7 साल तक रहे शारीरिक संबंध, फिर लगाया शादी का झांसा देकर रेप का आरोप... झारखंड हाईकोर्ट ने रद्द की FIR

झारखंड हाईकोर्ट ने शादी के वादे पर लंबे समय तक चले शारीरिक संबंध के मामले में FIR रद्द कर दी. कोर्ट ने कहा- शुरुआत से झूठी शादी की नीयत साबित न हो तो बाद में शादी से इनकार रेप नहीं. पढ़े पूरी कहानी.

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यह फैसला ऐसे मामलों में नजीक बन जाएगा (फोटो-ITG) यह फैसला ऐसे मामलों में नजीक बन जाएगा (फोटो-ITG)

सत्यजीत कुमार

  • रांची,
  • 03 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 8:18 PM IST

झारखंड हाईकोर्ट ने शादी के वादे और लंबे समय तक चले सहमति वाले रिश्ते से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने कहा कि अगर दो वयस्कों के बीच लंबे समय तक सहमति से शारीरिक संबंध रहे हों और यह साबित न हो कि पुरुष ने शुरुआत से ही शादी करने का झूठा वादा किया था, तो बाद में शादी से इनकार करने भर से संबंध को रेप नहीं माना जा सकता. जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की एकल पीठ ने इसी आधार पर आरोपी के खिलाफ दर्ज FIR और आगे की पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी.

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दरअसल, इस मामले की शुरुआत साल 2016 में हुई थी. शिकायतकर्ता महिला की मुलाकात आरोपी युवक से एक शादी समारोह के दौरान हुई थी. दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई और धीरे-धीरे यह दोस्ती प्रेम संबंध में बदल गई. दोनों ने एक-दूसरे के फोन नंबर लिए और इसके बाद मुलाकातों का सिलसिला बढ़ता चला गया. समय के साथ-साथ दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी स्थापित हो गए.

महिला की शिकायत के मुताबिक, आरोपी ने उसे शादी करने का भरोसा दिया था. आरोप था कि इसी भरोसे के आधार पर आरोपी ने गिरिडीह और बाद में रांची के एक होटल में उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए. दोनों के बीच यह रिश्ता करीब सात साल तक चलता रहा. महिला का कहना था कि इस दौरान वह आरोपी के साथ शादी की उम्मीद में रिश्ते में बनी रही.

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मामले में महिला ने आरोप लगाया कि करीब सात साल तक संबंध में रहने के बाद अप्रैल 2023 में आरोपी ने अचानक अपना फोन बंद कर दिया. इसके बाद जब महिला ने आरोपी से संपर्क करने की कोशिश की तो बात आगे नहीं बढ़ सकी. आरोप है कि आरोपी के परिवार वालों ने भी उससे शादी करने से इनकार कर दिया. इसके बाद महिला ने पुलिस से शिकायत की और आरोपी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू हुई.

महिला की शिकायत के आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज किया था. जांच के बाद पुलिस ने आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत चार्जशीट भी दाखिल कर दी. इसके बाद गिरिडीह के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने मामले में संज्ञान लिया. आरोपी ने इस पूरी आपराधिक कार्यवाही को चुनौती देते हुए झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की एकल पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पहले के महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला दिया. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शादी का वादा तभी 'झूठा वादा' माना जा सकता है, जब वादा करते समय ही आरोपी की शादी करने की कोई मंशा न हो. यानी शुरुआत से ही महिला को धोखे में रखकर केवल शारीरिक संबंध बनाने के लिए शादी का भरोसा दिया गया हो, तभी यह कानूनी तौर पर झूठे वादे के आधार पर रेप के दायरे में आ सकता है.

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हाईकोर्ट ने कहा कि केवल बाद में शादी से इनकार कर देना अपने आप में झूठा वादा नहीं माना जा सकता. अदालत के मुताबिक, इस मामले में ऐसी कोई विशिष्ट शिकायत या सामग्री सामने नहीं आई, जिससे यह साबित हो कि आरोपी की शुरुआत से ही शादी करने की मंशा नहीं थी. कोर्ट ने रिश्ते की अवधि और उपलब्ध तथ्यों को भी महत्वपूर्ण माना. सात साल तक चले संबंधों को देखते हुए अदालत ने इसे सहमति से बने रिश्ते के तौर पर देखा.

अदालत ने कहा कि दोनों वयस्कों के बीच सात वर्षों से अधिक समय तक बिना किसी विरोध के शारीरिक संबंध बने रहना इस बात की ओर इशारा करता है कि संबंध सहमति से थे. कोर्ट के सामने ऐसा कोई ठोस तथ्य नहीं था, जिससे यह पता चले कि आरोपी ने शुरुआत से ही शादी का झूठा वादा करके महिला को संबंध बनाने के लिए तैयार किया था. इसलिए बाद में शादी से इनकार किए जाने को सीधे तौर पर रेप का अपराध नहीं माना जा सकता.

इन परिस्थितियों को देखते हुए झारखंड हाईकोर्ट ने आरोपी के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया. इसके साथ ही गिरिडीह के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की ओर से पारित संज्ञान आदेश और मामले से जुड़ी पूरी आपराधिक कार्यवाही भी समाप्त कर दी गई. अदालत का यह फैसला शादी के वादे पर बने लंबे समय के सहमति वाले रिश्तों और बाद में रिश्ते के टूटने से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है. हालांकि, अदालत का फैसला इस मामले के उपलब्ध तथ्यों और कानूनी कसौटी पर आधारित है.

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इस फैसले का सीधा मतलब यह नहीं है कि शादी का वादा करके शारीरिक संबंध बनाना कभी अपराध नहीं हो सकता. अदालत ने जिस बात पर जोर दिया, वह यह है कि शादी का वादा शुरू से ही झूठा था और उसका उद्देश्य केवल महिला के साथ संबंध बनाना था, इसका सबूत होना जरूरी है. अगर शुरुआत में शादी करने की वास्तविक मंशा थी, लेकिन बाद में किसी वजह से शादी नहीं हो पाई या व्यक्ति शादी से पीछे हट गया, तो हर मामले को स्वतः रेप का मामला नहीं माना जा सकता.

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