पंजाब में बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल के बीच गठबंधन पर सस्पेंस, कहां अटक रही बात

पंजाब में बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल के बीच आगामी चुनाव को लेकर गठबंधन की चर्चाएं जोरों पर हैं, लेकिन सीटों के बंटवारे और मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर अभी तक कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है.

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आगामी चुनाव को लेकर गठबंधन की चर्चाएं तेज हैं आगामी चुनाव को लेकर गठबंधन की चर्चाएं तेज हैं

हिमांशु मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 09 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 4:33 PM IST

पंजाब में बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल के बीच गठबंधन की चर्चाएं तेज हैं, लेकिन गठबंधन के ऐलान पर अभी भी सस्पेंस बना हुआ है. बीजेपी भले ही सार्वजनिक तौर पर सभी 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की बात कह रही हो, लेकिन पार्टी के भीतर गठबंधन की संभावनाओं पर गंभीर मंथन चल रहा है.

सूत्रों के मुताबिक बीजेपी के आंतरिक सर्वे में दावा किया गया है कि अगर बीजेपी और अकाली दल साथ मिलकर चुनाव लड़ते हैं तो दोनों 117 में से 80 से ज्यादा सीटें जीत सकते हैं. हालाँकि गठबंधन में हो रही देरी के पीछे सीटों की संख्या , सीटों के बंटवारे और मुख्यमंत्री का चेहरा है. बीजेपी और अकाली दल में गठबंधन की चर्चा अमित शाह की जालंधर की नशा मुक्त पंजाब रैली के बाद भी तेज हो गई है. क्योंकि रैली में अमित शाह ने ना तो 117 सीटों पर अकेले लड़ने की बात की और ना ही अकाली दल पर हमला किया .

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बीजेपी भले ही आधिकारिक तौर पर सभी 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की बात कह रही हो, लेकिन पार्टी के भीतर इस बयान को अधिकतम सीटों पर दावेदारी बनाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है. बीजेपी के कुछ बड़े नेताओं का मानना है कि अब अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी के लिए पर्याप्त समय नहीं बचा है. ऐसे में अकाली दल और कुछ छोटे दलों के साथ गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ना ज्यादा बेहतर विकल्प हो सकता है. बीजेपी नेताओं का मानना है कि अलग-अलग चुनाव लड़ने से आम आदमी पार्टी और कांग्रेस को फायदा हो सकता है.

बीजेपी नेताओं के मुताबिक पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों के नतीजे बताते हैं कि दोनों दल अपने-अपने क्षेत्रों में मजबूत आधार रखते हैं. ऐसे में साथ में चुनाव लड़ने पर दोनों की चुनावी ताकत बढ़ सकती है. बीजेपी नेताओं के इस आकलन के पीछे वोटों का गणित है. 2024 के लोकसभा चुनाव में अकाली दल को करीब 18 लाख यानी 13.42 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि बीजेपी को करीब 25 लाख यानी 18.56 प्रतिशत वोट हासिल हुए थे. दोनों के वोट जोड़ें तो यह आंकड़ा करीब 43 लाख तक पहुंचता है.

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वहीं 2022 के विधानसभा चुनाव में अकाली दल को 28.61 लाख यानी 18.38 प्रतिशत वोट मिले थे. इसमें उसके गठबंधन सहयोगी बीएसपी के वोट शामिल नहीं हैं. दूसरी ओर बीजेपी और उसके सहयोगी दलों को करीब 12 लाख यानी 8 प्रतिशत वोट मिले थे. इस तरह बीजेपी नेताओं के मुताबिक दोनों दलों का संयुक्त वोट आधार करीब 40 से 43 लाख के आसपास रहा है.बीजेपी इस वोट बैंक की तुलना आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के प्रदर्शन से भी कर रही है.

2022 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 65.38 लाख वोट यानी करीब 42 प्रतिशत वोट हासिल कर 92 सीटों पर जीत दर्ज की थी. कांग्रेस को 35.76 लाख यानी 22.98 प्रतिशत वोट मिले थे, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी का वोट घटकर 35.43 लाख यानी 26.30 प्रतिशत रह गया. कांग्रेस को 35.06 लाख यानी 26.02 प्रतिशत वोट मिले.

सूत्रो की मानें तो बीजेपी रणनीतिकारों का मानना है कि बदले हुए वोट प्रतिशत और त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति में बीजेपी-अकाली गठबंधन आम आदमी पार्टी और कांग्रेस को चुनौती दे सकता है. बीजेपी और अकाली गठबंधन की राह में अभी तीन बड़े पेंच हैं. 

पहला ये कि कितनी सीटों पर कौन सा दल चुनाव लड़ेगा.
दूसरा पेंच कि किन-किन सीटों को किस पार्टी के हिस्से में रखा जाएगा. 
तीसरा और सबसे अहम पेंच ये कि गठबंधन की ओर से मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री पद का चेहरा कौन होगा.

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सूत्रों के मुताबिक बीजेपी इस बार गठबंधन में 45 से कम सीटों पर चुनाव लड़ने के पक्ष में नहीं है. गौरतलब है कि 1996 से 2020 तक चले गठबंधन में बीजेपी जूनियर पार्टनर रही और विधानसभा चुनावों में 117 में से 23 सीटों पर चुनाव लड़ती रही. लेकिन इस बार गठबंधन में बीजेपी 2024 के लोकसभा चुनाव में अपने प्रदर्शन के आधार पर ज्यादा सीटों की मांग कर रही है.

बीजेपी की ज्यादा सीटों की मांग के पीछे आंकड़े हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 18.56 प्रतिशत वोट मिले थे और वह 23 विधानसभा क्षेत्रों में पहले नंबर पर रही थी. छह सीटों पर दूसरे और 16 सीटों पर तीसरे स्थान पर रही. इस तरह 45 विधानसभा सीटों पर बीजेपी अकाली दल से आगे रही. वहीं अकाली दल को 13.42 प्रतिशत वोट मिले और वह एक लोकसभा सीट जीतने में सफल रहा. विधानसभा क्षेत्रों के लिहाज से अकाली दल नौ सीटों पर पहले, पांच पर दूसरे और पांच पर तीसरे स्थान पर रहा.

दोनों दलों को मिलाकर करीब 32 प्रतिशत वोट मिले और 64 विधानसभा क्षेत्रों में उनकी मौजूदगी दर्ज हुई.

बीजेपी के रणनीतिकारों का आकलन है कि अगर दोनों दल लोकसभा चुनाव साथ लड़ते तो 57 विधानसभा सीटों पर बढ़त हासिल कर सकते थे. यानी बहुमत के आंकड़े से महज दो सीटें पीछे. बीजेपी रणनीतिकारों का ये मानना है कि गठबंधन बनने की स्थिति में दोनों दलों को अतिरिक्त फ्लोटिंग वोट भी मिल सकते हैं.

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गठबंधन में दोनों ही पार्टियों को सीटों की पहचान भी एक बड़ी चुनौती है. अब तक बीजेपी मुख्य रूप से शहरी सीटों पर और अकाली दल ग्रामीण क्षेत्रों में चुनाव लड़ता रहा है. लेकिन इस बार अकाली दल सेमी-अर्बन सीटों पर भी दावेदारी कर रहा है, जहां बीजेपी का अपना मजबूत आधार माना जाता है. ऐसे में दोनों दलों को सीटों के बंटवारे के साथ-साथ स्थानीय संगठन और उम्मीदवारों की स्थिति को भी देखना है.

वहीं मुख्यमंत्री पद के चेहरे को लेकर भी दोनों दलों के बीच सहमति बनना बाकी है. अकाली दल की ओर से पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाए जाने की मांग हो सकती है. हालांकि बीजेपी के कुछ नेताओं को उनकी छवि को लेकर आपत्ति है. फिलहाल बीजेपी और अकाली दल की गठबंधन की घोषणा, सीटों के बंटवारे और मुख्यमंत्री के चेहरे पर बातचीत जारी है.

गठबंधन की घोषणा में देरी को लेकर बीजेपी के कुछ नेताओं का मानना है कि अब और इंतजार नहीं करना चाहिए. उनका तर्क है कि समय रहते गठबंधन का ऐलान होने से कार्यकर्ताओं को चुनावी तैयारी के लिए तैयार किया जा सकेगा. साथ ही सीटों के बंटवारे के बाद दोनों दल अपने-अपने हिस्से की सीटों पर संगठन और चुनावी रणनीति को धार दे सकेंगे.

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