जब आसमान में हजारों फीट की ऊंचाई पर कॉकपिट के अंदर अचानक मौत सामने खड़ी हो, तो पैनिक होना इंसानी फितरत है. लेकिन ऐसी परिस्थिति में भी शांत रहकर 174 यात्रियों की जान सुरक्षित जमीन पर उतार लाना... यह सिर्फ किस्मत नहीं, बल्कि अनुशासन, गट्स और सालों की कठोर ट्रेनिंग का नतीजा होता है.
हाल ही में फ्लाईदुबाई के कैप्टन स्मित मच्छार ने अपनी सूझबूझ से जिस तरह बड़ा हादसा टाला, उसकी तारीफ खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कर चुके हैं. इस जांबाजी के बाद आज हर युवा की जुबान पर एक ही सवाल है, आखिर कैप्टन स्मित जैसे जांबाज पायलट बनते कैसे हैं? इन्हें ट्रेनिंग में क्या सिखाया जाता है और एविएशन सेक्टर की पूरी इनसाइड स्टोरी क्या है? आइए, आसान भाषा में समझते हैं कॉकपिट से कैप्टन बनने का पूरा सफर!
पायलट बनने का पहला कदम
10+2 (फिजिक्स, मैथ्स और इंग्लिश): 12वीं में फिजिक्स और मैथमेटिक्स के साथ-साथ अंग्रेजी होना बेहद जरूरी है. (अगर आपने आर्ट्स या कॉमर्स से पढ़ाई की है, तो NIOS बोर्ड से ओपन स्कूलिंग के जरिए अलग से ये एग्जाम दिए जा सकते हैं).
मेडिकल फिटनेस (DGCA Class 1 एंड 2): आंखों की रोशनी, दिल की सेहत, सुनने की क्षमता और ओवरऑल फिटनेस चेक होती है. 40 साल से कम उम्र के पायलटों के लिए DGCA का Class 1 मेडिकल टेस्ट साल में एक बार होता है.
वहीं CPL (कमर्शियल पायलट लाइसेंस) के लिए DGCA के नियमों के तहत कम से कम 200 घंटे की फ्लाइंग ट्रेनिंग (सोलो और क्रॉस-कंट्री मिलाकर) और थ्योरी एग्जाम्स (एयर नेविगेशन, एविएशन मीटियोरोलॉजी, एयर रेगुलेशंस आदि) पास करने होते हैं.
कॉकपिट की सीक्रेट ट्रेनिंग कैसे होती है?
एक नॉर्मल इंसान को लोहे के विशाल परिंदे का 'कैप्टन' बनाने के लिए ट्रेनिंग को बेहद सख्त दौर से गुजारा जाता है. इसमें पहले ग्राउंड स्कूल थ्योरी में मौसम का मिजाज समझना, प्लेन के जटिल टेक्निकल सिस्टम की बारीकियां और एयर स्पेस के कानून सिखाए जाते हैं.
फिर दूसरे चरण इन्स्ट्रूमेंट फ्लाइंग में रात के काले अंधेरे, घने कोहरे या खराब मौसम में जब बाहर कुछ न दिखे, तो सिर्फ कॉकपिट के स्क्रीन और कांटों (Instruments) के भरोसे लैंडिंग कराना सीखना होता है. इसके बाद इमरजेंसी ड्रिल्स (सिम्युलेटर ट्रेनिंग) ये वो जगह है जहां स्मित मच्छार जैसे कैप्टन तैयार होते हैं! कॉकपिट में अचानक आग लगना, इंजन फेल होना या तेजी से नीचे गिरना (Dive Survive) जैसी स्थितियों की सिम्युलेटर में बार-बार प्रैक्टिस कराई जाती है. हर 6 महीने में पायलटों को इस सिम्युलेटर चेक (Proficiency Check) से गुजरना पड़ता है.
विदेश का रुख क्यों करते हैं छात्र?
एविएशन के स्मार्ट स्टूडेंट्स अक्सर न्यूजीलैंड, अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के फ्लाइंग स्कूलों को चुनते हैं. इसके 3 सबसे बड़े कारण हैं:
1. साफ आसमान और लगातार फ्लाइंग: भारत में मॉनसून या सर्दियों में धुंध के कारण फ्लाइंग कई-कई दिनों तक रुकी रहती है. वहीं विदेश में मौसम साफ रहने से 200 घंटे की फ्लाइंग जल्दी पूरी हो जाती है.
2. एडवांस्ड इंफ्रास्ट्रक्चर: वर्ल्ड क्लास सिम्युलेटर, आधुनिक एयरक्राफ्ट और बिना किसी रुकावट के खाली एयरस्पेस.
3. कम समय में कोर्स: भारत में जहां CPL मिलने में कभी-कभी 1.5 से 2 साल लग जाते हैं, वहीं विदेश में यह ट्रेनिंग 10 से 12 महीने में सिमट जाती है (हालांकि भारत लौटकर DGCA का कन्वर्जन एग्जाम देना अनिवार्य होता है).
कितनी होती है सैलरी
भारत में इस समय एविएशन सेक्टर अपने सबसे सुनहरे दौर में है. नए एयरक्राफ्ट्स के रिकॉर्ड ऑर्डर्स की वजह से पायलटों की भारी मांग है.
जूनियर फर्स्ट ऑफिसर / ट्रेनी: ₹50,000 से ₹1,00,000 प्रति महीना (स्टाइपेंड)
फर्स्ट ऑफिसर (को-पायलट): ₹2.5 लाख से ₹4.5 लाख प्रति महीना
कैप्टन (कमांडर): ₹6.5 लाख से ₹9.5 लाख प्रति महीना
वरिष्ठ / अंतर्राष्ट्रीय कैप्टन: ₹10 लाख से ₹15 लाख+ प्रति महीना
(नोट- सैलरी की जानकारी विभिन्न विश्वसनीय स्रोतों से ली गई है, ये डिफर भी हो सकती है.)
ग्लैमर के पीछे का कड़वा सच और चुनौतियां
जितना ग्लैमरस यह करियर दिखता है, इसकी कीमत भी उतनी ही चुकानी पड़ती है. सबसे पहले बजट की बात करें तो CPL ट्रेनिंग और उसके बाद प्लेन के विशेष मॉडल को उड़ाने की ट्रेनिंग ('Type Rating') मिलाकर कुल खर्च ₹65 लाख से ₹85 लाख+ तक आ जाता है. दूसरी चुनौती नौकरी की टाइमिंग है. इसमें कोई फिक्स 9-to-5 जॉब नहीं होती, बल्कि लगातार जेट लैग और त्योहारों पर परिवार से दूर रहना होता है.
बता दें कि हवा में किसी गलती की माफी नहीं होती. फैसला सेकंड के सौवें हिस्से में लेना पड़ता है. ठीक वैसे ही, जैसे कैप्टन स्मित मच्छार ने लेकर 174 जिंदगियों को मौत के मुंह से खींचने को लेकर लिया. ये भी इस कठिन ट्रेनिंग का हिस्सा है जो हमेशा मन में बैठाकर रखना होता है.
आजतक एजुकेशन डेस्क