भारत में पेपरलीक पर कई कानून बने, लेकिन कागजों पर ही क्यों रह जाते हैं? एक्सपर्ट ने ये कहा

भारत में पेपर लीक रोकने के लिए सख्त कानून बने, फिर भी पर्चे लीक होना नहीं थम रहा. 2024 के नए 'एंटी-पेपर लीक कानून' के बावजूद धांधली जारी है. जानिए देश के बड़े शिक्षाविदों की जुबानी, क्यों ये कानून केवल फाइलों में सीमित रह जाते हैं और असली समस्या कहां है.

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NEET पेपर लीक केस की जांच के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट भी बनाया जा रहा है. (Photo- PTI) NEET पेपर लीक केस की जांच के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट भी बनाया जा रहा है. (Photo- PTI)

मानसी मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 27 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 9:52 AM IST

देश में हर दूसरे महीने किसी न किसी परीक्षा का पर्चा लीक हो जाता है. लाखों छात्र सड़कों पर आते हैं, लाठियां खाते हैं, सरकारें नए और सख्त कानून बनाती हैं... लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात! आखिर क्यों भारत में 'एंटी-पेपर लीक' कानून सिर्फ फाइलों और भाषणों तक सीमित रह जाते हैं? केंद्र के 2024 के नए कानून से लेकर ग्राउंड पर काम करने वाले एक्सपर्ट्स के बयानों के जरिए जानिए कि हमारी पूरी परीक्षा प्रणाली में दिक्कतें कहां आ रही हैं. 

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कानूनों का पुलिंदा, लेकिन नकेल गायब
देश में पेपर लीक रोकने के लिए कानूनों की कोई कमी नहीं है. राजस्थान, गुजरात और उत्तराखंड जैसे राज्यों ने अपने यहां गैर-जमानती धाराओं और संपत्ति कुर्क करने तक के कठोर कानून बनाए. इसके बाद केंद्र सरकार ने 'पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) एक्ट, 2024' लागू किया, जिसमें 10 साल की जेल और 1 करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है.

लेकिन कागजों पर बने ये कड़े कानून धरातल पर पर्चा लीक माफिया में रत्ती भर भी खौफ पैदा नहीं कर पाए हैं. सख्त से सख्त कानून बनने के बाद भी परीक्षाओं में गड़बड़ी की खबरें बदस्तूर जारी हैं.

राधाकृष्णन कमेटी का रोडमैप
नीट (NEET) विवाद के बाद केंद्र सरकार ने इसरो के पूर्व प्रमुख डॉ. के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय कमेटी का गठन किया. इस कमेटी का मुख्य काम नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) के ढांचे में सुधार करना था.

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कमेटी ने अपने रोडमैप में NTA के पुनर्गठन, डेटा सुरक्षा को फुल-प्रूफ बनाने, हाइब्रिड मॉडल (ऑनलाइन + ऑफलाइन) अपनाने और प्राइवेट वेंडर्स पर निर्भरता पूरी तरह खत्म करने के कड़े सुझाव दिए हैं. कमेटी का साफ मानना है कि जब तक परीक्षा का इंफ्रास्ट्रक्चर सरकारी हाथों में नहीं होगा, तब तक सेंधमारी बंद नहीं होगी.

तीन वजहें, जिनके कारण कागजों पर रह जाते हैं कानून? 

प्राइवेट सेंटर्स और वेंडर्स का नेक्सस: सरकारी परीक्षा संस्थाओं के पास अपना इन्फ्रास्ट्रक्चर न ने के कारण परीक्षा कराने का काम प्राइवेट कंप्यूटर लैब्स, निजी प्रिंटिंग प्रेस और प्राइवेट वेंडर्स को आउटसोर्स कर दिया जाता है. यही आउटसोर्सिंग सेंधमारी की सबसे कमजोर कड़ी बनती है.

जांच और सजा में देरी: एफआईआर दर्ज होना आसान है, लेकिन ट्रायल पूरा होने और दोषियों को सजा मिलने में सालों बीत जाते हैं. हमारे देश में सजा की दर यानी कनव‍िक्शन रेट बेहद कम है, जिससे अपराधियों के मन से कानून का डर खत्म हो चुका है.

कोचिंग माफिया और सामाजिक दबाव: अरबों रुपये के इस खेल में राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त कोचिंग सिंडिकेट काम करता है. समाज में कट-थ्रोट कॉम्पिटिशन का इतना दबाव है कि लोग लाखों रुपये देकर भी पर्चा खरीदने को तैयार हो जाते हैं.

सख्त कानून से सिर्फ क्रिमिनलाइजेशन बढ़ेगा, सिस्टम बदलो

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डीयू के आर्यभट्ट कॉलेज के प्राचार्य और पॉलिटिकल साइंस प्रोफेसर प्रो मनोज स‍िन्हा का दो टूक कहना है कि क्या समाज में बदलाव केवल कानून बनाने से आ जाता है? चोरी कोई किसी से पूछकर तो नहीं करता. यह तो एक कल्चर बन गया है. महज सख्त कानून बनाने से क्रिमिनलाइजेशन ही बढ़ेगा, जबकि जेलों पर पहले से भार है. सालों से सरकारें एक ही इंटेंसिटी से कट-थ्रोट एग्जाम करा रही हैं, जिससे लोग खेत बेचकर भी पैसा लगाने को तैयार हो जाते हैं. इससे अच्छा है कि एडमिशन का एक ऐसा तरीका हो जिसमें वाकई प्रतिभाशाली छात्रों की पहचान हो.

निजी वेंडर्स का सिंडिकेट और आउटसोर्सिंग ही सबसे बड़ी दीमक

फोरम ऑफ एकेडेमिक्स फॉर सोशल जस्टिस के चेयरमैन डॉ हंसराज सुमन ने कहाकि जब तक NTA या राज्य लोक सेवा आयोग प्राइवेट एजेंसियों, लैब्स और प्रिंटिंग प्रेस को काम आउटसोर्स करते रहेंगे, तब तक पेपर लीक नहीं रुकेगा. 10 साल की सजा से माफिया नहीं डरता क्योंकि फैसलों में सालों लगते हैं. जब तक फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाकर 6 महीने में सजा नहीं होगी और आउटसोर्सिंग बंद नहीं होगी, तब तक छात्र पिसते रहेंगे.

क्या हो सकता है सोल्यूशन 

देश के अग्रणी शिक्षाविदों के अनुसार, केवल सख्त सजा का डर दिखाकर पेपर लीक नहीं रोका जा सकता. इसके लिए तुरंत व्यावहारिक कदम उठाने होंगे. जैसे प्रश्नपत्रों का लॉजिस्टिक मूवमेंट खत्म करके सीबीएसई की तर्ज पर एन्क्रिप्टेड डिजिटल प्रश्नपत्र सीधे एग्जाम हॉल में प्रिंट या स्क्रीन पर मुहैया कराए जाएं. इसके अलावा  बायोमीट्रिक और रियल-टाइम ट्रैकिंग हो, यानी परीक्षा केंद्र के अलॉटमेंट से लेकर प्रश्नपत्र खुलने तक हर सेकंड की सीसीटीवी और बायोमीट्रिक मॉनिटरिंग हो. साथ ही पेपर लीक के मामलों की सुनवाई के लिए स्पेशल फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनें, जहां 6 महीने के भीतर फैसला आए.

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एग्जाम साइकिल की डिजिटल ट्रैकिंग जरूरी

सीबीएसई गवर्निंग बॉडी की सदस्य व शिक्षाविद डॉ ज्योति अरोड़ा का कहना है कि कानून बनाना नीतिगत कदम है, लेकिन धरातल पर जब तक लीक-प्रूफ टेक्नोलॉजी नहीं होगी, कानून अप्रभावी ही रहेगा. सीबीएसई जिस तरह से एन्क्रिप्टेड प्रश्नपत्रों का उपयोग करता है, वैसी ही तकनीक सभी राष्ट्रीय परीक्षाओं में अनिवार्य होनी चाहिए. सेंटर अलॉटमेंट से लेकर पेपर खुलने तक रियल-टाइम सीसीटीवी मॉनिटरिंग और 'नो-ह्यूमन-टच' मॉडल ही एकमात्र रास्ता है."

विशेषज्ञों की राय से यह शीशे की तरह साफ है कि केवल कानून की किताबें मोटी करने से अपराध नहीं रुकते. जब तक सरकारी एजेंसियां आउटसोर्सिंग का मोह छोड़कर खुद का मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं बनाएंगी, फास्ट-ट्रैक कोर्ट से तुरंत सजा नहीं दिलाएंगी और तकनीक का सही इस्तेमाल नहीं करेंगी, तब तक 'एंटी-पेपर लीक' कानून फाइलों में धूल खाते रहेंगे और देश के युवाओं का भविष्य यूं ही दांव पर लगता रहेगा.

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