पहले हमारे देश में रिटायरमेंट के बाद की जिंदगी अपने बच्चों के के साथ एक कमरे में सिमटकर उनके नियमों के हिसाब से रहना होता था, लेकिन वक्त के साथ-साथ तस्वीर अब धीरे-धीरे बदल रही है.
कई वरिष्ठ नागरिकों के लिए, रिटायटरमेंट का विचार अब सिर्फ सिर पर छत होने से कहीं बढ़कर है. वे एक ऐसा घर चाहते हैं जहां स्वास्थ्य सेवाएं पास हों, दैनिक ज़रूरतों को संभालना आसान हो और मेल-जोल के लिए आस-पास लोग हों. यह बदलाव भारत के रियल एस्टेट बाज़ार के लिए चुपचाप एक नया अवसर पैदा कर रहा है.
प्रॉपर्टी कंसल्टेंसी 'कोलियर्स' (Colliers) की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत का सीनियर लिविंग बाज़ार 2030 तक 1 ट्रिलियन (1 लाख करोड़) रुपये को पार करने की उम्मीद है, जो इसके वर्तमान आकार का लगभग चार गुना है. यह बाज़ार, जो 2026 में लगभग 300 अरब रुपये था, 2030 में 1 ट्रिलियन रुपये का आंकड़ा पार करने से पहले 2028 तक लगभग 700 अरब रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है.
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भारत की बढ़ती बुजुर्ग आबादी बदल रही है आवास की ज़रूरतें
भारत की आबादी बुजुर्ग हो रही है, और इसके निहितार्थ स्वास्थ्य सेवा और पेंशन से कहीं आगे तक जाते हैं. 60 साल और उससे अधिक आयु के भारतीयों की हिस्सेदारी वर्तमान के लगभग 11% से बढ़कर 2050 तक लगभग 21% होने की उम्मीद है. तब तक देश में 34 करोड़ (340 मिलियन) से अधिक वरिष्ठ नागरिक हो सकते हैं. इसका मतलब है कि बुजुर्गों के अनुकूल घरों की मांग में तेज़ी से वृद्धि होने की संभावना है.
एक बुजुर्ग होती आबादी के लिए, एक पारंपरिक अपार्टमेंट हमेशा पर्याप्त नहीं हो सकता है. डॉक्टरों तक आसान पहुंच, आपातकालीन सहायता, मनोरंजक सुविधाएं, हाउसकीपिंग और सामुदायिक गतिविधियां घर के आकार या स्थान जितनी ही महत्वपूर्ण हो सकती हैं.
रिपोर्ट का अनुमान है कि सीनियर लिविंग की मांग वर्तमान में लगभग 20-22 लाख यूनिट है. 2030 तक इसके बढ़कर 28-30 लाख यूनिट होने की उम्मीद है. फिर भी, संभावित मांग की तुलना में संगठित बाज़ार अभी भी बहुत छोटा है. भारत में वर्तमान में केवल 25,000 संगठित सीनियर लिविंग यूनिट्स हैं.
मांग और संगठित आपूर्ति के बीच का यह विशाल अंतर डेवलपर्स और निवेशकों को आकर्षित कर रहा है. रिपोर्ट का अनुमान है कि संगठित सीनियर लिविंग इन्वेंट्री वर्तमान के लगभग 25,000 यूनिट्स से बढ़कर 2030 तक लगभग 1 लाख यूनिट हो जाएगी. दूसरे शब्दों में, अगले तीन से चार वर्षों में आपूर्ति चार गुना हो सकती है.
कोलियर्स इंडिया के सीईओ और एमडी बादल याग्निक के अनुसार, भारत में बुजुर्गों के लिए बने आधुनिक और सीनियर लिविंग की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है. समाज में आ रहे बदलावों और बढ़ती बुजुर्ग आबादी की वजह से लोग अब पेशेवर रूप से प्रबंधित सीनियर होम पसंद कर रहे हैं.
उन्हें उम्मीद है कि अगले 3 से 4 सालों में ऐसे घरों की संख्या चार गुना बढ़कर 2030 तक इस पूरे बाजार का कारोबार 1 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच जाएगा.
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डेवलपर्स और निवेशक बढ़ा रहे हैं खर्च
पायनियर अर्बन लैंड एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट रिषभ पेरिवाल कहते हैं- 'उत्तर भारत में संगठित सीनियर लिविंग का दायरा तेजी से बढ़ रहा है, इस बदलाव में गुरुग्राम और देहरादून प्रमुख केंद्रों के रूप में उभरकर सामने आ रहे हैं, फॉर्च्यून 500 कंपनियों का हब होने के कारण गुरुग्राम संपन्न और उच्च-आय वर्ग (HNI) के सेवानिवृत्त लोगों और एनआरआई (NRI) माता-पिता की पहली पसंद बन रहा है
बढ़ती मांग से डेवलपर्स के इस सेगमेंट को देखने के नज़रिए में भी बदलाव आ रहा है. सीनियर लिविंग डेवलपर्स, ऑपरेटरों और निवेशकों द्वारा 2025 से अब तक 13,000 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश की घोषणा की गई है. इन निवेशों को अगले तीन से चार वर्षों में तैनात किए जाने की उम्मीद है, यह नियोजित खर्च लगभग 75,000 सीनियर लिविंग यूनिट्स को जोड़ने में मदद कर सकता है.
छोटे शहर नए बड़े बाज़ार के रूप में उभर रहे हैं
मुंबई, बेंगलुरु, दिल्ली-एनसीआर और अन्य प्रमुख शहरों ने भले ही अब तक सीनियर लिविंग बाज़ार का नेतृत्व किया हो, लेकिन विकास का अगला चरण छोटे शहरों से आ सकता है. कोयंबटूर, पुडुचेरी, देहरादून और वडोदरा संभावित सीनियर हाउसिंग डेस्टिनेशन के रूप में उभर रहे हैं. तिरुपति, वृंदावन और अयोध्या जैसे आध्यात्मिक केंद्र भी ध्यान आकर्षित कर रहे हैं.
छोटे शहर वरिष्ठ नागरिकों को कम खर्च में बेहतर ज़िंदगी देने का विकल्प दे रहे हैं, यहां रहने की लागत और मकानों की कीमतें बड़े शहरों के मुकाबले काफी सस्ती हैं. साथ ही, बेहतर इलाज की सुविधा और एक शांत, सुकून भरी ज़िंदगी भी मिलती है. जो बुजुर्ग आवश्यक सुविधाओं से समझौता किए बिना मेट्रो की भागदौड़ और भीड़भाड़ से दूर शांत माहौल में रहना चाहते हैं, उनके लिए ये छोटे शहर एक बेहतरीन विकल्प बन रहे हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले समय में सीनियर लिविंग के जितने भी नए प्रोजेक्ट शुरू होंगे, उनमें से लगभग 30 से 40 प्रतिशत प्रोजेक्ट इन्हीं छोटे शहरों और धार्मिक केंद्रों में बनेंगे.
(रिपोर्ट- जैसमीन आनंद)
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