बीजेपी ने शनिवार रात 98 जिलों के जिला प्रभारियों का ऐलान किया. 2027 विधानसभा चुनाव से पहले इसे संगठन के लिहाज से अहम फैसला माना जा रहा है. नई लिस्ट में संगठन के पुराने और अनुभवी चेहरों की वापसी हुई है. हालांकि, जातीय प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं.
बीजेपी ने जिला प्रभारी बनाने में जातीय समीकरण के बजाय संगठन के अनुभव और कामकाज को प्राथमिकता दी है. इस लिस्ट में ऐसे कई नेता शामिल हैं, जो लंबे समय तक संगठन में अहम जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं.
2014 से 2024 के बीच संगठन में सक्रिय रहे कई नेताओं को जिला प्रभारी बनाया गया है. इनमें प्रदेश मंत्री, महामंत्री और सचिव रह चुके चेहरे शामिल हैं. अलग-अलग मोर्चों और दूसरे संगठनों में अहम जिम्मेदारी संभाल चुके नेताओं को भी जगह मिली है.
अनूप गुप्ता, कमलेश मिश्रा, संतोष सिंह, चंद्र मोहन, अशोक कटारिया, विजय बहादुर पाठक, सत्येंद्र सिसोदिया, मानवेंद्र सिंह, कौशलेंद्र पटेल, त्रयंबक त्रिपाठी, धर्मेंद्र सिंह और प्रांशु दत्त द्विवेदी जैसे नेताओं को जिला प्रभारी बनाया गया है.
इनमें कई चेहरों को संगठन में सुनील बंसल की टीम का हिस्सा माना जाता रहा है. अब पार्टी ने इन पुराने नेताओं के अनुभव का इस्तेमाल जिला स्तर पर करने का फैसला किया है. जिला प्रभारियों की सूची में 9 एमएलसी भी शामिल हैं.
98 जिला प्रभारियों में सिर्फ 4 महिलाएं
जातीय आंकड़ों पर नजर डालें तो 98 जिला प्रभारियों में 29 ब्राह्मण हैं. यानी करीब एक तिहाई पद ब्राह्मण नेताओं को मिले हैं. इसके बाद ओबीसी वर्ग से 25 जिला प्रभारी बनाए गए हैं. ठाकुर समाज से 18 जिला प्रभारी हैं.
बनिया समाज को 13 जिलों की जिम्मेदारी मिली है. वहीं दलित समाज से सिर्फ 5 जिला प्रभारी बनाए गए हैं. महिलाओं की संख्या इससे भी कम है. 98 जिला प्रभारियों में सिर्फ 4 महिलाएं हैं.
ऐसे में सूची में एक तरफ ब्राह्मणों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश दिख रही है. वहीं दलित और महिला प्रतिनिधित्व कम है. इसी वजह से बीजेपी के जिला प्रभारियों की सूची में जातीय संतुलन को लेकर चर्चा हो रही है.
जिला प्रभारी संगठन में अहम जिम्मेदारी संभालते हैं. वह जिला अध्यक्ष के ऊपर संगठन के कामकाज पर नजर रखते हैं. जिले में होने वाली सांगठनिक गतिविधियों की निगरानी भी उनकी जिम्मेदारी होती है.
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बीजेपी के सामने 2027 चुनाव को लेकर कई चुनौतियां हैं. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन की चर्चा है. अखिलेश यादव के PDA की भी चर्चा हो रही है. वहीं बीजेपी के विधायकों और जनप्रतिनिधियों को लेकर नाराजगी की बात भी सामने आ रही है.
पुराने नेताओं पर फिर संगठन ने जताया भरोसा
ऐसे माहौल में बीजेपी ने संगठन के पुराने चेहरों को फिर से जिम्मेदारी दी है. लंबे समय से संगठन में काम कर चुके कई नेता हाल के समय में संगठन से बाहर हो गए थे. अब उन्हें जिला प्रभारी बनाकर फिर से सक्रिय किया गया है.
इससे इन नेताओं के अनुभव का इस्तेमाल भी होगा. साथ ही संगठन के अंदर किसी तरह की नाराजगी न पनपे, इसका भी ख्याल रखा गया है. बीजेपी की लगातार जीत में इन पुराने संगठनकर्ताओं की भूमिका अहम रही है.
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कुल मिलाकर जिला प्रभारी की इस सूची में बीजेपी ने संगठन के अनुभव को तरजीह दी है. हालांकि, जातीय संतुलन और महिला-दलित प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल जरूर खड़े हो रहे हैं. 2027 के चुनाव से पहले जिला स्तर पर इन पुराने चेहरों की सक्रियता बीजेपी के संगठन को कितना मजबूत करती है, यह आगे देखने वाली बात होगी.
कुमार अभिषेक