हिंदी दिवस मनाए अभी चार दिन ही बीते हैं. बड़े-बड़े मंचों से हिंदी का गुणगान सुना, 'I Love हिन्दी' वाले स्टेटस आंखों के रस्ते दिल में उतरे भी नहीं थे कि भाई लोगों ने एक नई बहस छेड़ दी. ये लोग मध्य प्रदेश में 'हिंदी में MBBS' का पूरा डेटा खोदकर ले आए. बताया कि यहां करोड़ों रुपये स्वाहा हो गए, 50 हजार किताबें छपीं लेकिन तीन साल में एक भी 'लाल' ने डॉक्टरी परीक्षा में हिंदी में उत्तर लिखने की जुर्रत नहीं की!
हिंदी में MBBS की ये तैयारी 2022 में ही शुरू हो गई थी. मध्यप्रदेश ने हिंदी का ये बीड़ा ऐसे उठाया था कि प्रधानमंत्री से लेकर गृह मंत्री तक सबने हुक्मरानों की पीठ थपथपाई. फिर क्या था शिवराज जी ने मंच संभाला, 300 डॉक्टरों की फौज लगाई जो दिन-रात एक करके लगे रहे. डॉक्टरी की मोटी-मोटी किताबें हिंदी में छप गईं. ऐसा माहौल बना था जैसे सब हिंदीमय होने वाला है? लेकिन चार साल बाद 'नौ दिन चले अढ़ाई कोस!' वाली फीलिंग ही रह गई है.
मुझे समझ नहीं आता कि आखिर इसमें एकबारगी करोड़ों खर्च करने की जरूरत क्या थी? जिस देश में पब्लिक स्कूलों में हिंदी बोलने पर बच्चों को डांट पड़ती है. बच्चे के अंग्रेजी बोलने पर मां-बाप का सीना चौड़ा हो जाता है, वहां डॉक्टर हिंदी पढ़कर कैसे बन जाएं. चलो माना बन भी सकते हैं, दूसरे देशों जैसे चीन और रूस में भी तो अपनी भाषा में ही पढ़कर डॉक्टर बनते हैं. पर ये सब अचानक कैसे हो जाएगा. छात्र 'अंग्रेजी' से लाख खौफजदा हों मगर अचानक पूरी तरह क्लिष्ट हिंदी अपना लें, ऐसा भला हो भी कैसे सकता है.
अरे भाई, इसमें बहस की कोई बात ही नहीं है. गांव का गरीब-गुरबा छात्र, जो 10वीं-12वीं सरकारी स्कूल से पढ़कर जैसे-तैसे नीट (NEET) क्रैक करके मेडिकल कॉलेज पहुंचता है, उसे आप अचानक ऐसी 'शुद्ध-संस्कृतनिष्ठ' हिंदी की किताब थमा दोगे, जिसे पढ़ने के लिए साथ में एक पंडितजी बिठाने पड़ें? वो कैसे अपना लेगा. पहले ही मेडिकल की डॉक्टरी टर्मिनोलॉजी अपने आप में सिर घुमा देने वाली होती है, ऊपर से अगर आप 'Anatomy' का ऐसा कठिन अनुवाद कर दो कि छात्र का दिमाग ही ब्लॉक हो जाए, तो वो तो अंग्रेजी की ही शरण लेगा न!
इसमें हम या आप कभी ये नहीं कह सकते कि हाशिये में बैठे समाज के बच्चों के लिए हिंदी मददगार है. देखिए वो गरीब है लेकिन बेवकूफ नहीं हैं. उन्हें पता है कि MBBS के बाद जब वे एमडी (MD) या एमएस (MS) का एंट्रेंस देंगे, तो पेपर हिंदी में नहीं आएगा. इसके बाद जब वे अमेरिका या ब्रिटेन का लाइसेंस परीक्षा (USMLE/PLAB) देंगे, तो वहां कोई 'हिंदी मीडियम' का कोटा नहीं मिलेगा. उन्हें यह भी डर सताता है कि अगर आंसर शीट में हिंदी लिख दी, तो जांचेंगे अंग्रेजीदां प्रोफेसर साहब ही. सरकारों को समझना होगा कि अचानक 'आगे दौड़, पीछे छोड़' नीति काम नहीं करने वाली.
लेकिन अब कोई कहे कि क्या मातृभाषा में पढ़ाने का विचार ही गलत था? तो इसका जवाब होगा- बिल्कुल नहीं. सामने रतलाम मेडिकल कॉलेज का उदाहरण है जहां 80 परसेंट छात्रों के हाथों तक ये हिंदी किताबें पहुंची और वे इसका इस्तेमाल भी कर रहे हैं. क्यों? क्योंकि वहां के डीन और प्रोफेसरों ने इसे 'इगो की लड़ाई' या 'ऊपर से आया सरकारी फरमान' नहीं माना. उन्होंने छात्रों को समझाया कि यह कोई अंग्रेजी का विकल्प नहीं, बल्कि विषय को आसानी से समझने का एक जरिया यानी रेफरेंस मैटेरियल भर है, इसे ऐसे ही अपनाना चाहिए.
सच पूछिए तो यही असली पेंच भी है. अगर चीन और जापान अपनी भाषा में डॉक्टर बना रहे हैं तो उन्होंने अचानक किसी दिन इसे लागू नहीं किया. वहां अनुवाद के सहारे मातृभाषा की थाली नहीं परोसी गई. वहां विषय की समझ ही उसी भाषा में दी गई है. अगर भारत में हमें कुछ बदलना है तो पहले हमें हिंदी भाषा की जमीनी सच्चाई से जुड़ना हो. हम हिंग्लिश बोलने वाले लोग अचानक शुद्ध हिंदी में अपने जज्बात तो कह नहीं सकते, फिर पढ़ाई कैसे कर पाएंगे. हमें हिंदी का भारतीय मॉडल ही मदद करेगा. सच पूछिए तो ऐसा हो कि कक्षा में मास्टर साहब समझाएं हिंदी या देसज बोली में, टर्म्स रहने दें अंग्रेजी वाले, और किताब हो ऐसी जो गांव के लड़के को भी अपनी मां की बोली जैसी सहज लगे.
लेकिन अगर हमने अब भी नीतियां सिर्फ वोट बैंक और सुर्खियां बटोरने के लिए बनाईं, तो हर साल हिंदी दिवस पर ऐसी ही नौटंकी होगी, किताबें छपेंगी, बजट ठिकाने लगेगा, और छात्र अंग्रेजी की पुरानी लीक पर ही चलने को मजबूर होंगे. अगर वाकई हिंदी को मेडिकल शिक्षा की रगों में दौड़ाना है, तो अनुवाद की हड़बड़ी छोड़िए और रतलाम के मॉडल से सीखना. वरना, नीम हकीम खतरे जान वाली कहावत मेडिकल पढ़ाई के सिस्टम पर भी पूरी तरह फिट बैठने लगेगी.
मानसी मिश्रा