मेट्रो सिटीज में आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपैया...शहर छोड़ भाग रहे हैं लोग!

लोग लाखों का पैकेज और चमक-धमक वाली लाइफस्टाइल को 'बाय-बाय' कहकर पहाड़ों की शांत वादियों और छोटे शहरों की ओर रुख कर रहे हैं. आखिर क्यों 25 लाख सालाना कमाने वाला शख्स 20-30 हजार की फ्रीलांसिंग में ज्यादा खुश है.

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क्या भारी EMI और किराए के बोझ ने लोगों को शहर छोड़ने पर मजबूर कर दिया (Photo-ITG) क्या भारी EMI और किराए के बोझ ने लोगों को शहर छोड़ने पर मजबूर कर दिया (Photo-ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 14 मई 2026,
  • अपडेटेड 4:21 PM IST

दिल्ली, बेंगलुरु की ट्रैफिक में फंसी गाड़ियां हों या मुंबई की लोकल ट्रेन का धक्का, आज की कॉर्पोरेट लाइफ ने इंसान को एक ऐसे चक्रव्यूह में डाल दिया है, जहां पैसा तो कम बढ़ रहा है, लेकिन खर्चे की कोई लिमिट नहीं रह गई है. पिछले कुछ महीनों से सोशल मीडिया पर एक नई बहस छिड़ गई है 'रिवर्स माइग्रेशन'. लोग अब चमक-धमक वाली मेट्रो सिटीज की नौकरियां और लाखों के पैकेज छोड़कर छोटे शहरों और पहाड़ों की ओर रुख कर रहे हैं.

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हाल ही में सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियो वायरल हुए हैं जिनमें कपल्स और सोलो प्रोफेशनल्स यह दावा कर रहे हैं कि बेंगलुरु या मुंबई जैसे शहरों में 1-2 लाख रुपये प्रति माह कमाने के बाद भी वे महीने के अंत में बचत नहीं कर पा रहे हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह है आसमान छूता किराया और भारी EMI.

मुंबई में एक ठीक-ठाक इलाके में 2BHK का किराया 60,000 से 80,000 रुपये के बीच है, वहीं बेंगलुरु के टेक हब के पास रहने के लिए आपको अपनी सैलरी का एक बड़ा हिस्सा मकान मालिक को देना पड़ता है, इसके अलावा, बच्चों की स्कूल फीस, महंगे ग्रोसरी ऐप्स और वीकेंड पर बाहर खाने का खर्च एक 'मिडिल क्लास ट्रैप' तैयार कर देता है.

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पहाड़ों में '50 हजार' वाली जिंदगी

दूसरी ओर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम जैसे राज्यों के छोटे कस्बे अब 'डिजिटल नोमैड्स' और उन लोगों के लिए ठिकाना बन रहे हैं जो 'क्वालिटी ऑफ लाइफ' चाहते हैं. यहां 50,000 रुपये में न केवल एक शानदार घर मिल जाता है, बल्कि ताजी हवा और ऑर्गेनिक खाना बोनस के तौर पर मिलता है. वर्क फ्रॉम होम (WFH) और हाइब्रिड मॉडल ने इस ट्रेंड को और हवा दी है.

बेंगलुरु की एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने भागदौड़ भरी जिंदगी और अपनी ढाई लाख रुपये महीने की हाई-पेइंग नौकरी को अलविदा कह दिया, वह अब फ्रीलांस काम करती है और बजट ट्रैवल के जरिए पूरी दुनिया घूम रही है. उसका मानना है कि कॉर्पोरेट लाइफ के मोटे पैकेज और सुख-सुविधाओं के बावजूद वे खुद को खाली महसूस करती थीं, लेकिन अब कम पैसों और सादगी भरी जिंदगी में वे पहले से कहीं ज्यादा जीवंत और खुश महसूस कर रही है. 

चुनौतियां भी कम नहीं

हालांकि यह सुनने में बहुत अच्छा लगता है, लेकिन इस 'रिवर्स माइग्रेशन' की अपनी चुनौतियां हैं. पहाड़ों में मेडिकल सुविधाएं उतनी आधुनिक नहीं हैं जितनी मेट्रो शहरों में. साथ ही, हाई-स्पीड इंटरनेट और बिजली की कटौती कभी-कभी काम में बाधा डाल सकती है. लेकिन, जो लोग शांति को प्राथमिकता दे रहे हैं, उनके लिए ये मुश्किलें छोटी नजर आती हैं.

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मेट्रो शहरों का बढ़ता बोझ और प्रदूषण अब लोगों को बीमार कर रहा है. अगर आपके पास स्किल है और आपकी कंपनी आपको दूर रहकर काम करने की इजाजत देती है, तो पहाड़ केवल घूमने के लिए नहीं, बल्कि बसने के लिए भी एक बेहतरीन विकल्प साबित हो रहे हैं.

आंकड़े गवाह हैं कि आने वाले समय में टायर-2 और टायर-3 शहरों के साथ-साथ पहाड़ी इलाकों में भी 'रिमोट वर्किंग' इकॉनमी काफी मजबूत होगी. 
 

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