बॉम्बे हाई कोर्ट ने कथित नक्सली अरुण फरेरा के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामले में महाराष्ट्र सरकार को 2 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने माना कि साल 2011 में जेल से रिहा होने के बाद फरेरा को हिरासत में लेने के दौरान कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था.
इस कार्रवाई से संविधान के तहत मिले उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ. हालांकि, अदालत ने इस मामले में उनके वकील की ओर से दर्ज कराई गई शिकायत की जांच कराने की मांग खारिज कर दी.
जस्टिस उर्मिला जोशी फाल्के और जस्टिस राज डी. वाकोडे की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की. अदालत ने कहा कि अरुण फरेरा को हिरासत में लेने की कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत मिले अधिकारों के खिलाफ थी.
अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 22 गिरफ्तारी और हिरासत के मामलों में कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है. अदालत के मुताबिक, फरेरा के मामले में इन संवैधानिक प्रावधानों का पालन नहीं किया गया.
अरुण फरेरा को मई 2007 में कई मामलों के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था. इनमें गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA के तहत दर्ज मामले भी शामिल थे. हालांकि, बाद में उन्हें सभी आठ मामलों में बरी कर दिया गया.
आखिरी मामले में बरी होने के बाद 27 सितंबर 2011 को उन्हें नागपुर सेंट्रल जेल से रिहा किया गया था. आरोप है कि जेल से बाहर आते ही सादे कपड़ों में पहुंचे कुछ लोग उन्हें एक ऐसी गाड़ी में बैठाकर ले गए, जिस पर नंबर प्लेट नहीं थी.
फरेरा के वकील प्रदीप बी. मंध्यान ने अदालत में दलील दी कि पुलिस ने उन्हें जबरन हिरासत में लिया था. वकील के मुताबिक, इस दौरान न तो फरेरा को गिरफ्तारी की वजह बताई गई और न ही उनके परिवार को इसकी जानकारी दी गई.
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि पुलिस रिकॉर्ड में ऐसी कोई स्टेशन डायरी या जनरल डायरी एंट्री नहीं थी, जिससे यह साबित हो सके कि फरेरा को हिरासत में लेने के लिए संबंधित अधिकारी को उचित निर्देश दिए गए थे. इसी आधार पर हिरासत की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए.
वहीं, अभियोजन पक्ष ने पुलिस की कार्रवाई का बचाव किया. सरकारी पक्ष ने दलील दी कि फरेरा नक्सली संगठन के वरिष्ठ और कट्टर सदस्य के तौर पर जाने जाते थे. ऐसे में उन्हें सार्वजनिक स्थान पर हिरासत में लेना जोखिम भरा हो सकता था.
अभियोजन के मुताबिक, जेल से रिहाई के समय एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर ने फरेरा को अपनी पहचान बताने की कोशिश की थी, लेकिन आरोप है कि फरेरा वहां से जबरन भागने की कोशिश करने लगे. इसके बाद पर्याप्त पुलिस बल की मदद से उन्हें हिरासत में लिया गया.
सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि फरेरा को सुरक्षित तरीके से गढ़चिरौली जिले के देसाईगंज पुलिस स्टेशन ले जाने के लिए कुछ समय के लिए गाड़ी की नंबर प्लेट हटाई गई थी. पुलिसकर्मी सादे कपड़ों में थे, क्योंकि वे लोकल क्राइम ब्रांच में तैनात थे.
अभियोजन पक्ष का कहना था कि पुलिस मामले से जुड़ी जरूरी एंट्री कर चुकी थी और जांच अधिकारी ने कोई गैरकानूनी काम नहीं किया था. हालांकि, अदालत ने पुलिस की इन दलीलों को हिरासत की प्रक्रिया को सही ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं माना.
हाई कोर्ट ने कहा कि पुलिस के रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि अरुण फरेरा को हिरासत में लेने के आधार की जानकारी दी गई थी. अदालत ने यह भी गौर किया कि जब उन्हें जेल से ले जाया गया, उस समय उनकी मां, भाई और वकील वहां मौजूद थे.
इसके बावजूद उन्हें यह नहीं बताया गया कि फरेरा को किस वजह से अपने साथ ले जाया जा रहा है. अदालत ने माना कि इस कार्रवाई में गिरफ्तारी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन नहीं किया गया.
अदालत ने कहा कि मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए मुआवजा देना जरूरी है. हालांकि, उसने यह भी माना कि किसी व्यक्ति को हुई परेशानी और उसके अनुभवों की भरपाई केवल पैसे से नहीं की जा सकती. इसके बावजूद कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को अरुण फरेरा को 2 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया.
सरकार को यह रकम आठ सप्ताह के भीतर चुकानी होगी. अदालत ने यह छूट भी दी कि अगर फरेरा मुआवजे की रकम से संतुष्ट नहीं होते हैं, तो वह सिविल मुकदमा दायर कर सकते हैं.
अरुण फरेरा का नाम साल 2018 में एक बार फिर चर्चा में आया था, जब पुणे पुलिस ने उन्हें एल्गार परिषद मामले में गिरफ्तार किया था. इस मामले को 'अर्बन नक्सल' केस के तौर पर भी जाना जाता है.
फिलहाल फरेरा इस मामले में जमानत पर हैं. मामले की सुनवाई मुंबई की विशेष एनआईए अदालत में होनी है, लेकिन उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, मुकदमे की सुनवाई अभी शुरू नहीं हुई है.
विद्या