भारत में घर खरीदते या किराए पर लेते वक्त लोग सिर्फ चार दीवारें नहीं देखते. सुरक्षा, पार्किंग, साफ-सफाई, बेहतर सड़कें, बिजली, CCTV और तमाम सुविधाएं भी फैसले का हिस्सा होती हैं. यही वजह है कि शहरों में गेटेड सोसायटियों का चलन तेजी से बढ़ा है, लेकिन क्या बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा के साथ हम अपने आसपास के लोगों और समाज से थोड़ा दूर होते जा रहे हैं?
इसी सवाल ने सोशल मीडिया पर एक नई बहस छेड़ दी है. सोशल मीडिया पर एक शख्स ने गेटेड सोसायटी और नॉन-गेटेड यानी खुले मोहल्लों की जिंदगी की तुलना करते हुए एक वीडियो पोस्ट किया है. वीडियो में वह बताते हैं कि दोनों जगहों के बीच अंतर सिर्फ सुविधाओं और सुरक्षा का नहीं, बल्कि कम्युनिटी और आपसी जुड़ाव का भी है.
गेटेड सोसायटी में क्या मिलता है?
वीडियो में शख्स बेहद आसान भाषा में दोनों तरह के इलाकों का फर्क समझाते हैं, उनके मुताबिक, खुले मोहल्लों में अक्सर सुरक्षा, तय पार्किंग, बाउंड्री और व्यवस्थित स्ट्रीट लाइट जैसी सुविधाएं नहीं होतीं. कई सेवाओं के लिए लोगों को स्थानीय प्रशासन या सरकारी व्यवस्था पर निर्भर रहना पड़ता है.
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इसके उलट गेटेड सोसायटी में चारों तरफ बाउंड्री, सिक्योरिटी गार्ड, CCTV, बेसमेंट पार्किंग, स्ट्रीट लाइट, साफ-सफाई और दूसरी सुविधाएं व्यवस्थित तरीके से उपलब्ध होती हैं. इन सेवाओं के बदले सोसायटी में रहने वाले लोग हर महीने मेंटेनेंस चार्ज भी देते हैं. यानी सुविधाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में गेटेड सोसायटी निश्चित तौर पर ज्यादा व्यवस्थित नजर आती है.
वीडियो का सबसे दिलचस्प हिस्सा यहीं से शुरू होता है, शख्स का तर्क है कि गेटेड सोसायटी की सुरक्षा आखिरकार एक सीमा तक ही रहती है, उनका कहना है कि सोसायटी के अंदर सुरक्षा और सुविधाएं भले ही बेहतर हों, लेकिन जैसे ही कोई व्यक्ति उस गेट से बाहर निकलता है, वह उसी शहर, उसी हवा, उसी गर्मी और उसी प्रदूषण का सामना करता है, जिसका सामना बाहर रहने वाला व्यक्ति करता है.
यानी गेट आपके घर और सोसायटी को सुरक्षित कर सकता है, लेकिन वह आपको शहर की बाकी समस्याओं से पूरी तरह अलग नहीं कर सकता.
असली फर्क सुविधाओं का नहीं, कम्युनिटी का?
वीडियो में शख्स ने एक और अहम सवाल उठाया है क्या गेटेड सोसायटी में रहने वाले लोगों के बीच आपसी जुड़ाव उतना मजबूत होता है, जितना किसी खुले मोहल्ले में हो सकता है? उन्होंने खुले मोहल्ले का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां लोग अक्सर एक-दूसरे को जानते हैं. किसी के घर में परेशानी हो तो पड़ोसी मदद के लिए पहुंच सकते हैं. मोहल्ले के बच्चे, बुजुर्ग, जानवर और आसपास की छोटी-बड़ी जरूरतें भी सामूहिक जिम्मेदारी का हिस्सा बन जाती हैं. उन्होंने इसी संदर्भ में गर्मियों के दिनों में जानवरों के लिए पानी रखने का उदाहरण दिया. उनका कहना है कि खुले मोहल्ले में लोग आसपास रहने वाले जानवरों को अपना मानकर उनके लिए खाना-पानी रखते हैं.
वहीं, उन्होंने दावा किया कि एक बार गेटेड सोसायटी में उन्होंने भीषण गर्मी के दौरान जानवरों के लिए सोसायटी के बाहर पानी का इंतजाम करने की बात कही, लेकिन इस सुझाव को लेकर वहां रहने वाले लोगों के साथ उनकी बहस हो गई.
क्या सुरक्षा के साथ सामाजिक दूरी भी बढ़ रही है?
इस वीडियो का मकसद गेटेड सोसायटी को गलत बताना नहीं है. खुद वीडियो के साथ शेयर किए गए संदेश में भी इस बात पर जोर दिया गया है कि सुरक्षा, साफ-सफाई और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर जरूरी हैं. सवाल सिर्फ इतना है कि क्या आधुनिक सुविधाओं की तलाश में हम अपने आसपास की दुनिया से दूर होते जा रहे हैं?
गेटेड सोसायटी में रहने वाला व्यक्ति अपने पड़ोसी को जानता तक नहीं, ऐसा हर जगह नहीं होता. कई सोसायटियों में मजबूत कम्युनिटी, सोशल इवेंट्स और पड़ोसियों के बीच बेहतर जुड़ाव भी देखने को मिलता है, लेकिन वीडियो एक बड़े शहरी ट्रेंड की ओर जरूर इशारा करता है क्या हमारा घर जितना सुरक्षित और सुविधाजनक होता जा रहा है, हमारा सामाजिक दायरा उतना ही छोटा होता जा रहा है?
'घर को सुरक्षित बनाना है या समाज से अलग?'
वीडियो के अंत में शख्स का संदेश इसी सवाल पर आकर टिकता है, उनके मुताबिक, फर्क सिर्फ इस बात से तय नहीं होना चाहिए कि आपके घर के बाहर गेट है या नहीं. असली फर्क इस बात से पड़ता है कि उस गेट के पीछे रहने के बावजूद आप अपने आसपास के लोगों और समाज की कितनी परवाह करते हैं.
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