आल्हा-ऊदल की वीरभूमि में 2027 की जंग: महोबा और चरखारी विधानसभा सीट का सियासी गणित

उत्तर प्रदेश का ऐतिहासिक महोबा जिला प्राचीन चंदेल राजवंश की वीरगाथाओं और पान की खेती के लिए प्रसिद्ध है. सियासत की बात करें तो जिले की दोनों विधानसभा सीटों- महोबा और चरखारी- पर बीजेपी का कब्जा है. लोध, दलित और सवर्ण मतदाताओं के भरोसे बीजेपी 2027 में हैट्रिक की तैयारी में है, वहीं सपा-बसपा एंटी-इंकंबेंसी और स्थानीय मुद्दों के दम पर चुनौती देने में जुटी हैं.

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महोबा-चरखारी विधानसभा सीट की प्रोफाइल (Photo- ITG) महोबा-चरखारी विधानसभा सीट की प्रोफाइल (Photo- ITG)

aajtak.in

  • महोबा ,
  • 26 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 5:56 PM IST

यूपी के बुंदेलखंड क्षेत्र में स्थित महोबा जिला प्राचीन चंदेल राजवंश की सैन्य राजधानी और 'आल्हा-उदल की नगरी' के रूप में वर्ल्ड फेमस है. यहां 9वीं शताब्दी का ग्रेनाइट सूर्य मंदिर, गोखर पर्वत (जिसे गोरखगिरि पर्वत भी कहा जाता है) और जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं हैं, जिन्हें दूर-दराज से लोग देखने आते हैं. गोखर पर्वत को लेकर मान्यता है कि वनवास के दौरान भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी यहां रुके थे. बात अगर खेती-किसानी की जाए तो यह क्षेत्र मगही और बांग्ला पान की खेती के लिए ऐतिहासिक रूप से जाना जाता है. वहीं, पारंपरिक रूप से गेहूं, चना, मटर, सरसों और अलसी की खेती की जाती है. 

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बात सियासत की-  

जिले में दो विधानसभा सीटें आती हैं. एक- महोबा और दूसरी- चरखारी. दोनों ही सीटों पर बीजेपी का कब्जा है. 2022 में महोबा से बीजेपी के राकेश कुमार गोस्वामी ने जीत हासिल की थी. उन्हें 94490 वोट (45.94%) मिले थे. वहीं, सपा के मनोज तिवारी 51043 वोट (24.82%) ही हासिल कर पाए थे. तीसरे नंबर पर बसपा के संजय कुमार साहू रहे, जिन्हें 38296 वोट मिले. 

महोबा विधानसभा सीट का समीकरण- 

जातीय समीकरण की बात करें तो महोबा विधानसभा सीट पर ब्राह्मण, कुशवाहा, दलित, मुस्लिम और वैश्य/साहू वोटर्स की अच्छी-खासी संख्या है. 2017 और 2022 दोनों चुनावों में यहां से बीजेपी के राकेश कुमार गोस्वामी ने बड़ी जीत दर्ज की है. इससे पहले 2012 में बसपा और 2002/1996 में सपा का दबदबा रहा था. 

2027 के चुनाव में बीजेपी महोबा में हैट्रिक के इरादे से उतरेगी. पार्टी इस मजबूत किले को बचाए रखने के लिए पूरी ताकत झोंकेगी. उधर, सपा और बसपा अपने पारंपरिक वोट बैंक के साथ-साथ एंटी-इंकंबेंसी का लाभ उठाने के लिए नए सामाजिक और जातीय समीकरण साधने की कोशिश करेंगे.

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हाई-प्रोफाइल चरखारी सीट- 

इस हाई-प्रोफाइल चरखारी विधानसभा सीट पर 2022 में बीजेपी के बृजभूषण राजपूत जीते थे. बृजभूषण ने 1,02,051 वोट (46.21%) हासिल किए थे, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी सपा के रामजीवन को 60,170 वोट (27.25%) मिले. तीसरे स्थान पर बसपा के विनोद कुमार रहे, जो सिर्फ 41,087 वोट (18.61%) हासिल कर पाए. 2017 के चुनाव में भी बृजभूषण राजपूत ने बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी. बृजभूषण के पिता गंगाचरण राजपूत सांसद रहे हैं. वे बुंदेलखंड और उत्तर प्रदेश की राजनीति का बड़ा चेहरा हैं. 

गौरतलब है कि 2012 के चुनाव में मध्य प्रदेश की पूर्व सीएम और वरिष्ठ बीजेपी नेत्री उमा भारती ने इस सीट से चुनाव लड़कर बड़ी जीत हासिल की थी, जिससे यह सीट नेशनल लेवल पर सुर्खियों में आई. वर्तमान में इस सीट पर बृजभूषण परिवार का दबदबा है. 

इस सीट पर लोध (राजपूत) मतदाता निर्णायक भूमिका निभाता है.  लोध बिरादरी के यहां लगभग 65 से 70 हजार मतदाता हैं. यही वोट बैंक बीजेपी के बृजभूषण राजपूत की जीत का मुख्य आधार रहा है. चरखारी में दलित (SC) मतदाता लगभग 40 से 45 हजार है. कुशवाहा/मौर्य लगभग 30 हजार है. ब्राह्मण एवं अन्य सवर्ण करीब  25 हजार और यादव व मुस्लिम लगभग 35 हजार मतदाता हैं. 2012 से पहले तक चरखारी में मुख्य मुकाबला बसपा और सपा के आरक्षित वर्ग के प्रत्याशियों के बीच रहता था. सामान्य होने के बाद यहां लोध (राजपूत) समाज का वर्चस्व स्थापित हो गया. 

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BJP की मजबूती: लगातार 2017 और 2022 में मिली बड़ी जीत से यह सीट बीजेपी का मजबूत किला बन चुकी है. पार्टी लोध-सवर्ण और अति-पिछड़ा वर्ग (MBC) के मजबूत सामाजिक गठबंधन के भरोसे अपनी हैट्रिक पर नजर रखेगी.

सपा की चुनौती: सपा अपने PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को धार देकर बीजेपी के मजबूत लोध वोट बैंक के एकाधिकार में सेंध लगाने की रणनीति बनाएगी.

बसपा की भूमिका: बसपा का दलित वोट बैंक (2022 में 41,000+ वोट) स्थिर है. दमदार प्रत्याशी उतारने पर मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है.

मुख्य स्थानीय मुद्दे- 

जल संकट व सिंचाई: बुंदेलखंड क्षेत्र के कारण किसानों के लिए सिंचाई और शुद्ध पेयजल की आपूर्ति प्राथमिक मुद्दा है.

रोजगार व पलायन: चरखारी की झीलों और ऐतिहासिक विरासतों का पर्यटन विकास कर युवाओं का पलायन रोकना.

अन्ना प्रथा: ग्रामीण इलाकों में छुट्टा जानवर किसानों के लिए एक प्रमुख चुनावी समस्या है.

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