पिछले कुछ सालों में भारतीय बैंकों ने कमाल का प्रदर्शन किया है और इनकी असेट क्वालिटी में जबरदस्त सुधार हुआ है. अप्रैल-जून तिमाही के आंकड़ों से पता चलता है कि सभी लिस्टेड बैंकों, चाहे वे सरकारी हों या प्राइवेट, इनका NPA तेजी से घटा है और अब 1 फीसदी से कम है.
जेरोधा कैपिटल द्वारा जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार, 30 कमर्शियल बैंकों के नेट एनपीए (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स) जून तिमाही तक घटकर 0.4% हो गए हैं, जबकि वित्तीय वर्ष 2018 में यह लगभग 6% के उच्चतम स्तर पर थे. लोन डिस्ट्रीब्यूशन भी तेजी से बढ़ी हैं और डबल डिजिट ग्रोथ रही.
इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च ने मार्च 2026 में समाप्त होने वाले चालू वित्त वर्ष के लिए अपने पूर्वानुमान को बढ़ाया है और अब 15% की लोन डिस्ट्रीब्यूशन का अनुमान लगा रही है, जबकि पहले उसने 13% का अनुमान लगाया था. डिपॉजिट ग्रोथ लगातार लोन ग्रोथ से पीछे रही है. लेकिन भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने के लिए एक विशेष रियायती स्वैप विंडो खोलने के बाद, एफसीएनआर (बी) डिपॉजिट के माध्यम से मजबूत प्रवाह के कारण इसमें शॉर्ट टर्म में तेजी आने की संभावना है.
इंडिया रेटिंग्स ने भी 2026-27 के लिए अपने जमा वृद्धि पूर्वानुमान को 11.4% से बढ़ाकर 13.6% कर दिया है. हालांकि, अब बैंकों को शॉर्ट टर्म में दो बड़ी चुनौतियों का सामना करने की संभावना जताई गई है.
बैंकों को क्या सामना करना पड़ेगा?
इंडिया रेटिंग्स के वित्तीय संस्थानों के प्रमुख और निदेशक करण गुप्ता का कहना है कि एक तो लोन और डिपॉजिट के उच्च स्तर पर बने रहने का अनुमान है. उन्होंने बताया कि पिछली तिमाही में हमारा प्रदर्शन लगभग 85 प्रतिशत के उच्च स्तर पर था, जो कि हमने कई तिमाहियों में अब तक का सबसे उच्चतम स्तर देखा है.
दूसरी चुनौती- प्रॉफिट को लेकर दबाव
गुप्ता ने आगे कहा कि इस सेक्टर के प्रॉफिट पर दबाव, कम NIM (नेट इंटरेस्ट मार्जिन) के साथ-साथ क्रेडिट लागत में थोड़ी बढ़ोतरी के कारण आ सकता है. इंडिया रेटिंग्स का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2027 में कर्ज लागत में पिछले वर्ष के 65 आधार अंकों की तुलना में 74 आधार अंक की बढ़ोतरी होगी. प्राइवेट बैंकों के लिए कर्ज लागत पब्लिक बैंक के बैंकों के 60 आधार अंकों की तुलना में 95 आधार अंक अधिक रहने का अनुमान है.
गुप्ता ने बताया कि नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों के लिए भी नजरिया समान है, उनके मुनाफे पर मामूली दबाव रहने की उम्मीद है, जो कि NIM में कमी और थोड़ी अधिक क्रेडिट लागत की उम्मीदों से प्रभावित होगा. अधिकारियों का कहना है कि जहां बड़ी एनबीसी कंपनियों के पास पर्याप्त पूंजी भंडार हो सकता है, वहीं छोटी संस्थाओं को पर्याप्त पूंजी जुटाने के मामले में दबाव का सामना करना पड़ सकता है.
अधिकारियों ने आगे बताया कि पूंजी बाजार में अस्थिरता के कारण मध्यम आकार की कंपनियों द्वारा नियोजित कई आईपीओ भी रद्द हो रही हैं. इंडिया रेटिंग्स के अनुसार, बैंकों को मार्जिन के दबाव का सामना करना पड़ रहा है, जिसका मुख्य कारण स्प्रेड में कमी, सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट और बल्क डिपॉजिट पर बढ़ती निर्भरता है. ऐसे में, वित्तीय वर्ष की दूसरी छमाही में कुल ऋण वृद्धि के सामान्य होने की संभावना है.
आजतक बिजनेस डेस्क