नजरअंदाज़ किया, वहीं अरविंद केजरीवाल को राजनीतिक पार्टी बनाने से पहले ही कांग्रेस ने लोकपाल परिषद में शामिल कर उन्हें एक प्रकार की वैधता दे दी थी.

एक और बड़ा अंतर यह है कि विजय एक स्थापित 'हीरो' हैं, जबकि केजरीवाल 'एंटी-हीरो' थे. यानी वह 'आम आदमी' जो तंत्र को बदलने के लिए जनता के बीच से उठा था, और जिसका वादा था कि वह हमेशा उन्हीं में से एक बना रहेगा. विजय से ऐसी कोई अपेक्षा नहीं है. वह निर्विवाद रूप से भारत के सबसे महंगे सुपरस्टार्स में से एक हैं. कई रैलियों में उन्होंने कहा है कि वे जनसेवा के लिए प्रति फिल्म 200 करोड़ रुपये कमाने वाली आरामदायक जिंदगी छोड़ रहे हैं. उन पर एक साधारण आम आदमी की तरह रहने का कोई दबाव नहीं है. जब तक वे अपना काम करते रहेंगे, उनकी विलासिता पर सवाल नहीं उठाया जाएगा. उनके निजी जीवन की जांच के घेरे में आने की संभावना कम है.

विजय भले ही अपनी स्टार छवि को पीछे छोड़ चुके हों, लेकिन जनता ने अभी तक उन्हें पूरी तरह एक राजनेता के रूप में नहीं देखा है. उनके चारों ओर का प्रभामंडल और दीवानगी अब भी बरकरार है. कम से कम कुछ समय के लिए तो वे राजनेताओं के लिए इस्तेमाल होने वाले घिसे-पिटे तानों और शिकायतों से बचे रहेंगे, लेकिन अरविंद केजरीवाल के साथ ऐसा नहीं था, है ना?

वैगन-आर से महिंद्रा एसयूवी, पुरानी बुशर्ट से ब्रांडेड शर्ट और यहां तक कि चप्पलों से जूतों तक का बदलाव उनके मतदाताओं को एक निजी अपमान की तरह लगा. कौशांबी के एक मामूली फ्लैट से सभी सुख-सुविधाओं वाले एक आलीशान मुख्यमंत्री आवास में जाने की तो बात ही छोड़िए, जिसे आमतौर पर भ्रष्ट राजनेताओं से जोड़कर देखा जाता है. इसके ऊपर, अस्तित्व बचाने के लिए अंततः कांग्रेस जैसी पार्टियों से हाथ मिलाना जिन्हें 'आप' ने खुद दुश्मन घोषित किया था. इन सबने हताशा के उस तूफान को हवा दी, जिसने उसी पार्टी को सत्ता से बेदखल करने की स्थिति में ला दिया जिसे उसने खुद खड़ा किया था. विजय के लिए अभी ऐसा कोई जोखिम नहीं है, लेकिन उनके लिए संदेश स्पष्ट है.

विजय केवल राजनीति में प्रवेश नहीं कर रहे हैं, बल्कि वह लोगों के जमा हुए गुस्से और हताशा के बीच कदम रख रहे हैं.और हताशा अस्थिर होती है. यह आपको जितनी जल्दी शिखर पर पहुंचा सकती है, उतनी ही तेजी से अकेला भी छोड़ सकती है.

(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं)

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