इग्नोर करने की गलती मत कीजिए... जब-जब सड़कों पर उतरे छात्र, तब-तब हिलीं सरकारें!

भारत में हाल के वर्षों में शिक्षा, भर्ती परीक्षाओं, पेपर लीक, फीस और रोजगार जैसे मुद्दों को लेकर छात्रों के कई आंदोलन सामने आए हैं.  हर ओर छात्रों का आंदोलन देखने को मिल रहा है. पहले जंतर मंतर, फिर झारखंड और अब पंजाब में भी हर ओर विरोध प्रदर्शन की गूंज सुनाई दे रही हैं. आइए जानते हैं, आंदोलनों का इत‍िहास जब सत्ता को भनक तक नहीं लगी कि प्रदर्शन इतना असर डालेगा.

Advertisement
जब छात्र आदोलनों से हिल गई सरकार. जब छात्र आदोलनों से हिल गई सरकार.

आजतक एजुकेशन डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 05 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 7:36 PM IST

एक हॉस्टल के मेस का बढ़ा हुआ बिल, लाइब्रेरी के बाहर लगा एक छोटा-सा पोस्टर या भर्ती परीक्षा का लीक हुआ पेपर... कागजों पर ये बहुत छोटी घटनाएं लगती हैं. लेकिन भारत की राजनीति का इतिहास गवाह है कि जब-जब इन छोटी-छोटी चिंगारियों को सत्ता ने अनदेखा किया, वे पूरे देश को हिला देने वाला दावानल बन गईं.

आज जब देश के अलग-अलग कोनों (चाहे वो झारखंड का JPSC/JSSC आंदोलन हो या NEET-UPSC की मांगें) में छात्र सड़कों पर हैं, तो सरकारों को इतिहास के पन्नों को दोबारा पलटने की जरूरत है. सोशल मीडिया के दौर में आज 'कॉकरोच जनता पार्टी' जैसी मुहिम रातों-रात आकार ले लेती है, लेकिन यह कहानी नई नहीं है. आइए जानते हैं कि कैसे कैंपस की छोटी-सी आवाज ने देश के बड़े-बड़े प्रधानमंत्रियों की नींद उड़ा दी और भारतीय राजनीति को नए दिग्गज नेता दिए!

Advertisement

1960 का दशक: जब 'भाषा आंदोलन' से कांप उठी थी सत्ता!
कहानी की शुरुआत करते हैं 1960 के दशक से. दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु में जब केंद्र सरकार द्वारा हिंदी को एकमात्र आधिकारिक भाषा बनाने की कवायद शुरू हुई, तो सबसे पहली हुंकार मद्रास (अब चेन्नई) के कॉलेज कैंपसों से उठी. मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज और प्रेसिडेंसी कॉलेज के छात्रों ने सड़कों पर उतरकर आत्मदाह तक के कदम उठाए.

छात्रों के उग्र प्रदर्शनों के आगे लाल बहादुर शास्त्री की सरकार को झुकना पड़ा और यह आश्वासन देना पड़ा कि जब तक गैर-हिंदी भाषी राज्य न चाहें, अंग्रेजी भी आधिकारिक भाषा बनी रहेगी. यह आजाद भारत की पहली बड़ी मिसाल थी कि छात्र सिर्फ नौकरी नहीं, देश की दिशा तय कर सकते हैं.

10 साल बाद: 1973 का गुजरात 'नवनिर्माण आंदोलन'
भाषा आंदोलन के करीब एक दशक बाद, दिसंबर 1973 में गुजरात के 'एल.डी. इंजीनियरिंग कॉलेज' के हॉस्टल मेस की फीस में 20% का इजाफा हुआ. छात्रों ने बिल कम करने की गुहार लगाई, लेकिन प्रशासन ने अनसुना कर दिया.

Advertisement

बस यहीं से पड़ा 'नवनिर्माण आंदोलन' का पौधा. मेस फीस का गुस्सा देखते ही देखते महंगाई, भ्रष्टाचार और राशन संकट में बदल गया. छात्रों ने 'नवनिर्माण युवक समिति' बनाई. दबाव इतना बढ़ा कि मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को इस्तीफा देना पड़ा और विधानसभा भंग कर दी गई. यह आजाद भारत का पहला आंदोलन था जिसने एक चुनी हुई राज्य सरकार को गिरा दिया.

1974 का 'JP आंदोलन': जब छात्र कैंपसों से निकले देश के भावी मुख्यमंत्री!
गुजरात की आंच अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि मार्च 1974 में पटना यूनिवर्सिटी के छात्र 'बिहार छात्र संघर्ष समिति' के बैनर तले बेरोजगारी, महंगाई और शिक्षा में भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़कों पर आ गए.

स्वतंत्रता सेनानी जयप्रकाश नारायण (JP) ने इस आंदोलन का नेतृत्व संभाला और 'संपूर्ण क्रांति' का नारा दिया. इसी आंदोलन की कोख से भारतीय राजनीति के वो चेहरे निकले जिन्होंने आगे चलकर दशकों तक देश पर राज किया:

जॉर्ज फर्नांडिस: छात्र और मजदूर आंदोलनों को एक सूत्र में पिरोकर इमरजेंसी के दौर में इंदिरा गांधी की सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बने.

लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार: पटना यूनिवर्सिटी छात्र संघ (PUSU) से निकले इन युवा नेताओं ने JP आंदोलन की बदौलत अपनी ऐसी जमीन बनाई कि आगे चलकर बिहार की सियासत के सिरमौर बने.

Advertisement

शरद यादव और सुशील मोदी: छात्र राजनीति से तपकर निकले ये चेहरे आगे चलकर राष्ट्रीय राजनीति की मुख्यधारा बने.

इस आंदोलन का ही दबाव था कि देश में 1975 में आपातकाल (Emergency) लगा और 1977 में पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी.

1979-1985: असम का 6 साल लंबा छात्र आंदोलन
ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) ने वोटर लिस्ट में गड़बड़ी और अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर विरोध शुरू किया. 6 सालों तक चले इस आंदोलन के बाद 1985 में ऐतिहासिक 'असम समझौता' हुआ. आंदोलन का नेतृत्व कर रहे छात्र नेता प्रफुल्ल कुमार महंत ने 'असम गण परिषद' बनाई और महज 33 साल की उम्र में देश के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने.

1990: मंडल आयोग और सड़क पर उतरी युवा पीढ़ी
जब वी.पी. सिंह सरकार ने OBC आरक्षण लागू करने की घोषणा की, तो दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र राजीव गोस्वामी के आत्मदाह के प्रयास के बाद पूरा देश सुलग उठा. शिक्षण संस्थान महीनों बंद रहे. इस छात्र आंदोलन ने भारत के सामाजिक और राजनीतिक ढांचे को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया.

इतिहास का सबसे बड़ा सबक: 'इग्नोर' करने की गलती मत कीजिए!

इतिहास गवाह है कि छात्र आंदोलनों को कभी भी महज किसी कैंपस या स्टेडियम तक सीमित नहीं माना जा सकता. जब-जब व्यवस्था ने छात्रों के दर्द, उनके रोजगार के संकट और पेपर लीक जैसी धांधलियों को अनदेखा किया है, तब-तब सड़कों पर उतरा यह आक्रोश सरकारों के तख्तापलट का कारण बना है.

Advertisement

आज के डिजिटल दौर में, जहां एक हैशटैग मिनटों में लाखों दिलों को जोड़ देता है, सरकारों को संवाद का रास्ता चुनना ही होगा. क्योंकि इतिहास खुद को दोहराने में वक्त नहीं लगाता!

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »