विजय राजभवन से लौटे... महाराष्ट्र से दिल्ली तक वो मौके जब बिना बहुमत वाली पार्टियों की बनी सरकार

तमिलनाडु चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी टीवीके के प्रमुख विजय ने राज्यपाल से मुलाकात कर सरकार बनाने का दावा पेश किया था. राज्यपाल ने बहुमत नहीं होने का हवाला देते हुए विजय को वापस भेज दिया था.

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विजय बने तमिलनाडु की सियासत के नए केंद्र (Photo: PTI) विजय बने तमिलनाडु की सियासत के नए केंद्र (Photo: PTI)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 07 मई 2026,
  • अपडेटेड 7:44 AM IST

तमिलनाडु के हालिया चुनाव नतीजों में अभिनेता से राजनेता बने विजय की अगुवाई वाली टीवीके सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है. टीवीके को 108 सीटों पर जीत मिली है. चुनाव नतीजे आने के एक दिन बाद ही टीवीके के विधायक दल की बैठक हुई और पार्टी के प्रमुख विजय को विधायक दल का नेता भी चुन लिया गया. बहुमत के आंकड़े से 10 कदम पीछे रह गई टीवीके को कांग्रेस का साथ भी मिल गया, लेकिन नंबर फिर भी जादुई आंकड़े तक नहीं पहुंच सका. विजय ने राज्यपाल से मुलाकात की और सरकार बनाने का दावा भी पेश किया, लेकिन बहुमत से कम आंकड़ा देख राज्यपाल ने उन्हें वापस भेज दिया.

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तमिलनाडु में नई सरकार का गठन किस तरह से होगा, कौन सरकार बनाएगा, इन सबको लेकर बहस छिड़ी हुई है. इस बीच बात उन मौकों की भी हो रही है, जब अलग-अलग राज्यों में चुनाव नतीजों में बहुमत नहीं होने के बावजूद राज्यपाल ने सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का न्योता दिया. सबसे ताजा उदाहरण महाराष्ट्र का है, जहां बहुमत नहीं होने के बावजूद राज्यपाल ने सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का न्योता दिया, मौका दिया. इस लिस्ट में कर्नाटक से लेकर गोवा, मणिपुर के साथ ही केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली तक के नाम शामिल हैं.    

महाराष्ट्र में सबसे बड़े दल की बनी थी सरकार

महाराष्ट्र में साल 2019 के चुनाव नतीजे आने के बाद सीएम की कुर्सी को लेकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और शिवसेना में ठन गई थी. चुनाव बाद उद्धव सीएम पद के लिए अड़ गए थे और दोनों दलों का गठबंधन टूट गया था. बीजेपी 105 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी. महाराष्ट्र के तत्कालीन राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने तब सुबह-सुबह ही बीजेपी के देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री और एनसीपी के अजित पवार को डिप्टी सीएम की शपथ दिला दी थी. हालांकि, यह सरकार 80 घंटे भी नहीं चल सकी और विश्वास मत हासिल करने से पहले ही देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था.

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कर्नाटक में येदियुरप्पा को मिला था सरकार बनाने का न्योता

कर्नाटक में साल 2018 के चुनाव नतीजों में बीजेपी 104 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, लेकिन बहुमत के लिए जरूरी जादुई आंकड़े से आठ सीट पीछे रह गई थी. सूबे के तत्कालीन राज्यपाल वजूभाई वाला ने तब बहुमत से दूर होने के बावजूद सबसे दल के नाते बीजेपी के बीएस येदियुरप्पा को सरकार बनाने का न्योता दिया था. येदियुरप्पा ने सरकार बनाई भी, लेकिन विधानसभा में बहुमत साबित नहीं कर सके. यह सरकार तीन दिन में ही गिर गई थी. तब कांग्रेस 78 सीटों के साथ दूसरे और जेडीएस 37 सीटें जीतकर तीसरे नंबर पर रही थी. कांग्रेस के समर्थन से बाद में कुमार स्वामी ने सरकार बनाई थी.

गोवा में छोटी पार्टी को मिला था सरकार बनाने का न्योता

गोवा के साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 17 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी. कांग्रेस बहुमत के आंकड़े से चार सीट पीछे रह गई थी. तब बीजेपी 13 सीटें जीतकर दूसरे नंबर की पार्टी थी. सूबे के तत्कालीन राज्यपाल ने तब दूसरे नंबर की पार्टी होने के बावजूद बीजेपी को सरकार बनाने का न्योता दिया था. बीजेपी ने मनोहर पर्रिकर की अगुवाई में सरकार बनाई भी. तब बीजेपी ने गोवा फॉरवर्ड पार्टी, एमजीपी, एनसीपी के साथ ही निर्दलीयों का भी समर्थन लिया था.

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मणिपुर में भी दूसरे नंबर की पार्टी को मिला था सरकार बनाने का मौका

साल 2017 के मणिपुर चुनाव में कांग्रेस 28 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. कांग्रेस बहुमत के लिए जरूरी 31 सीट के जादुई आंकड़े से तीन पीछे रह गई थी और राज्यपाल ने सरकार बनाने के लिए दूसरे नंबर की पार्टी बीजेपी को आमंत्रित किया था. बीजेपी ने तब 21 सीटें जीती थीं, जो बहुमत के आंकड़े से 10 कम थीं. बीजेपी ने तब एनपीपी, एनपीएफ, एलजेपी और अन्य छोटी-छोटी पार्टियों से गठबंधन कर एन बीरेन सिंह की अगुवाई में सरकार बना ली थी. 

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दिल्ली में भी 2013 नतीजों के बाद कुछ ऐसा ही हुआ था

केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली में साल 2013 के चुनाव नतीजों के बाद कुछ ऐसा ही हुआ था. तब बीजेपी 31 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी. पार्टी ने सरकार बनाने से इनकार कर दिया था. इसके बाद उपराज्यपाल ने दूसरे सबसे बड़े दल आम आदमी पार्टी को सरकार बनाने का न्योता दिया था. आम आदमी पार्टी ने तब कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई थी. अरविंद केजरीवाल तब पहली बार मुख्यमंत्री बने थे. हालांकि, यह सरकार 49 दिन ही चल सकी थी और जन लोकपाल बिल पेश नहीं होने को आधार बनाते हुए अरविंद केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था.

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