झारखंड में अलग-अलग भर्ती परीक्षाओं में धांधली का आरोप लगाते हुए हजारों छात्रों ने विधानसभा का घेराव किया. लेकिन जैसे ही छात्र विधानसभा के पास पहुंचे उनपर प्रशासन ने वाटर कैनन चलाया. लेकिन इन दौरान वहां से जो तस्वीरें सामने आई है, वह हैरान कर देने वाली थी. छात्र वहां से भागे नहीं बल्कि डांस करने लगे. इस घटना के बाद से लोगों के मन में एक सवाल तो जरूर उठा होगा कि आखिर इसका आइडिया आया कहा से है? पहली बार इसकी शुरुआत कब हुई और पहली बार इसका इस्तेमाल कब हुआ था? प्रदर्शनों और आंदोलनों के दौरान भीड़ को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षा बलों द्वारा वाटर कैनन (पानी की बौछार) का इस्तेमाल एक आम तरीका है. कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए गैर-घातक हथियार के रूप में इस्तेमाल होने वाली इस तकनीक का अपना एक दिलचस्प इतिहास है.
कब हुआ था वाटर कैनन का आविष्कार?
रांची में छात्रों के ऊपर इस्तेमाल किया जाने वाला वाटर कैनन मूल रूप से अग्निशमन विभाग की वाटर होज और पंपिंग प्रणाली से आया है. 19वीं सदी के आखिर में आग बुझाने के लिए तेज दबाव से पानी छोड़ने वाली पानी की तोपें को विकसित किया गया था. हालांकि, 1930 के दशक की शुरुआत में जर्मनी में पुलिस और इंजीनियरों ने इसी तकनीक को वाहन पर लगाकर भीड़ नियंत्रण के लिए इस्तेमाल करना शुरू किया. इस तरह अग्निशमन में इस्तेमाल होने वाली तकनीक धीरे-धीरे पुलिस के भीड़ नियंत्रण वाले हथियार में बदल गई.
दुनिया में पहला इस्तेमाल
दंगों और प्रदर्शनों को रोकने के लिए दुनिया में पहली बार ट्रक-माउंटेड वाटर कैनन का इस्तेमाल 1930 के दशक की शुरुआत में जर्मनी (बर्लिन) में किया गया था. इसके बाद 1960 के दशक में अमेरिका में नागरिक अधिकारों (Civil Rights) के आंदोलनों के टाइम पर किया गया था.
भारत में कब से शुरू हुआ है इसका इस्तेमाल?
दावा किया जाता है कि भारत में ब्रिटिश काल के दौरान आंदोलनकारियों को नियंत्रित करने के लिए फायर ब्रिगेड के पानी के टैंकरों और होज का इस्तेमाल किया जाता था. आजाद भारत में पुलिस बलों ने भीड़ नियंत्रण के लिए आधुनिक वाटर कैनन वाहनों का इस्तेमाल करती थी. रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने भारतीय पुलिस और अर्धसैनिक बलों के लिए आधुनिक वॉटर कैनन और ‘वज्र’ जैसे दंगा-रोधी वाहन विकसित किए.
यह कैसे काम करता है और इससे क्या होता है?
वाटर कैनन एक विशेष प्रकार का भारी-भरकम वाहन होता है जिस पर हाई प्रेशर का वाटर पंप और गन (नोजल) लगा होता है. ऑपरेटर वाहन के अंदर बैठकर ही जॉयस्टिक के जरिए छत पर लगी कैनन को घुमाता और फायर करता है. इसके जरिए अत्यधिक उच्च दबाव के साथ पानी की तेज बौछार छोड़ी जाती है, जो भीड़ को शारीरिक रूप से पीछे धकेल देती है. वहीं, कई आधुनिक वाटर कैनन में पानी के साथ लाल या नीले रंग का डाई मिलाया जाता है, ताकि उपद्रवियों की आसानी से पहचान करके उन्हें बाद में पकड़ा जा सके. इसके अलावा भीड़ को तितर-बितर करने के लिए इसमें माइल्ड टियर गैस (आंसू गैस) या मिर्च का घोल भी मिलाया जाता है.
पुलिस विभाग को कितनी वाटर कैनन मिलती हैं?
अब सवाल ये भी खड़ा होता है कि आखिर पुलिस विभाग को आखिर कितने वाटर कैनन मिलते हैं? तो बता दें कि भारत में पुलिस और कानून-व्यवस्था राज्य का विषय है, केंद्रीय कोटा या तय संख्या नहीं. गृह मंत्रालय (MHA) किसी राज्य पुलिस विभाग के लिए वाटर कैनन की कोई एक निश्चित या अनिवार्य संख्या तय नहीं करता है. केंद्र सरकार की 'मॉडर्नाइजेशन ऑफ पुलिस फोर्स'(MPF) जो अब राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पुलिस आधुनिकीकरण सहायता (ASUMP) के नाम से जाना जाता है योजना के तहत राज्य सरकारों को बजट मिलता है, जिससे राज्य अपनी जरूरत के हिसाब से DRDO या निजी कंपनियों से वाटर कैनन गाड़ियां खरीदते हैं.
आजतक एजुकेशन डेस्क