रिटायरमेंट के बाद 'नया घर' बसा रहे हैं बुजुर्ग, देश में सीनियर लिविंग होम्स की बहार

बुजुर्गों की देखभाल के पारंपरिक तरीके पूरी तरह बदल गए हैं. इसके साथ ही, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो रहे बुजुर्ग अब अपने लिए एक खास और सुविधाजनक रहन-सहन की मांग कर रहे हैं.

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आधुनिक सीनियर लिविंग कम्युनिटीज में अपनी नई दुनिया बसा रहे हैं देश के बुजुर्ग।आधुनिक सीनियर लिविंग कम्युनिटीज में अपनी नई दुनिया बसा रहे हैं देश के बुजुर्ग (Pexels) आधुनिक सीनियर लिविंग कम्युनिटीज में अपनी नई दुनिया बसा रहे हैं देश के बुजुर्ग।आधुनिक सीनियर लिविंग कम्युनिटीज में अपनी नई दुनिया बसा रहे हैं देश के बुजुर्ग (Pexels)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 29 जून 2026,
  • अपडेटेड 10:34 AM IST

भारत में सीनियर लिविंग का बाजार एक बड़े बदलाव से गुजर रहा है. अब बुजुर्ग घर खरीदते समय पारंपरिक 'ओल्ड-एज होम' या सिर्फ देखभाल करने वाली जगहों के बजाय ऐसे आधुनिक कम्युनिटीज को प्राथमिकता दे रहे हैं, जो उन्हें एक सक्रिय, आत्मनिर्भर और सामाजिक रूप से जुड़े रहने वाली जीवनशैली का एहसास करा सकें.

विशेषज्ञों का कहना है कि सीनियर लिविंग को अब केवल ऐसे आवास के रूप में नहीं देखा जाता, जहां सिर्फ बीमार या असहाय लोगों को मेडिकल सपोर्ट दिया जाता हो. इसके उलट, यह अब रिटायर हो चुके उन लोगों के लिए एक 'लाइफस्टाइल-ड्रिवन' आवासीय विकल्प बनता जा रहा है, जो उम्र के इस पड़ाव में भी एक्टिव रहना चाहते हैं, अपनी आजादी बरकरार रखना चाहते हैं और समाज के बीच रहकर जिंदगी का लुत्फ उठाना चाहते हैं.

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पिछले कुछ सालों में सीनियर होमबायर्स की प्रोफाइल में बड़ा बदलाव आया है. आज के अधिकांश रिटायर्ड लोग आर्थिक रूप से सुरक्षित हैं, सेहतमंद हैं और अपने रहने के लिए खुद स्वतंत्र फैसले ले रहे हैं. घर चुनते समय उनका पूरा ध्यान केवल मेडिकल केयर पर नहीं होता.

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डेवलपर्स की रणनीति में बदलाव और नए ट्रेंड्स

बुजुर्गों की इस बदलती पसंद ने डेवलपर्स के सोचने का तरीका भी बदल दिया है. अब वे शहरों से दूर कोई अलग-थलग वृद्धाश्रम बनाने के बजाय एकीकृत समुदाय प्लान कर रहे हैं. इन प्रोजेक्ट्स में आवास, स्वास्थ्य सेवाएं, वेलनेस इंफ्रास्ट्रक्चर और लाइफस्टाइल सुविधाएं एक ही जगह पर मौजूद होती हैं.

बुजुर्ग अब किसी दूरदराज के इलाके के बजाय मुख्य शहरों के भीतर या उनके आसपास रहना पसंद कर रहे हैं, अस्पतालों, एयरपोर्ट, शॉपिंग मॉल और अपने परिवार के सदस्यों से नजदीकी उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण है. यही वजह है कि कई डेवलपर्स अब बड़ी आवासीय टाउनशिप के भीतर ही सीनियर लिविंग प्रोजेक्ट्स को भी शामिल कर रहे हैं.

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वर्तमान में बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद, पुणे और दिल्ली-एनसीआर (NCR) जैसे प्रमुख शहरों में रीयल एस्टेट कंपनियों ने इस दिशा में बड़े कदम उठाए हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय में सीनियर लिविंग केवल एक छोटा सेगमेंट नहीं रह जाएगा, बल्कि यह भारतीय रीयल एस्टेट में एक मुख्य और विशिष्ट आवासीय एसेट क्लास के रूप में अपनी मजबूत पहचान बना लेगा.

भारत में 2030 तक होंगे 19.25 करोड़ बुजुर्ग 

भारत में बुजुर्गों की आबादी तेजी से बढ़ रही है और अनुमान है कि 2030 तक देश में वरिष्ठ नागरिकों की संख्या लगभग 19.15 करोड़ हो जाएगी. आज के बदलते दौर में पारंपरिक पारिवारिक ताना-बाना भी बदल रहा है. शहरों में सिंगल परिवारों का चलन बढ़ा है.

इस नई जरूरत को पूरा करने के लिए भारत में तेजी से सीनियर लिविंग होम की डिमांड बढ़ रही है. एक रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक भारत में करीब 15,000 सीनियर लिविंग होम शुरू होने की उम्मीद है. भारतीय रियल एस्टेट बाजार में अब पुराने 'वृद्धाश्रमों' की छवि से बाहर निकलकर नए हाइटेक और लग्जरी लाइफस्टाइल देने वाले प्रोजेक्ट आ रहे हैं.  

निवेशकों, डेवलपर्स और परिवारों के लिए इस बाजार को समझना जरूरी है, जो मुख्य रूप से दो हिस्सों में बंटा है, इंडिपेंडेंट लिविंग आत्मनिर्भर बुजुर्गों के लिए और असिस्टेड लिविंग जिन्हें दैनिक कार्यों में मदद की जरूरत होती है.

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जेएलएल-अस्ली (JLL-ASLI) की 2025 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में संगठित सीनियर लिविंग मार्केट एक बड़ी छलांग लगाने के लिए तैयार है. भारत में इस सेक्टर की पहुंच अभी सिर्फ 1.3 से 1.4 प्रतिशत है, जो कि अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों (6 प्रतिशत से अधिक) की तुलना में काफी कम है.

आर्थिक रूप से सक्षम वरिष्ठ नागरिकों के घरों की संख्या, जो 2024 में 15.7 लाख थी, उसके 2030 तक बढ़कर 22.7 लाख होने का अनुमान है. अब लोगों के लिए सिर्फ 'छत' मुहैया कराना काफी नहीं है. बदलते दौर में यह सेक्टर अब रियल एस्टेट से आगे बढ़कर एक ऐसी जीवनशैली और देखभाल का रूप ले चुका है, जहां बुजुर्गों के दीर्घकालिक स्वास्थ्य और खुशहाली को प्राथमिकता दी जाती है.

सीनियर लिविंग होम्स की क्या हैं खूबियां?

भारतीय बाजार में फिलहाल 'इंडिपेंडेंट लिविंग' का दबदबा है, जिसकी हिस्सेदारी संगठित क्षेत्र की कुल संपत्तियों में लगभग 85 प्रतिशत है. यह मॉडल मुख्य रूप से 60 से 74 वर्ष के उन सक्रिय वरिष्ठ नागरिकों की जरूरतों को पूरा करता है, जो अपनी स्वतंत्रता से समझौता किए बिना एक ऐसी जीवनशैली चाहते हैं जहां उन्हें घर के रख-रखाव की चिंता न करनी पड़े. 

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कामकाजी तौर पर, इन प्रोजेक्ट्स का पूरा ध्यान कम्युनिटी और वेलनेस पर होता है. इन अपार्टमेंट्स को बुजुर्गों की सुविधा के अनुसार डिजाइन किया जाता है, जिसमें फिसलने से बचाने वाली टाइल्स, दीवारों पर पकड़ने वाले हैंडल और आपातकालीन अलार्म सिस्टम जैसी सुविधाएं शामिल होती हैं.

इस बिजनेस मॉडल की मुख्य यूएसपी क्लब हाउस, सामूहिक डाइनिंग और चौबीसों घंटे सुरक्षा जैसी उच्च स्तरीय सुविधाएं देना है, ताकि बुजुर्गों के बीच सामाजिक मेलजोल बना रहे. कमाई या निवेश के लिहाज से देखें तो भारत में प्रॉपर्टी को सीधे तौर पर खरीदने का चलन सबसे लोकप्रिय है, जिसकी 2025 में बाजार में लगभग 62.7 प्रतिशत हिस्सेदारी थी. इस व्यवस्था के तहत, बुजुर्ग संपत्ति को एक एसेट के रूप में खरीदते हैं, जिसे बाद में अगली पीढ़ी को वसीयत के रूप में सौंपा जा सकता है या फिर से बेचा जा सकता है.

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