वृंदावन में प्रॉपर्टी खरीदने की मची है होड़, क्या शहर झेल पाएगा ये भीड़

पिछले चार-पांच सालों में जिस रफ्तार से वृंदावन के रियल एस्टेट बाज़ार में उछाल आया है, उसे देखकर लोग इसे एक सुरक्षित और भारी रिटर्न देने वाले विकल्प के रूप में देख रहे हैं. लोग इस डर से भी निवेश कर रहे हैं कि कहीं यह मौका उनके हाथ से हमेशा के लिए निकल न जाए. '

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वृंदावन में आस्था या नया रियल एस्टेट बूम (Photo-Pexels) वृंदावन में आस्था या नया रियल एस्टेट बूम (Photo-Pexels)

स्मिता चंद

  • नई दिल्ली,
  • 02 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 10:13 AM IST

एक दौर था जब वृंदावन का नाम ज़हन में आते ही संकरी गलियां, यमुना का शांत किनारा, भजनों की गूंज और ठाकुर बांके बिहारी की छवि उभरती थी. लोग यहां भागदौड़ से दूर शांति, वैराग्य और भक्ति की तलाश में आते थे. लेकिन पिछले कुछ सालों में वृंदावन की यह पारंपरिक और आध्यात्मिक तस्वीर तेज़ी से बदली है.

आज इस शहर में सिर्फ मंदिरों और आश्रमों की आध्यात्मिक चर्चा नहीं होती, बल्कि चर्चा के केंद्र में लग्जरी टाउनशिप, सर्विस अपार्टमेंट्स, कमर्शियल प्लॉट्स और बड़े रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स आ चुके हैं.

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आलम यह है कि वृंदावन में जमीनों और फ्लैट्स की कीमतें अब देश के बड़े मेट्रो शहरों को टक्कर दे रही हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह अचानक आया उछाल वाकई ज़मीनी विकास का नतीजा है या फिर आस्था की आड़ में खड़ा किया जा रहा एक अनियंत्रित रियल एस्टेट बूम है. क्या इस पौराणिक शहर का बुनियादी ढांचा इस बेतहाशा रफ्तार को संभालने के लिए तैयार है. आजतक रेडियो के शो 'प्रॉपर्टी से फायदा' में रियल एस्टेट एक्सपर्ट संजीव राठौड़ वृंदावन के रियल एस्टेट मार्केट पर चर्चा की.

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भक्ति का केंद्र या बड़ा इन्वेस्टमेंट हब

संजीव कहते हैं- ' वृंदावन में प्रॉपर्टी खरीदने वालों की मानसिकता को गहराई से समझें तो यहां मुख्य रूप से दो श्रेणियां उभरकर सामने आती हैं, इनमें से लगभग अस्सी से नब्बे प्रतिशत आबादी वो है, जिनकी भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी के प्रति अटूट श्रद्धा है. कोविड-19 महामारी के बाद देश में आध्यात्मिक झुकाव तेज़ी से बढ़ा है, जिसने लोगों को इस पवित्र नगरी की ओर आकर्षित किया है, लेकिन इस भारी डिमांड को देखकर अब एक बहुत बड़ा विशुद्ध निवेशक वर्ग भी यहां सक्रिय हो गया है.'   

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सेकंड होम और युवाओं का नया ट्रेंड

संजीव बताते हैं कि वृंदावन का रियल्टी बाज़ार इसलिए भी अलग है क्योंकि यहां प्रॉपर्टी खरीदने वाले ज़्यादातर लोग इसे अपने 'सेकंड होम' के तौर पर देख रहे हैं. अधिकांश खरीदार ऐसे हैं जो अपनी नौकरी, व्यापार या बच्चों की पढ़ाई के कारण तुरंत यहां स्थायी रूप से शिफ्ट नहीं हो सकते, इसलिए वे इसे अपने रिटायरमेंट प्लान के रूप में सुरक्षित कर रहे हैं. इसके साथ ही डिजिटल क्रांति और वर्क फ्रॉम होम संस्कृति के आने से युवाओं का एक नया वर्ग भी वृंदावन की ओर आकर्षित हो रहा है, जो शांत और आध्यात्मिक माहौल में रहकर अपना काम करना चाहता है, जो लोग यहां नियमित नहीं रह पाते, वे अपने खाली घरों को होम-स्टे के रूप में चलाकर बिज़नेस के नए रास्ते भी तलाश रहे हैं. इससे रियल एस्टेट को एक नया कमर्शियल एंगल मिल गया है.

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सोशल मीडिया और सेलिब्रिटी इफेक्ट का असर

पहले वृंदावन को मुख्य रूप से एक अर्ध-ग्रामीण या पारंपरिक तीर्थस्थल माना जाता था, जहां सीमित इंफ्रास्ट्रक्चर था, लेकिन हाल के वर्षों में इसकी लोकप्रियता ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं, जिसके पीछे सबसे बड़ा हाथ सोशल मीडिया और रील्स कल्चर का है. संत प्रेमानंद जी महाराज के प्रवचनों और उनकी छोटी-छोटी रील्स ने देश-विदेश के करोड़ों युवाओं को वृंदावन की जीवनशैली की ओर खींचा है. इसके अलावा विराट कोहली और अनुष्का शर्मा जैसी बड़ी सेलिब्रिटीज के यहां आने के बाद से इस शहर को लेकर मध्यम और उच्च वर्ग में दीवानी और बढ़ गई है. सोशल मीडिया के इस अभूतपूर्व प्रभाव ने वास्तविकता से कहीं ज़्यादा तेज़ी से वृंदावन के रियल एस्टेट बाज़ार को ऊपर उठा दिया है, जिससे संपत्तियों की कीमतें रातों-रात आसमान छूने लगी हैं.

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हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री की एंट्री और बदलता स्वरूप

संजीव का कहना है - ' धार्मिक पर्यटन में आए इस ऐतिहासिक उछाल को देखते हुए देश-दुनिया की नामचीन होटल चेन अब वृंदावन का रुख कर रही हैं. एक समय जहां यहां अच्छे होटलों या गेस्ट हाउसेस का भारी अभाव था और श्रद्धालुओं को बुनियादी ठहरने की व्यवस्था के लिए संघर्ष करना पड़ता था, वहीं आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है. रेडिसन और ताज विवांता जैसे लग्जरी ब्रांड्स यहां पहले ही कदम रख चुके हैं और अगले कुछ वर्षों में आईटीसी, मैरियट, लेमन ट्री और द लीला जैसे दिग्गज ब्रांड्स भी अपने बड़े प्रोजेक्ट्स ला रहे हैं. द लीला जैसी प्रतिष्ठित चेन ने तो इसके लिए भूमि अधिग्रहण भी पूरा कर लिया है. यह इस बात का साफ संकेत है कि कॉर्पोरेट जगत वृंदावन को केवल एक सामान्य तीर्थस्थल नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ा कमर्शियल और हॉस्पिटैलिटी हब मान चुका है.'

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आम तौर पर किसी भी आधुनिक शहर जैसे नोएडा, ग्रेटर नोएडा या चंडीगढ़ को बसाने का एक स्थापित नियम होता है, जिसके तहत पहले चौड़ी सड़कें, सीवरेज, बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं तैयार की जाती हैं और फिर वहां जनता को बसाया जाता है, लेकिन वृंदावन में विकास की गंगा पूरी तरह उल्टी बही है. यहां पहले से एक ऐतिहासिक, संकरा और घनी आबादी वाला प्राचीन शहर था. जब अचानक यहां लाखों-करोड़ों की संख्या में आधुनिक गाड़ियां और लोग पहुंचने लगे, तब जाकर प्रशासन को इंफ्रास्ट्रक्चर की याद आई.

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आज स्थिति यह है कि सामान्य दिनों को छोड़िए, वीकेंड्स और प्रमुख त्योहारों जैसे जन्माष्टमी या न्यू ईयर पर पूरा शहर पूरी तरह चोक हो जाता है. पुलिस प्रशासन को यमुना एक्सप्रेसवे या नेशनल हाईवे से आने वाले वाहनों को शहर के बाहर मल्टीलेवल पार्किंग या पागल बाबा मंदिर के पास ही रोकना पड़ता है.

मास्टर प्लान 2031 का कड़वा सच

संजीव बताते हैं- ' अनियंत्रित भीड़, बेतरतीब निर्माण और लगातार बढ़ती अव्यवस्था को काबू में करने के लिए सरकार को आखिरकार मास्टर प्लान 2031 लागू करना पड़ा है. इस मास्टर प्लान का मुख्य उद्देश्य शहर के अनियोजित फैलाव को रोकना, नए ज़ोन तय करना और बढ़ती आबादी के हिसाब से ट्रैफिक और बुनियादी सुविधाओं को मैनेज करना है.' 

सरकार इस बात को मान चुकी है कि यदि अब भी कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो वृंदावन का मूल स्वरूप हमेशा के लिए नष्ट हो जाएगा. मुख्यमंत्री खुद दर्जनों बार यहां का दौरा कर स्थिति की समीक्षा कर चुके हैं, जिससे साफ है कि प्रशासन पर इस पौराणिक शहर को बचाने का भारी दबाव है.

प्रशासनिक सुधारों की इसी कड़ी में बांके बिहारी मंदिर के आसपास के लगभग पांच एकड़ क्षेत्र को एक भव्य कॉरिडोर के रूप में विकसित किया जा रहा है. इस दायरे में आने वाले सालों पुराने मकानों और दुकानों को सरकार अधिग्रहित कर रही है, जिसके लिए प्रभावित लोगों को मुआवजा और पुनर्वास की सुविधाएं दी जा रही हैं. विस्थापितों के रहने और व्यापार की व्यवस्था वृंदावन के रुक्मणी विहार और जयत जैसी जगहों पर की जा रही है, लेकिन इस पूरे प्रोजेक्ट का एक दूसरा पहलू यह है कि इस कॉरिडोर के ऐलान के बाद से इसके आसपास और पेरीफेरी से सटे हुए इलाकों में ज़मीनों और प्रॉपर्टी की कीमतें अचानक कई गुना बढ़ गई हैं. यह कृत्रिम उछाल निवेशकों के लिए तो फायदेमंद हो सकता है, लेकिन स्थानीय लोगों के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है.

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क्या वाकई फायदे का सौदा है यहां निवेश करना?

संजीव कहते हैं- ' वृंदावन का रियल एस्टेट मार्केट इस समय अपने चरम पर है, जिसे धार्मिक भावनाएं, सोशल मीडिया का क्रेज और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स लगातार हवा दे रहे हैं. यदि कोई खरीदार विशुद्ध रूप से भावनात्मक या आध्यात्मिक दृष्टि से यहां घर ले रहा है, या लॉन्ग-टर्म के लिए एक सेकंड होम की तलाश में है, तो मास्टर प्लान के तहत विकसित हो रहे नए बाहरी इलाकों जैसे रुक्मणी विहार में निवेश एक अच्छा विकल्प हो सकता है, लेकिन यदि कोई केवल शॉर्ट-टर्म मुनाफे या त्वरित कमर्शियल रिटर्न के उद्देश्य से आ रहा है, तो उसे बेहद सावधान रहने की ज़रूरत है.'
  
शहर का अंदरूनी हिस्सा अभी भी अत्यधिक भीड़ और बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी से जूझ रहा है. जब तक मास्टर प्लान 2031 और कॉरिडोर का काम पूरी तरह ज़मीन पर नहीं उतर जाता, तब तक यहां रहना या प्रॉपर्टी से बड़ा रिटर्न पाना एक बड़ी चुनौती बना रहेगा. इसलिए निवेश करने से पहले कागजी दावों और ज़मीनी हकीकत के अंतर को समझना ही सबसे बड़ी समझदारी है. 

 

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