टाटा ग्रुप (TATA Group) की होल्डिंग कंपनी टाटा संस (TATA Sons) की IPO लिस्टिंग को लेकर तस्वीर अभी साफ नहीं है. एक तरफ कंपनी के बोर्ड ने संभावित लिस्टिंग से जुड़े कदम आगे बढ़ाने का फैसला किया है, तो दूसरी तरफ टाटा ट्रस्ट (TATA Trusts) ने साफ कर दिया है कि उसने लिस्टिंग को मंजूरी नहीं दी है.
सूत्रों की मानें तो नोएल टाटा ने गुरुवार को टाटा संस की बोर्ड बैठक में रखे अपने बयान में कहा, 'लिस्टिंग से टाटा संस का मौजूदा स्वरूप खत्म हो जाएगा और इसका उस मूल सिद्धांत पर सीधा असर पड़ेगा, जिस पर पूरा ढांचा टिका हुआ है.' टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल टाटा (Noel Tata) ने भी इसका विरोध करते हुए कहा है कि टाटा संस को जल्दबाजी में शेयर बाजार में लिस्ट कराने के बजाय पहले सभी दूसरे रास्तों पर विचार किया जाना चाहिए. यानी फिलहाल टाटा संस की लिस्टिंग को तय मानना जल्दबाजी होगी.
टाटा संस की बोर्ड मीटिंग में क्या हुआ?
टाटा संस के बोर्ड की गुरुवार को बैठक हुई. इसमें एन. चंद्रशेखरन (N Chandrasekaran) को कंपनी के एग्जिक्यूटिव चेयरमैन के तौर पर अगले 5 साल के लिए फिर नियुक्त करने की मंजूरी दी गई. इसी बैठक में टाटा संस को शेयर बाजार में लिस्ट कराने की दिशा में आगे बढ़ने का फैसला भी हुआ. लेकिन यहीं से टाटा ट्रस्ट के साथ मतभेद खुलकर सामने आ गए. टाटा ट्रस्ट के पास टाटा संस की करीब 66% हिस्सेदारी है. बैठक के बाद टाटा ट्रस्ट ने साफ कहा कि उसने टाटा संस की लिस्टिंग पर सहमति नहीं दी है. ट्रस्ट का कहना है कि सिर्फ IPO या लिस्टिंग के विकल्प पर आगे बढ़ने के बजाय कंपनी के सामने मौजूद सभी विकल्पों को तुरंत देखा जाना चाहिए.
आखिर लिस्टिंग की जरूरत क्यों पड़ रही?
इस विवाद को समझने के लिए टाटा संस और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के बीच चल रहे मामले को समझना जरूरी है. RBI के नियमों के तहत टाटा संस को एक खास कैटेगरी की वित्तीय कंपनी के तौर पर माना गया है. कंपनी ने मार्च 2024 में RBI से अपना सर्टिफिकेट ऑफ रजिस्ट्रेशन (CoR) यानी वित्तीय कंपनी के तौर पर मिला रजिस्ट्रेशन स्वेच्छा से वापस करने की अर्जी दी थी.
लेकिन RBI की ओर से टाटा संस के इस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया गया. इसके बाद टाटा संस के सामने कंपनी की मौजूदा स्थिति को लेकर कुछ विकल्पों पर विचार करने की जरूरत पैदा हुई है. इनमें शेयर बाजार में लिस्टिंग भी एक रास्ता है. हालांकि नोएल टाटा का कहना है कि RBI के पत्र में कहीं यह नहीं कहा गया कि लिस्टिंग ही एकमात्र रास्ता है.
नोएल टाटा की सबसे बड़ी आपत्ति क्या है?
टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल टाटा का तर्क है कि टाटा संस को सिर्फ एक नॉर्मल होल्डिंग कंपनी की तरह नहीं देखा जा सकता. आसान भाषा में समझें तो टाटा संस के पास टाटा ग्रुप की कई बड़ी कंपनियों में हिस्सेदारी है. वहीं टाटा ट्रस्ट, टाटा संस का सबसे बड़ा शेयरधारक है. टाटा ट्रस्ट की यह हिस्सेदारी सिर्फ कारोबारी निवेश नहीं है, बल्कि टाटा ग्रुप की परोपकारी गतिविधियों (Philanthropic Activities) से भी जुड़ी हुई है.
नोएल टाटा को चिंता है कि अगर टाटा संस शेयर बाजार में लिस्ट हो गई, तो टाटा ट्रस्ट का कंपनी पर जो मौजूदा अधिकार और प्रभाव है, वो कमजोर पड़ सकता है. उनके मुताबिक, टाटा संस की मौजूदा शेयरहोल्डिंग व्यवस्था ने एक सदी से ज्यादा समय से ग्रुप के कारोबार और उसकी सामाजिक-परोपकारी गतिविधियों के बीच एक खास संबंध बनाए रखा है.
RBI के सामने फिर से अपना पक्ष रखेंगे?
नोएल टाटा ने सुझाव दिया है कि टाटा संस को भारतीय रिजर्व बैंक के सामने दोबारा विस्तृत तरीके से अपना पक्ष रखना चाहिए और अपने पुराने आवेदन पर पुनर्विचार की मांग करनी चाहिए. उनका कहना है कि RBI के सामने अपनी बात रखने के साथ कंपनी को सुनवाई का मौका भी मांगना चाहिए. इसके अलावा कंपनी को यह भी देखना चाहिए कि क्या मौजूदा ढांचे में कोई बदलाव करके या किसी दूसरे कानूनी रास्ते से समस्या का समाधान किया जा सकता है. उनका एक अहम सुझाव यह भी है कि टाटा ट्रस्ट से सलाह किए बिना लिस्टिंग की तैयारी, सलाहकारों की नियुक्ति या IPO की संरचना और टाइमिंग तय करने जैसे बड़े कदम नहीं उठाए जाने चाहिए.
मार्च 2024 के फैसले का भी दिया हवाला
नोएल टाटा ने मार्च 2024 में हुए टाटा संस के बोर्ड के एक सर्वसम्मति से लिए गए फैसले का भी जिक्र किया है. उस समय बोर्ड ने कंपनी को अनलिस्टेड रखने यानी शेयर बाजार में लिस्ट नहीं करने का फैसला किया था. इसी दौरान दिवंगत रतन टाटा के मार्गदर्शन में भारतीय रिजर्व बैंक को कंपनी का सर्टिफिकेट ऑफ रजिस्ट्रेशन वापस करने की अर्जी दी गई थी. इसके बाद टाटा संस ने अपनी इंटरनल फाइनेंशियल कैपेसिटी और टाटा ग्रुप की कुछ हिस्सेदारियों से पैसा जुटाकर अपनी उधारी चुकाई.
कंपनी ने करीब ₹20,000 करोड़ के प्रेफरेंस शेयर भी समय से पहले वापस खरीद लिए. नोएल टाटा का कहना है कि अगर कंपनी सिर्फ अपने ढांचे को बनाए रखने के लिए इतनी बड़ी रकम खर्च कर सकती है, तो इसका मतलब था कि कंपनी को प्राइवेट बनाए रखना उस समय भी एक महत्वपूर्ण फैसला था. उनके मुताबिक, मार्च 2024 में लिया गया टाटा संस के बोर्ड का फैसला अब भी कायम है, क्योंकि उसे औपचारिक तौर पर दोबारा बोर्ड के सामने रखकर बदला नहीं गया है.
टाटा संस को अगर IPO लाना ही पड़ा तो?
नोएल टाटा का कहना है कि अगर टाटा संस को प्राइवेट कंपनी बनाए रखने के सभी प्रयास नाकाम हो जाते हैं और आखिरकार शेयर बाजार में लिस्टिंग करनी ही पड़ती है, तो इसके लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए. उन्होंने कम से कम 3 साल का समय मांगा है. उनके मुताबिक, डेडलाइन सितंबर 2029 तक होनी चाहिए.
इसकी वजह यह है कि IPO सिर्फ शेयर बाजार में शेयर बेचने का नाम नहीं है. इससे पहले कंपनी के नियमों में बदलाव, मौजूदा शेयरधारकों की मंजूरी, वित्तीय जानकारी तैयार करना, निवेश बैंकर और दूसरे सलाहकार नियुक्त करना, कंपनी की पूरी जांच यानी ड्यू डिलिजेंस और वैल्यूएशन जैसे कई काम करने पड़ते हैं.
जल्दबाजी के खिलाफ क्यों हैं नोएल टाटा?
नोएल टाटा ने टाटा ग्रुप के कई बड़े कारोबारों का भी हवाला दिया है. इनमें एअर इंडिया, टाटा डिजिटल, टाटा सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट, इलेक्ट्रॉनिक्स और सिविल एविएशन से जुड़े इंवेस्टमेंट शामिल हैं. उनका तर्क है कि इन कारोबारों में अभी बड़े स्तर पर इंवेस्टमेंट चल रहा है और कुछ व्यवसायों की वित्तीय स्थिति को देखते हुए टाटा संस की लिस्टिंग में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए.
आजतक बिजनेस डेस्क