अंतरराष्ट्रीय बाल‍िका द‍िवस पर व‍िशेष: 'जो हाथ कलम-क‍िताबें उठाने के थे, उन पर हल्दी क्यों?'

International Day of the Girl Child: 21वीं सदी में भी बाल विवाह का दंश क्यों? अंतरराष्ट्रीय बाल बालिका दिवस पर आइए आज समझते हैं कि समाज सुधारकों के संघर्ष से लेकर आज तक बाल विवाह का दंश पूरी तरह खत्म क्यों नहीं हो रहा. जानिए कैसे नीति आयोग के साथ 1 लाख गांवों में 6 लाख से ज्यादा बाल विवाह रोके गए और कब तक पूरी तरह इस कुरीति से आजाद होगा भारत?

Advertisement
International Day of the Girl Child: बाल व‍िवाह पर आज भी लड़ाई जारी! (Rep Image by AI) International Day of the Girl Child: बाल व‍िवाह पर आज भी लड़ाई जारी! (Rep Image by AI)

मानसी मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 10 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 10:37 AM IST

21वीं सदी का भारत... जहां हम गगनचुंबी सपनों, एआई क्रांति और लैंगिक समानता की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं. लेकिन इसी दौर में जब 'अंतरराष्ट्रीय बाल बालिका दिवस' आता है और उसकी थीम 'बाल विवाह का अंत' पर टिकती है, तो आत्मा तक सिहर उठती है. एक ऐसी कुरीति, न जाने किस सदी में इस पावन धरा पर पनपी और आज इतने दावों के बाद भी पूरी तरह खत्म नहीं हो सकी.

Advertisement

एक तरफ हम बराबरी की जंग लड़ रहे हैं, और दूसरी तरफ किसी मासूम बेटी की हल्दी से सनी उंगलियों से जबरन कलम छीनी जा रही है. हालांकि, भारत में अब यह कुरीति पहले जैसी स्थायी और अजेय नहीं रही. राजा राममोहन राय से लेकर ईश्वरचंद्र विद्यासागर तक... इतिहास गवाह है कि न जाने कितने समाज सुधारकों ने इस अभिशाप के खिलाफ आवाजें उठाईं, तीखे आंदोलन किए और अपनों का ही बहिष्कार झेला. आज भी वो मशाल बुझी नहीं है. भुवन विभू जैसे लोग बीते 20-25 सालों से इस कुरीति के खिलाफ एक-एक मासूम की जिंदगी बचाने के लिए मैदान में डटे हुए हैं.

इस अंतरराष्ट्रीय बाल बालिका दिवस के मौके पर aajtak.in से 'चाइल्ड मैरिज फ्री इंडिया' अभियान के संस्थापक भुवन विभू से बातचीत में उन्होंने सिर्फ समस्याओं का जिक्र नहीं किया, बल्कि बदलते भारत की उस नई और उम्मीदों से भरी तस्वीर को भी सामने रखा, जो जमीनी स्तर पर खामोशी से आकार ले रही है. आइए जानते हैं कि भुवन विभू के नजरिए से भारत की ये तस्वीर कैसे बदल रही है और कब तक हमारा देश इस कुरीति से पूरी तरह आजाद हो पाएगा...

Advertisement

क्या वाकई आज का भारत बदल रहा है?  

इस पर भुवन ने बेहद आत्मविश्वास के साथ कहा कि अब गांव-देहात की बेटियां चुपचाप सहने वाली पीढ़ी नहीं रहीं. अब ग्रामीण भारत की लड़कियां खुद 1098 पर कॉल कर रही हैं, रील्स और सोशल मीडिया के जरिए अपनी आवाज उठा रही हैं और शादी के मंडप में बैठने से साफ इनकार कर रही हैं. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) के आंकड़े गवाही देते हैं कि बीते तीन सालों में ही भारत में बाल विवाह की दर में करीब 10% की भारी गिरावट आई है. यह इस बात का सबूत है कि समाज की सोच में एक बड़ा और निर्णायक बदलाव आ रहा है.

जो हाथ किताबें कॉपी संभालने के थे, उन पर हल्दी क्यों?

इस बदलती तस्वीर के साथ-साथ एक कड़वा सच यह भी है कि 2026 में भी यह बीमारी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. भुवन विभू बताते हैं कि बाल विवाह का मूल कारण केवल गरीबी नहीं है. असली जहर आज भी समाज की वह सोच है, जो मानती है कि बेटी पराया धन है, इसे जितना जल्दी विदा कर दो उतना अच्छा. भारत में 14 साल की उम्र तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार है. इसके बाद कानूनी अधिकार का दायरा सीमित होने से ग्रामीण इलाकों में सुरक्षा के डर से माता-पिता बेटियों की पढ़ाई छुड़वा देते हैं. वहीं डिजिटल युग में सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल और मानव तस्करी (ट्रैफिकिंग) का डर भी एक बड़ी वजह है, जिससे घबराकर परिवार कम उम्र में ही बेटियों के हाथ पीले कर देते हैं.

Advertisement

मुस्कान में बदलीं 6 लाख सिसकियां 

बदलते भारत का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि अब केवल शादी रोक देने तक बात सीमित नहीं रहती, बल्कि उस बेटी को जिंदगी भर का सुरक्षा कवच दिया जा रहा है. नीति आयोग और 'चाइल्ड मैरिज फ्री इंडिया' मिलकर देश के 1 लाख से ज्यादा गांवों में 'सुरक्षित बाल ग्राम' बना रहे हैं. अब तक 6 लाख से अधिक मासूमों का बाल विवाह सफलतापूर्वक रोका जा चुका है. यही नहीं शादी से बचाई गई बेटियों को सीधे स्कूल, हुनर और सरकारी योजनाओं से जोड़ा जा रहा है. अकेले 2025 में 12 लाख से अधिक ड्राप-आउट बच्चों को दोबारा स्कूलों की दहलीज तक पहुंचाया गया.

भुवन बताते हैं कि ये कुरीति कहीं न कहीं धार्म‍िक व‍िश्वास की आड़ में भी पलती है इसल‍िए अब 'ऑल इंडिया फेथ लीडर्स फोरम' के तहत 3,28,000 से ज्यादा मंदिर, मस्जिद और अन्य धार्मिक स्थलों के गुरुओं ने सार्वजनिक शपथ ली है कि वे किसी बच्चे का बाल विवाह नहीं कराएंगे.

कब बाल व‍िवाह मुक्त होगा भारत?

कभी पूरी दुनिया के एक-तिहाई बाल विवाह अकेले भारत की गोद में होते थे. आपको बता दें कि इस कुरीति से लड़ने का काम अकेले भुवन व‍िभू ही नहीं, बल्कि देश में और कई संगठन भी इस नेक कार्य में जुटे हुए हैं. लेकिन 27 नवंबर 2024 को भारत सरकार द्वारा शुरू किए गए राष्ट्रीय अभियान के बाद अब यह 140 करोड़ देशवासियों का राष्ट्रीय विजन बन चुका है.

Advertisement

भारत अब सिर्फ लड़ नहीं रहा है, बल्कि जीत की तरफ बढ़ रहा है. अगर यही रफ्तार और जुनून कायम रहा, तो वर्ष 2030 तक भारत बाल विवाह जैसी कलंकित प्रथा को पूरी तरह इतिहास के पन्नों में दफन कर देगा! 21वीं सदी का भारत तब तक पूरी तरह आजाद नहीं माना जाएगा, जब तक देश की आखिरी बेटी को भी अपने पंखों से खुले आसमान में उड़ने का पूरा हक नहीं मिल जाता. आइए, इस अंतरराष्ट्रीय बाल बालिका दिवस पर संकल्प लें कि किसी भी मासूम के सपनों को बाल विवाह की बलि नहीं चढ़ने देंगे. 

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »