यूपी में प्रियंका का कमबैक! सपा से संतुलन और कांग्रेस का दबदबा बढ़ाने का प्लान

उत्तर प्रदेश में सपा प्रमुख अखिलेश यादव के आक्रामक तेवरों और 100 से ज्यादा सीटों की कांग्रेसी मांग के बीच प्रियंका गांधी वाड्रा ने एक बार फिर राज्य के चुनावी अभियान की कमान संभाल ली है. सीट शेयरिंग के पेंच को सुलझाने और पार्टी को सम्मानजनक हिस्सेदारी दिलाने के लिए प्रियंका गांधी ही अब सपा नेतृत्व के साथ बातचीत की अंतिम डोर संभालेंगी.

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यूपी में प्रियंका गांधी और अखिलेश यादव की केमिस्ट्री (Photo-ITG) यूपी में प्रियंका गांधी और अखिलेश यादव की केमिस्ट्री (Photo-ITG)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 05 नवंबर 2026,
  • अपडेटेड 12:45 PM IST

उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर देश के सबसे बड़े सूबे का सियासी तापमान तेजी से चढ़ने लगा है. दिल्ली में यूपी कांग्रेस के प्रमुख पदाधिकारियों संग प्रियंका गांधी वाड्रा की मैराथन बैठकों ने यह साफ कर दिया है कि कांग्रेस की यूपी चुनावी कमान की स्टेयरिंग एक बार फिर प्रियंका गांधी के हाथों में आ गई है. साल 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद प्रभारी पद से हटने वाली प्रियंका गांधी ने एक बार फिर 'कमबैक एंट्री' की है.

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प्रियंका गांधी ने यूपी की कमान संभालने के साथ ही बैठकों का दौर भी शुरू कर दिया है. यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम, प्रदेश अध्यक्ष आराधना मिश्रा, कार्यकारी अध्यक्ष इमरान मसूद समेत सभी 6 सह-प्रभारियों के साथ प्रियंका गांधी ने बैठक की. इस दौरान मिशन-2027 के लिए चार कमेटियों का गठन जल्द किए जाने का प्लान बना है.

अब सवाल उठता है कि चुनाव के इस आखिरी मोड़ पर प्रियंका गांधी की यूपी में वापसी के पीछे की असल वजहें क्या हैं? क्या सीट शेयरिंग पर छिड़ी तकरार, कांग्रेस नेताओं की 100 से ज्यादा सीटों की डिमांड और सपा के आक्रामक रुख तो इसकी वजह नहीं बने?

प्रियंका गांधी फैक्टर के यूपी में मायने

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस करीब साढ़े तीन दशक से भी ज्यादा समय से सत्ता से बाहर है और पार्टी अपनी वापसी के लिए हरसंभव कोशिश कर रही है. जब प्रियंका गांधी ने सक्रिय राजनीति में कदम रखा था, तब उन्हें यूपी की कमान सौंपी गई थी. सितंबर 2020 में उन्हें पूरे उत्तर प्रदेश का प्रभारी बना दिया गया था और वह दिसंबर 2023 तक इस भूमिका में रहीं. इस दौरान उन्होंने जमीनी स्तर पर कांग्रेस संगठन को फिर से खड़े करने की कवायद शुरू की थी.

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प्रियंका गांधी के प्रभारी रहते हुए कांग्रेस में जिले से लेकर ब्लॉक स्तर और बूथ कमेटियों का गठन किया गया था. इसका सकारात्मक नतीजा 2024 के लोकसभा चुनाव में देखने को मिला. हालांकि, उस समय प्रियंका गांधी की जगह पर अविनाश पांडेय यूपी के प्रभारी बन चुके थे, लेकिन वह सपा के साथ सीट शेयरिंग को लेकर आसानी से चीजें तय नहीं कर पा रहे थे.

साल 2024 के लोकसभा चुनावों में भी जब सपा-कांग्रेस की बात टूटती नजर आ रही थी, तब प्रियंका गांधी ने ही सीधे अखिलेश यादव से फोन पर संवाद कायम कर मतभेदों को सुलझाया था. प्रियंका गांधी ने अखिलेश यादव के साथ बातचीत कर सीट शेयरिंग को फाइनल किया था.

नतीजतन, कांग्रेस ने 17 सीटों पर चुनाव लड़ा और 6 सीटों पर जीत दर्ज की थी. इसके साथ ही कांग्रेस का वोट शेयर बढ़कर करीब 9.46 प्रतिशत तक पहुंच गया था. कांग्रेस ने रायबरेली और अमेठी ही नहीं, बल्कि इलाहाबाद, बाराबंकी, सीतापुर और सहारनपुर जैसी सीटें भी जीतने में सफलता हासिल की थी और कई अन्य सीटों पर वह मामूली वोटों से हारी थी.

अखिलेश के तेवर बनाम कांग्रेस की डिमांड

उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस का गठबंधन 2027 के चुनाव के लिए तय माना जा रहा है, लेकिन इस वक्त सबसे बड़ा पेंच दोनों दलों के बीच सीट बंटवारे को लेकर फंसा है. 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली सफलता के बाद से सपा प्रमुख अखिलेश यादव विधानसभा चुनावों में बेहद आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं. अखिलेश ने अपने कैडर को स्पष्ट संकेत दिए हैं कि समाजवादी पार्टी प्रदेश की मुख्य राजनीतिक ताकत है और पार्टी को लगभग 350 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए पूरी तरह तैयार रहना चाहिए.

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सपा के राष्ट्रीय महासचिव प्रोफेसर रामगोपाल यादव सीट शेयरिंग का फार्मूला साल 1993 के सपा-बसपा गठबंधन के तर्ज पर करने का संकेत दे रहे हैं. उनके लिहाज से 2022 के चुनाव में कांग्रेस यूपी की जिन विधानसभा सीटों पर जीती है और जिन सीटों पर दूसरे नंबर पर रही है, केवल उन्हीं पर उसे चुनाव लड़ना चाहिए. इस गणित के हिसाब से कांग्रेस को सिर्फ 6 विधानसभा सीटें मिल सकती हैं. अखिलेश यादव भी 2022 के चुनाव में कांग्रेस के प्रदर्शन की रिपोर्ट कांग्रेस नेतृत्व को सौंपकर अपनी सियासी ताकत का अहसास कराना चाहते हैं.

वहीं, यूपी कांग्रेस के नेता जिस तरह से सीटों की डिमांड कर रहे हैं, वह सपा को रास नहीं आ रहा है. कांग्रेस प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम और प्रदेश नेतृत्व ने सार्वजनिक रूप से बयानबाजी शुरू कर दी है कि पार्टी 175 से 200 सीटों की सूची सपा के सामने रखने की तैयारी कर रही है और कम से कम 125 सीटों का दावा ठोकेगी. आपको बता दें कि 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा ने कांग्रेस को 114 सीटें दी थीं और 2024 में कांग्रेस 17 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ी थी.

कांग्रेस 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली 6 सीटों और 38 विधानसभा सीटों पर मिली बढ़त को अपना मुख्य आधार बनाकर सम्मानजनक हिस्सेदारी पर अड़ी है. सपा के इन्हीं आक्रामक तेवरों के चलते कांग्रेस ने यूपी में प्रियंका गांधी को आगे किया है, ताकि वह सीट शेयरिंग पर अखिलेश यादव के साथ सीधे बातचीत कर मामला सुलझा सकें. कांग्रेस प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने भी कहा है कि सीट शेयरिंग पर प्रियंका गांधी ही सपा नेतृत्व के साथ बातचीत करेंगी.

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प्रियंका गांधी की कांग्रेस को क्यों पड़ी जरूरत

अखिलेश यादव के सख्त रुख और कांग्रेस नेताओं की ऊंची मांगों के बीच बातचीत के पटरी से उतरने का खतरा लगातार बना हुआ है. ऐसे में प्रियंका गांधी को आगे लाने के पीछे असल मकसद सपा के साथ सीट शेयरिंग को अमलीजामा पहनाने का है. यूपी कांग्रेस में रणनीति, गठबंधन, सीट चयन और चुनावी अभियान के बड़े फैसलों में प्रियंका की भूमिका पहले से कहीं ज्यादा अहम रहने वाली है.

राज्य के स्थानीय नेताओं के बजाय अखिलेश यादव केवल कांग्रेस के शीर्ष राष्ट्रीय नेतृत्व यानी राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से ही समझौते पर अंतिम बातचीत करने में सहज महसूस करते हैं. प्रियंका गांधी की सीधी एंट्री से बातचीत के बेपटरी होने के बजाय एक सम्मानजनक समझौते के मुकाम तक पहुंचने की पूरी उम्मीद है.

प्रियंका गांधी पार्टी नेताओं की 125 से 175 सीटें मांगने की बयानबाजी के बीच एक व्यावहारिक रणनीति अपना सकती हैं. प्रियंका यूपी में सीटों की केवल संख्या पर अड़ने के बजाय 'विनेबिलिटी' (जीतने की क्षमता) पर पूरा फोकस कर सकती हैं.

कांग्रेस ने सीटों की 3 कैटेगरी बनाई हैं, 'A कैटेगरी' (मजबूत पकड़ वाली सीटें), 'B कैटेगरी' (संभावित सीटें) और 'C कैटेगरी'. प्रियंका की कोशिश यही होगी कि सपा के साथ बातचीत में संख्या पर बेवजह खींचतान करने के बजाय उन सीटों पर जोर दिया जाए, जहां कांग्रेस का उम्मीदवार वास्तव में सपा-कांग्रेस गठबंधन को जीत दिला सके.

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प्रियंका गांधी की एंट्री से कांग्रेस में बूस्टर

उत्तर प्रदेश की चुनावी बिसात पर प्रियंका गांधी की वापसी से यह तय हो गया है कि 2027 का मुकाबला केवल 'भाजपा बनाम सपा' तक सीमित नहीं रहेगा. अखिलेश यादव के आक्रामक राजनीतिक तेवरों के बीच अपनी पार्टी का वजूद और सम्मानजनक सीटें बचाए रखने के लिए प्रियंका गांधी कांग्रेस की सबसे बड़ी ढाल और रणनीतिकार साबित होंगी.

इससे पहले प्रियंका गांधी ने यूपी प्रभारी रहते हुए हाथरस कांड, लखीमपुर खीरी हिंसा और सोनभद्र हिंसा जैसे मामलों में सीधे हस्तक्षेप कर कांग्रेस को सड़क पर संघर्ष करने वाली पार्टी के रूप में पेश किया था. उन्होंने युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने और महिला भागीदारी को राजनीति के बड़े विमर्श का हिस्सा बनाने की भी पुरजोर कोशिश की थी. अब देखना दिलचस्प होगा कि प्रियंका गांधी की इस सीधी एंट्री के बाद सपा और कांग्रेस कितनी जल्दी और किस फॉर्मूले पर अपनी सहमति की आधिकारिक मुहर लगाते हैं.

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