उच्च श‍िक्षा में 15% छात्र डिप्रेशन में, सिर्फ 9% कह पा रहे 'बचाओ', सुप्रीम कोर्ट के सर्वे में खुला सच

कोटा से लेकर आईआईटी के कमरों तक पसरे अवसाद की जड़ें सिर्फ पढ़ाई में नहीं, बल्कि सामाजिक भेदभाव, फैकल्टी के शोषण और कठोर नियमों में हैं. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हुए 2.43 लाख छात्रों के सर्वे में यह बात सामने आई है कि संस्थान मानसिक स्वास्थ्य के मोर्चे पर बुरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं.   

Advertisement
उम्मीदों के बीच पसरा सन्नाटा: क्या डिप्रेशन से जंग अकेले लड़ने को मजबूर हैं हमारे छात्र? उम्मीदों के बीच पसरा सन्नाटा: क्या डिप्रेशन से जंग अकेले लड़ने को मजबूर हैं हमारे छात्र?

संजय शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 30 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 5:22 PM IST

देश के चमचमाते उच्च शिक्षण संस्थानों के बंद कमरों में एक खामोश त्रासदी पल रही है. पढ़ाई का दबाव, करियर की अंधी दौड़ और कैंपस में पसरा सामाजिक अलगाव छात्रों को इस कदर तोड़ रहा है कि वे अवसाद की गर्त में गिरते जा रहे हैं. लेकिन सबसे खौफनाक सच यह है कि डिप्रेशन और तनाव में फंसे इन छात्रों में से महज 9 प्रतिशत छात्र ही ऐसे हैं, जो आत्महत्या के विचारों को लेकर मदद की गुहार लगाते हैं या संस्थानों में इसकी रिपोर्ट करते हैं.

Advertisement

सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त 'नेशनल टास्क फोर्स' (NTF) के एक राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण ने उच्च शिक्षा व्यवस्था के इसी खोखलेपन को बेनकाब किया है.

2.43 लाख छात्रों की टीस: 34% खुद को मान रहे 'अजनबी'

आईआईटी दिल्ली और आईआईटी बॉम्बे में छात्रों की आत्महत्या के बाद सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख पर इस जांच की शुरुआत हुई थी. न्यायमूर्ति एस. रविंद्र भट की अध्यक्षता वाले इस पैनल ने देश भर के 2.43 लाख से अधिक छात्रों से संवाद किया.

सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि‍ 15% छात्रों ने माना है कि वे पिछले छह महीनों में लगातार आत्मपीड़ा, गहरे अवसाद और गंभीर चिंता के दौर से गुजरे हैं. 9% छात्रों ने स्वीकार किया कि बीते एक साल में कई बार उनके मन में आत्महत्या के विचार आए. बता दें कि सर्वे में शामिल 67% छात्र SC, ST और OBC वर्ग से थे. इनमें से 34 प्रतिशत ने महसूस किया कि कैंपस के भीतर उनके साथ 'बाहरी' या अजनबी जैसा व्यवहार होता है.

Advertisement

डिग्री के नाम पर मानसिक उत्पीड़न 

टास्क फोर्स की अंतरिम रिपोर्ट के मुताबिक, समस्या सिर्फ पढ़ाई का दबाव नहीं है, बल्कि संस्थानों का माहौल भी जिम्मेदार है. रिपोर्ट में दर्ज प्रमुख वजहें वजह बताई गई हैं. कैंपस में जातिगत व लिंग आधारित भेदभाव के बारे में भी कहा. छात्रों ने माना कि NEET-UG और JEE की रैंक से तय होती जातिगत पहचान, भाषा का अंतर और दाखिले से लेकर ग्रेडिंग तक में फैकल्टी द्वारा किया जाने वाला भेदभाव.

शोषण और मॉरल पुलिसिंग: मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में व्यापक स्तर पर लैंगिक उत्पीड़न, हॉस्टल कर्फ्यू के नाम पर मोरल पुलिसिंग और पीएचडी सुपरवाइजरों का शोषणकारी रवैया.

अमानवीय शेडयूल: मेडिकल छात्रों से क्षमता से परे ऑन-कॉल ड्यूटी कराना और इंजीनियरिंग कॉलेजों में 'रिलेटिव ग्रेडिंग' के कारण पनपी जानलेवा प्रतिस्पर्धा.

प्रशासन पर भरोसा नहीं, परामर्श सेवाएं नदारद

सर्वे में यह भी सामने आया कि लगभग 32% संस्थानों में काउंसलिंग (परामर्श) की कोई बुनियादी व्यवस्था ही नहीं है. इतना ही नहीं, सिर्फ 56% छात्रों को यह भरोसा था कि प्रशासन उनकी गंभीर समस्याओं को निष्पक्षता से सुनेगा.

न्यायमूर्ति एस. रविंद्र भट के नेतृत्व वाले इस पैनल में मनोचिकित्सक डॉ. आलोक सरीन, मैरी ई. जॉन, अरमान अली, राजेंद्र काचरू और प्रो. सीमा मेहरोत्रा जैसे दिग्गज विशेषज्ञ शामिल हैं. पैनल अब तक दिल्ली-एनसीआर, तमिलनाडु, कर्नाटक, असम और पश्चिम बंगाल के 19 संस्थानों का दौरा कर चुका है.

Advertisement

तमाम रिपोर्टों और फीडबैक का गहराई से विश्लेषण करने के बाद टास्क फोर्स अपनी अंतिम रिपोर्ट 31 अक्टूबर, 2026 को सुप्रीम कोर्ट को सौंपेगा, जिसमें छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा, फैकल्टी की ट्रेनिंग और मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) लागू करने के कड़े सुझाव शामिल होंगे.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »