कहानी PG की लड़कियों की... दिल्ली-नोएडा आकर छोटे-छोटे कमरों में बसी जिंदगी, दोस्ती आ रही काम

द‍िल्ली एनसीआर की पीजी में रह रहीं लड़क‍ियों की दोस्ती की कहानियां बहुत खास होती हैं. अनजान शहरों से आई ये लड़क‍ियां ज‍िनका रहन-सहन से लेकर खानपान, पढ़ाई, पर‍िवार का स्तर, सोच सब अलग होता है, लेकिन यहां पीजी के एक छोटे से कमरे में जिंदगी जो स‍िखाती है वो काफी कुछ एक जैसे होते हैं. तभी ये लड़क‍ियां स‍िर्फ एक दूसरे की दोस्त ही नहीं होतीं, बल्क‍ि वो कभी बहन कभी मां होती हैं. उनमें हर रिश्ता छ‍िपा होता है. यहां ऐसे ही दोस्ती के किस्से हम साझा कर रहे हैं जो आपको पीजी की लाइफ को समझने में मददगार होगा.

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पीजी में रहने वाली लड़कियों की कहानी. पीजी में रहने वाली लड़कियों की कहानी.

निवेदिता गुप्ता

  • नई दिल्ली,
  • 28 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 4:27 PM IST

एक लड़की का अपने शहर, अपने घर और अपनों को छोड़कर पहली बार किसी अनजान शहर में कदम रखना... यह एहसास जितना रोमांचक होता है, अंदर से उतना ही डराने वाला भी होता है. दिल्ली-NCR की चकाचौंध के बीच जब कोई लड़की किराए के एक छोटे से कमरे में अपना सामान रखती है, तो सबसे पहला ख्याल यही आता है, 'पता नहीं रूममेट्स कैसी होंगी? मैं उनके साथ एडजस्ट कर पाऊंगी या नहीं?'

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लेकिन PG (पेइंग गेस्ट) की चार दीवारों के बीच शुरू होने वाली ये अनजानी मुलाकातें कब बहन, मां और पक्की सहेली के रिश्ते में बदल जाती हैं, इसका अंदाजा खुद उन्हें भी नहीं लगता.

'ऑफिस का गुस्सा खाने पर क्यों निकाल रही?'

घर से दूर रहने वाली एक अर्प‍िता अपने PG के शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताती हैं कि जब वो पहली बार रहने आई, तो सब कुछ पराया लगता था. दिन तो ऑफिस या पढ़ाई की भागदौड़ में बीत जाता, लेकिन शाम ढलते ही घर की याद भारी पड़ने लगती. आगे बताते हुए कहती हैं कि एक दिन मेरा ऑफिस में बहुत खराब दिन बीता. मैं काफी रोई थी और PG लौटकर चुपचाप बैठ गई, खाना भी नहीं खाया. मेरी रूममेट ने मेरे उतरे हुए चेहरे को देखा और सीधे बोली, 'ऑफिस में तो ऐसा होता रहता है, इसका गुस्सा खाने पर क्यों निकाल रही? चल खाना खाते हैं.' पहले तो मैं हैरान रह गई कि इसे कैसे पता चला, फिर लगा जैसे मम्मी पास बैठी हों.

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यह सिर्फ एक रात की बात नहीं थी. उस रात दोनों ने साथ खाना खाया, ऑफिस के तजुर्बों पर बात की और उसके बाद से रोज शाम की चाय साथ में होने लगी. जो लड़की कल तक बिल्कुल अजनबी थी, वह अचानक सबसे करीबी राजदार बन गई.

'यार, आज क्या पहनूं?' से लेकर बीमार रात के पहरेदार तक

PG की दोस्ती सिर्फ बातें शेयर करने तक सीमित नहीं होती. यहां कपड़ों की अलमारी से लेकर सुख-दुख सब कुछ शेयर होता है. एक किस्सा याद करते हुए विशाखा बताती हैं कि उसकी रूममेट के ऑफिस में पार्टी थी, लेकिन उसके पास पार्टी व‍ियर नहीं थे. वह उदास होकर बैठ गई कि पार्टी में नहीं जाएगी. फिर मैंने कहा कि चल मेरी वार्डरोब में देख ले, फिर क्या था उसने दो घंटे तक वॉर्डरोब को खंगाला और सारे कपड़े निकाल दिए.

विशाखा आगे बताती हैं कि लेकिन असली इम्तिहान उस रात आया जब अचानक उसकी तबीयत बिगड़ गई. तेज बुखार से शरीर तप रहा था, और दवा लेने तक की हिम्मत नहीं बची थी. घर फोन करने का मतलब था मां-बाप को बेमतलब चिंता में डालना. मैंने डरते-डरते अपनी रूममेट को कॉल किया, जो उस वक्त वो क‍िसी जरूरी काम से बाहर थी. मुझे लगा मैंने डिस्टर्ब कर दिया. लेकिन वो आधे घंटे के अंदर दवाएं लेकर कमरे में पहुंच गई. पूरी रात ख्याल रखा और अगले दिन डॉक्टर के पास भी ले गई. उस दिन समझ आया कि लोग जो कहते हैं कि PG की सहेली घर की कमी पूरी कर देती है, वो जरा भी गलत नहीं है.

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थोड़ी खटपट, थोड़ी तकरार... लेकिन चाय पर सब खत्म!

जाहिर है, जहां दो अलग-अलग माहौल से आई लड़कियां एक कमरे में रहती हैं, वहां छोटी-मोटी टकराहट भी तय है. कभी पंखा या एसी बंद करने को लेकर बहस तो कभी कमरे की सफाई और बिखरे सामान पर नोक-झोंक, तो कभी एक-दूसरे का सामान बिना पूछे इस्तेमाल कर लेने पर गुस्सा. लेकिन PG की इस दोस्ती की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यह गुस्सा कुछ ही घंटों का होता है. शाम होते-होते फिर एक आवाज गूंजती है, 'छोड़ यार, चल चाय बनाते हैं!' और सब कुछ पहले जैसा हो जाता है.

सही शब्दों में कहा जाए तो दिल्ली-NCR के PG में भले ही लाख दुश्वार‍ियां हों लेकिन यहां जो दोस्ती के र‍िश्ते हैं वो क‍िसी इमारत से कहीं मजबूत हैं. ये र‍िश्ते पीजी को सिर्फ रहने की जगह नहीं बनाते, बल्क‍ि हजारों लड़कियों का वो 'दूसरा घर' देते हैं  जहां वो खुलकर जी सकें. 

(नोट: सुरक्षा की दृष्ट‍ि से लड़कियों के नाम और पते बदले गए हैं.)

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