अगर आप शेयर बाजार के रिस्क और एफडी के ज्यादा रिटर्न की उम्मीद में अलग स्कीम की तलाश में हैं तो... आरबीआई की ये स्कीम आपके लिए खास हो सकती है. RBI की 'फ्लोटिंग रेट सेविंग्स बॉन्ड्स' स्कीम ऐसे निवेशकों को बेहतर विकल्प देते हैं.
यह स्कीम सरकारी गारंटी पेश करती है. साथ ही यह 100 फीसदी सुरक्षित योजन है और इसके डूबने का रिस्क नहीं रहता है. Bank FD की तुलना में ज्यादा ब्याज और सरकारी गारंटी के कारण यह योजना सीनियर सिटीजन और सुरक्षित निवेश चाहे वाले निवेशकों के बीच काफी पॉपुलर है.
क्या है फ्लोटिंग रेट्स सेविंग स्कीम?
यह भारत सरकार की ओर से RBI की ओर से जारी की जाने वाली एक खास सेविंग स्कीम है. इसे 'फ्लोटिंग रेट' इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसमें ब्याज दर तय नहीं होती, बल्कि समय-समय पर बाजार के हिसाब से बदलता रहता है और निवेशकों को इसका लाभ मिलता रहता है.
कौन कर सकता है इसमें निवेश?
अगर निवेश की बात करें तो इसमें सिर्फ एक भारतीय नागरिक और हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) इसमें निवेश कर सकते हैं. NRI इसमें निवेश नहीं कर सकता है. किसी विदेशी को भी इसमें निवेश का लाभ नहीं दिया जाता है, जिसका मतलब है कि भारतीय निवेशकों के लिए यह एक बेहतर सेफ स्कीम है.
कैसे कैलकुलेट करें ब्याज दर?
RBI के इन बॉन्डस की ब्याज दर NSC की ब्याज दर से सीधी जुड़ी होती है. इस बॉन्ड पर ब्याज दर हमेशा NSC की दर + 0.35% होती है. सरकार हर 6 महीने में 1 जनवरी और 1 जुलाई को इसके ब्याज दर की समीक्षा करती है और नया रेट्स लागू करती है. ब्याज का भुगतान हर 6 महीने में सीधे निवेशक के बैंक खाते में जमा की जाती है. हालांकि इसमें री-इन्वेस्टमेंट का विकल्प नहीं होता है.
लॉक-इन पीरियड और प्री-मैच्योर विड्रॉल
इस स्कीम में निवेश करने से पहले इसके लॉक इन नियमों को समझाना बहुत जरूरी है. सामान्य लॉक-इन पीरियड बॉन्ड की कुल मैच्योरिटी 7 साल की होती है. सीनियर सिटीजन के लिए इसमें छूट दी गई है. 60 से 70 साल की उम्र वाले निवेशक 6 साल बाद पैसा निकाल सकते हैं. 70 से 80 साल की उम्र वाले निवेशक 5 साल बाद पैसा निकाल सकते हैं और 80 साल से अधिक उम्र के निवेशक 4 साल बाद ही पैसा निकाल सकते हैं.
कितना कर सकते हैं निवेश?
इस स्कीम में कम से कम 1000 रुपये का निवेश कर सकते हैं और अधिकतम निवेश की कोई सीमा नहीं है. आप जितना चाहे, उतना इस सेफ स्कीम में निवेश कर सकते हैं.
क्या हैं इसके टैक्स नियम?
इस बॉन्ड के तहत हुई कमाई पर टैक्स देना होता है. ब्याज से होने वाली कमाई को आपकी कुल इनकम में जोड़ा जाता है और आपके इनकम टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स लगाया जाता है. अगर एक वित्तीय वर्ष में कुल ब्याज ₹10,000 (वरिष्ठ नागरिकों के लिए ₹50,000) से अधिक है, तो बैंक इस पर TDS काट सकते हैं.