थलपति विजय का पॉलिटिकल डेब्यू तो सुपरहिट हो गया. बेशक यह उपलब्धि हासिल करना भी बहुत बड़ा चैलेंज था, लेकिन आगे की चुनौती और भी ज्यादा लगती है. टॉप पहुंचने से भी कहीं ज्यादा मुश्किल होता है, पोजीशन को बनाए रखना. विजय के सामने अब सरकार बनाने, और उसे चलाने की चुनौती है, साथ ही अपने विधायकों को एकजुट रखने की भी.
यह ठीक है कि तमिलगा वेत्री कज़गम (TVK) के जरिए विजय तमिलनाडु में MGR की 1977 जैसी कामयाबी नहीं हासिल कर पाए हैं, और अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं हैं - लेकिन, 2013 के दिल्ली चुनाव में अरविंद केजरीवाल जैसी सफलता मिली थी, वैसा तो मान ही सकते हैं.
2013 में अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को हराया, और कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया था. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन भी टीवीके उम्मीदवार से हार गए हैं, और डीएमके सत्ता की दौड़ से बाहर हो गई है.
अरविंद केजरीवाल ने पहले चुनाव में कांग्रेस को हराने के बाद उसी पार्टी के समर्थन से गठबंधन की सरकार बनाई थी. तमिलनाडु में टीवीके के डीएमके से सपोर्ट लेने की बात तो अभी तक नहीं सुनी गई है, लेकिन कांग्रेस से नए सिरे से संवाद शुरू हो गया है. चुनाव से पहले भी कांग्रेस के स्थानीय नेताओं की तरफ से ऐसे प्रयास हुए थे.
आपको याद होगा, दिल्ली में गठबंधन की सरकार बनाने के बाद अरविंद केजरीवाल ने करीब डेढ़ महीने में ही इस्तीफा दे दिया था. विजय के सामने भी राजनीतिक परिस्थितियां करीब-करीब वैसी ही हैं. अब अगर विजय सोच समझकर और राजनीतिक रूप से परिपक्व फैसले लिए बगैर कदम आगे बढ़ाते हैं, तो अरविंद केजरीवाल की ही तरह मौजूदा सियासत के चक्रव्यूह में फंस सकते हैं.
चुनावी चमत्कार के बाद चुनौतियां बेशुमार
थलपति विजय को लेकर तमिलनाडु चुनाव में शुरुआती धारणा यही थी कि टीवीके हर हाल में डीएमके को डैमेज करने जा रही है. विजय ने डीएमके को तो सत्ता से बेदखल किया ही है, सत्ता में आने को बेताब AIADMK को भी बहुमत के करीब नहीं फटकने दिया है.
जाहिर है, सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते लोक भवन से सरकार बनाने का बुलावा तो विजय की पार्टी टीवीके को ही मिलेगा. टीवीके को तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में 108 सीटें मिली हैं. 234 सीटों वाली तमिलनाडु विधानसभा में बहुमत का नंबर 118 है, और विजय के पास 10 सीटें कम पड़ रही हैं. मुसीबत वहीं से शुरू हो रही है.
विजय जिस त्रिकोणीय मुकाबले में कूद पड़े थे, उसमें एक छोर पर डीएमके के नेतृत्व वाला गठबंधन था, जिसमें कांग्रेस भी शामिल है. और, दूसरी तरफ केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी के साथ बना AIADMK गठबंधन. कुछ छोटी छोटी पार्टियां भी हैं, जिनसे बातचीत की कोशिश हो तो विजय को सफलता मिल सकती है.
MGR अगर विजय के लिए प्रेरणास्रोत हैं, तो अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी का संघर्ष विजय के लिए सबसे सही सबक साबित हो सकते हैं. अरविंद केजरीवाल ने बरसों बाद देश में सबसे बड़ा आंदोलन खड़ा किया था. जैसे अरविंद केजरीवाल ने आंदोलन के लिए प्लानिंग की थी, विजय के पिता एस ए चंद्रशेखर ने भी वैसी ही शिद्दत से कामयाबी का नुस्खा तैयार किया था.
अरविंद केजरीवाल के मुकाबले थलपति विजय की चुनौती कुछ ज्यादा लगती है. पहली सरकार अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस के बाहरी सपोर्ट से बनाई थी, लेकिन दूसरी और तीसरी बार तो सपोर्ट के लायक कुछ छोड़ा ही नहीं था - विजय को अभी वैसा मौका नहीं मिला है, और चुनौती यही है.
1. जिस किसी भी राजनीतिक दल से 10 सीटों के लिए विजय समर्थन लेंगे, वहीं से नैरेटिव बनेगा. और, कोई कुछ देगा तो बदले में कुछ बड़ा चाहेगा भी. एक्सचेंज ऑफर में तो ऐसा ही होता है. बाकी फील्ड में भी, राजनीति में भी.
2. एडमिनिस्ट्रेशन चलाना थलपति विजय के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी. कौन कौन मंत्री बनेगा? गठबंधन साथियों के साथ विभागों का बंटवारा कैसे होगा? विजय की अपनी प्रशासनिक योग्यता अभी टेस्टेड नहीं है. जैसे विजय अभी तक एक्टिंग करते रहे, और उनके पिता निर्देशक की भूमिका में थे - आगे की रणनीति कैसी होगी, देखना बाकी है.
3. अरविंद केजरीवाल को तो दिल्ली में सिर्फ 6 मंत्री बनाने होते थे, तमिलनाडु में तो 12-35 मंत्री चाहिए होंगे. 234 सीटों वाली विधानसभा में कम से कम 12 मंत्री और ज्यादा से ज्यादा 15 फीसदी हो सकते हैं. एम के स्टालिन की सरकार में मंत्रियों की संख्या 34 थी.
गठबंधन सरकार ही बनेगी
टीवीके को चुनाव से पहले गठबंधन के प्रस्ताव काफी मिले थे. खबरों के मुताबिक, कई चैनलों से अलग अलग बातचीत हई थी. खुद विजय ने भी यह बात मानी भी थी, और किसी के भी साथ गठबंधन करने से साफ तौर पर मना भी कर दिया था.
अव्वल तो शशि थरूर की बातें कांग्रेस के प्रसंग में निजी बयान से ज्यादा मायने नहीं रखतीं, लेकिन विजय को लेकर उनकी सलाह उनके कुछ साथियों को अच्छी भी लग सकती है. खासकर तमिलनाडु के उन कांग्रेस नेताओं को जो चुनाव से पहले डीएमके की जगह विजय की टीवीके के साथ गठबंधन की पैरवी कर रहे थे. इंडियन एक्सप्रेस के साथ एक इंटरव्यू में शशि थरूर का कहना है, विजय को अब भी INDIA ब्लॉक में शामिल होने का न्योता मिल सकता है. टीवीके को बाहर नहीं रखा गया है.
थलपति विजय के पिता एस ए चंद्रशेखर ने भी कांग्रेस के साथ गठबंधन का प्रस्ताव रखा है. एस ए चंद्रशेखर ने कहा है, कांग्रेस ऐतिहासिक और परंपराओं वाली पार्टी रही है, लेकिन लगातार दूसरी पार्टियों को समर्थन देने के कारण उसकी ताकत कमजोर हुई है.
विजय के पिता कहते हैं, अब वक्त आ गया है जब कांग्रेस अपनी खोई हुई ताकत वापस हासिल करे. एस ए चंद्रशेखर का दावा है, सिर्फ वह खुद नहीं, बल्कि विजय खुद कांग्रेस को वह ताकत देने के लिए तैयार हैं, जिससे पार्टी अपनी पुरानी पहचान और मजबूती फिर से हासिल कर सके.
एस ए चंद्रशेखर ने कांग्रेस नेतृत्व से तमिलनाडु में टीवीके के साथ मिलकर आगे बढ़ने की अपील की है. कांग्रेस की मुश्किल यह है कि टीवीके के साथ आगे बढ़ने के लिए डीएमके के साथ गठबंधन तोड़ना होगा. लेकिन, राहुल गांधी अगर एम के स्टालिन से दोस्ती निभाते हुए टीवीके को भी इंडिया ब्लॉक में शामिल करने के लिए राजी कर लें, तो यह असंभव काम संभव भी हो सकता है.
डीएमके गठबंधन में चुनाव लड़कर कांग्रेस को तमिलनाडु विधानसभा में 5 सीटें मिली हैं. विजय की मुश्किल सिर्फ कांग्रेस के साथ गठबंधन से खत्म नहीं होने वाली है. कांग्रेस के 5 विधायकों के सपोर्ट के बाद भी विजय को 5 विधायकों की जरूरत होगी.
वैसे टीवीके के प्रति AIADMK नेतृत्व के भी सुर बदल गए हैं. AIADMK प्रवक्ता अप्सरा रेड्डी का कहना है, अगर मुख्य मकसद डीएमके को सत्ता से बाहर रखना है, तो AIADMK इस विचार के प्रति दिलचस्पी नहीं दिखाएगी, ऐसा नहीं है. अगर गठबंधन का कोई प्रस्ताव आता है, तो पार्टी उसे ठुकराएगी नहीं.
मृगांक शेखर